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Karnataka कर्नाटक: दावणगेरे विधानसभा सीट, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शमनूर शिवशंकरप्पा के निधन के बाद खाली हो गई थी। इसके बाद, जमीयत उलेमा-ए-कर्नाटक के नेताओं ने मांग की थी कि कांग्रेस उपचुनाव में मुस्लिम समुदाय से किसी उम्मीदवार को मैदान में उतारे। हालांकि, पार्टी ने शमनूर शिवशंकरप्पा के पोते को अपना उम्मीदवार बनाने का फैसला किया, जिस निर्णय से संगठन से जुड़े मुस्लिम नेताओं में भारी असंतोष फैल गया। नेताओं ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने टिकट बंटवारे में एक बार फिर मुस्लिम समुदाय को नजरअंदाज किया है। उन्होंने इसे एक राजनीतिक झटका बताया, जिसके कर्नाटक से बाहर भी दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि ऐसे फैसलों से दूसरे राज्यों में पार्टी की स्थिति पर असर पड़ सकता है। जमीयत उलेमा-ए-कर्नाटक के अध्यक्ष मुफ्ती इफ्तिखार अहमद कासमी ने कहा कि यह मुद्दा अचानक सामने नहीं आया है, बल्कि इसे 2023 में ही कांग्रेस नेतृत्व के सामने उठाया गया था। उन्होंने कहा कि पिछले मामलों में मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट न देने के लिए पार्टी ने जो सफाई दी थी, वह संतोषजनक नहीं थी।
पिछले उदाहरणों का हवाला देते हुए कासमी ने कहा कि बागलकोट में एक नेता की मृत्यु के बाद टिकट उनके बेटे को दिया गया था, और दावणगेरे में भी ऐसा ही फैसला लेते हुए दिवंगत शिवशंकरप्पा के पोते को चुनाव मैदान में उतारा गया था। उन्होंने आगे कहा कि शिवशंकरप्पा के बेटे पहले से ही विधायक और मंत्री के तौर पर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि बार-बार परिवार के सदस्यों को ही चुनने से दूसरे समुदायों को प्रतिनिधित्व मिलने की गुंजाइश बहुत कम रह जाती है।
कासमी ने कहा कि उन्होंने पार्टी नेतृत्व से अनुरोध किया था कि इस बार परिवार के सदस्यों को टिकट देने के बजाय अल्पसंख्यक समुदाय के किसी उम्मीदवार पर विचार किया जाए। हालांकि, उन्होंने इस बात पर निराशा जताई कि उनकी यह मांग स्वीकार नहीं की गई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बाद में किए गए संगठनात्मक बदलाव, जिनमें कांग्रेस एमएलसी अब्दुल जब्बार और नसीर अहमद को उनके पदों से हटाना भी शामिल है, पार्टी के भीतर चल रही 'दबाव की राजनीति' को दर्शाते हैं।
इसके साथ ही, कासमी ने उन आरोपों को खारिज कर दिया जिनमें कहा गया था कि मुस्लिम नेताओं ने कांग्रेस नेतृत्व को धमकी दी थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके बयानों का मकसद अपनी चिंताओं को सामने रखना था, न कि कोई चेतावनी देना।
उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य उस बात की ओर ध्यान दिलाना था जिसे वे 'व्यवस्थित उपेक्षा' मानते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस नेतृत्व द्वारा सुधारात्मक कदम उठाए जाने पर वे उनका स्वागत करेंगे।
इस बीच, 'वेलफेयर ऑफ ह्यूमैनिटी फाउंडेशन' के अध्यक्ष मौलाना शब्बीर अहमद नदवी ने भी कर्नाटक के मुख्यमंत्री के सलाहकार अब्दुल जब्बार और जब्बार अहमद को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से हटाए जाने के फैसले की आलोचना की।
उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद ही की जानी चाहिए थी। साथ ही, नेताओं को नोटिस जारी करके उन्हें अपनी सफाई देने का एक उचित मौका भी दिया जाना चाहिए था।
नदवी ने कहा कि चुनावी प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही इस तरह की कार्रवाई करना अनुचित है। उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और वरिष्ठ नेता रणदीप सुरजेवाला से मिलकर यह अनुरोध किया गया था कि दावणगेरे से किसी मुस्लिम उम्मीदवार को चुनाव मैदान में उतारा जाए।
उन्होंने दावा किया कि सुरजेवाला ने उन्हें इस पर विचार करने का आश्वासन दिया था, लेकिन उस आश्वासन का पालन नहीं किया गया।
वेलफेयर स्कूलों के समन्वयक सैयद आसिम अब्दुल्ला ने कहा कि 2023 के विधानसभा चुनावों ने एक मिसाल कायम की है और उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व से अपने दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया।
उन्होंने चेतावनी दी कि उनकी मांगों की लगातार अनदेखी करने पर भविष्य में इसके राजनीतिक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
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