
बेंगलुरु: कर्नाटक में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR और फॉर्म-7 को लेकर सियासी विवाद लगातार तेज होता जा रहा है। मंगलवार को BJP और JD(S) नेताओं के एक NDA प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल थावरचंद गहलोत से मुलाकात कर राज्य सरकार पर SIR प्रक्रिया में “अनुचित हस्तक्षेप” करने का आरोप लगाया। प्रतिनिधिमंडल ने मांग की कि फॉर्म-7 के जरिए मतदाता सूची में आपत्ति दर्ज कराने वालों, खासकर BJP कार्यकर्ताओं और समर्थकों के खिलाफ कथित रूप से “बेवजह” दर्ज किए जा रहे आपराधिक मामलों को रोका जाए।
लोक भवन में हुई इस मुलाकात में केंद्रीय मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष आर. अशोक और विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष चलावडी नारायणस्वामी समेत BJP और JD(S) के कई नेता मौजूद रहे। प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल को एक शिकायत पत्र सौंपकर पूरे मामले में हस्तक्षेप की मांग की।
शिकायत पत्र में NDA नेताओं ने आरोप लगाया कि सत्तारूढ़ कांग्रेस और उसके कार्यकर्ता मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया को प्रभावित कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने दावा किया कि राज्य की पुलिस मशीनरी का इस्तेमाल ऐसे लोगों के खिलाफ किया जा रहा है, जिन्होंने फॉर्म-7 के माध्यम से मतदाता सूची में दर्ज नामों पर आपत्ति जताई है।
फॉर्म-7 का इस्तेमाल मतदाता सूची में किसी नाम को शामिल किए जाने पर आपत्ति दर्ज कराने या किसी मौजूदा नाम को हटाने का अनुरोध करने के लिए किया जाता है। BJP और JD(S) का कहना है कि फॉर्म-7 दाखिल करना अपने आप में अपराध नहीं है और केवल बड़ी संख्या में आपत्तियां दाखिल किए जाने के आधार पर आपराधिक मामला दर्ज नहीं होना चाहिए।
NDA प्रतिनिधिमंडल ने अपने पत्र में यह भी कहा कि चुनावी सूची की शुद्धता सुनिश्चित करना निर्वाचन अधिकारियों की जिम्मेदारी है। उनका तर्क है कि यदि कोई आपत्ति गलत पाई जाती है तो उसका सत्यापन चुनाव आयोग की प्रक्रिया के जरिए किया जाना चाहिए, न कि सीधे आपराधिक मुकदमे दर्ज करके लोगों में डर पैदा किया जाए।
इससे पहले BJP और JD(S) का एक प्रतिनिधिमंडल कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी वी. अनबुकुमार से भी मिला था। नेताओं ने उनसे मांग की थी कि निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों, सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों और जिला निर्वाचन अधिकारियों को ऐसे लोगों के हितों की रक्षा के निर्देश दिए जाएं, जो फॉर्म-7 के जरिए आपत्तियां दाखिल कर रहे हैं।
NDA नेताओं का कहना है कि चुनाव आयोग की ओर से फॉर्म-7 के जरिए आपत्ति दर्ज कराने का कानूनी प्रावधान मौजूद है और एक व्यक्ति द्वारा कई आपत्तियां दाखिल करने पर भी पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। इसी आधार पर उनका दावा है कि केवल बड़ी संख्या में फॉर्म जमा करने को अपराध नहीं माना जाना चाहिए।
दूसरी ओर, कर्नाटक में कांग्रेस नेताओं की शिकायतों के आधार पर कई FIR दर्ज की गई हैं। आरोप है कि कुछ मामलों में ऐसे मतदाताओं के नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 जमा किए गए, जो संबंधित निर्वाचन क्षेत्रों में वास्तविक रूप से रह रहे थे। कांग्रेस का आरोप है कि इस प्रक्रिया का इस्तेमाल योग्य मतदाताओं को सूची से बाहर करने के लिए किया गया।
इसी विवाद के बीच मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार और कांग्रेस नेताओं ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के बाहर प्रदर्शन भी किया था। इसके बाद चुनाव अधिकारियों ने बड़ी संख्या में फॉर्म-7 आवेदन जमा किए जाने से जुड़े मामलों की जांच और आवश्यक कानूनी कार्रवाई की बात कही थी।
BJP इस कार्रवाई को राजनीतिक दबाव का परिणाम बता रही है। पार्टी के नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस सरकार पुलिस के जरिए BJP कार्यकर्ताओं को निशाना बना रही है। पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा, BJP प्रदेश अध्यक्ष बी.वाई. विजयेंद्र और आर. अशोक समेत नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल पहले राज्य के पुलिस महानिदेशक से भी मिल चुका है और फॉर्म-7 से जुड़े मामलों की समीक्षा की मांग कर चुका है।
आर. अशोक ने पहले भी कहा था कि फॉर्म-7 जमा करना कोई अपराध नहीं है और मतदाता की पात्रता तय करने का अधिकार चुनाव आयोग के पास है। BJP नेताओं का कहना है कि पुलिस को ऐसे मामलों में राजनीतिक दबाव से दूर रहकर केवल कानून के आधार पर कार्रवाई करनी चाहिए।
राज्यपाल से हुई मुलाकात के बाद यह विवाद और अधिक राजनीतिक रूप ले चुका है। NDA ने इसे चुनावी प्रक्रिया की स्वतंत्रता और निष्पक्षता से जोड़कर उठाया है, जबकि कांग्रेस का कहना है कि यदि फर्जी या गलत आधार पर मतदाता सूची से नाम हटाने की कोशिश की गई है तो कार्रवाई जरूरी है।
अब निगाह इस बात पर रहेगी कि राज्यपाल इस शिकायत पर क्या कदम उठाते हैं और क्या इस मामले में चुनाव आयोग या राज्य सरकार से कोई रिपोर्ट मांगी जाती है। साथ ही फॉर्म-7 से जुड़े जिन मामलों में FIR दर्ज हुई है, उनकी जांच आगे किस दिशा में बढ़ती है, यह भी महत्वपूर्ण होगा।
फिलहाल कर्नाटक में SIR और फॉर्म-7 का मुद्दा केवल चुनावी प्रक्रिया का तकनीकी विषय नहीं रह गया है, बल्कि सत्तारूढ़ कांग्रेस और BJP-JD(S) गठबंधन के बीच बड़े राजनीतिक टकराव का कारण बन गया है।





