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कर्नाटक के जंगलों में खनिज खोज तेज, 17,460 एकड़ पर नजर

Kavita2
10 Aug 2026 11:57 AM IST
कर्नाटक के जंगलों में खनिज खोज तेज, 17,460 एकड़ पर नजर
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बेंगलुरु। धातुओं और खनिजों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी के बीच कर्नाटक के कई जिलों में खनिज अन्वेषण गतिविधियों का दायरा बढ़ता दिखाई दे रहा है। कंपनियों ने उत्तर कन्नड़, उडुपी, दावणगेरे समेत राज्य के विभिन्न हिस्सों में सोना, लोहा, बॉक्साइट और अन्य खनिजों की खोज के लिए मंजूरी मांगी है। प्रस्तावित अन्वेषण क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में वन भूमि भी शामिल है, जिससे पर्यावरण और जैव विविधता को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, खनिजों की खोज के लिए कुल 17,460 एकड़ जमीन पर सैकड़ों बोरवेल और गड्ढे खोदने का प्रस्ताव है। इसमें करीब 11,600 एकड़ यानी लगभग 66 फीसदी जमीन वन क्षेत्र की है। खास बात यह है कि खनिज अन्वेषण से जुड़े अधिकांश आवेदन पिछले करीब 10 महीनों में सामने आए हैं। इससे संकेत मिलता है कि राज्य में खनिज संसाधनों की तलाश को लेकर कंपनियों की रुचि हाल के महीनों में तेजी से बढ़ी है।

जंगलों तक पहुंच रही खनिज खोज

खनिज अन्वेषण के लिए प्रस्तावित क्षेत्रों में राज्य के महत्वपूर्ण वन क्षेत्र शामिल हैं। इनमें से कुछ जंगल पश्चिमी घाट का हिस्सा हैं, जो अपनी जैव विविधता और संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र के लिए जाने जाते हैं। वहीं, कुछ अन्य क्षेत्र ऐसे खुले प्राकृतिक इकोसिस्टम हैं, जिनके पर्यावरणीय महत्व और विशिष्टता को लेकर हाल के वर्षों में वैज्ञानिक और पर्यावरणीय अध्ययन सामने आए हैं।

ऐसे इलाकों में बड़े पैमाने पर बोरवेल और गड्ढे खोदने की गतिविधियां प्रस्तावित होने से पर्यावरणीय प्रभाव का मुद्दा महत्वपूर्ण हो गया है। भले ही खनिज अन्वेषण और व्यावसायिक खनन अलग-अलग चरण हैं, लेकिन शुरुआती खोज के दौरान भी जमीन की खुदाई, पहुंच मार्ग और अन्य गतिविधियों का स्थानीय पारिस्थितिकी पर असर पड़ सकता है।

बुक्कापटना में सोने की खोज को मंजूरी

इस पूरी प्रक्रिया में तुमकुरु जिले का बुक्कापटना क्षेत्र भी विशेष रूप से चर्चा में है। यहां सोने की खोज से संबंधित अन्वेषण का रिकॉर्ड पहले से मौजूद है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और संबंधित दस्तावेजों में बुक्कापटना ब्लॉक को सोना और उससे जुड़े तत्वों की खोज के लिए चिन्हित किए जाने का उल्लेख मिलता है।

बुक्कापटना क्षेत्र में पहले भी खनिज अन्वेषण को लेकर गतिविधियां हुई हैं। आधिकारिक भूवैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र में सोने और उससे जुड़े तत्वों की संभावनाओं का अध्ययन किया गया था। रिपोर्ट में क्षेत्र में अन्वेषण के लिए ब्लॉक आवंटन और संभावित खनिज संसाधनों की पहचान का विवरण दिया गया है।

बुक्कापटना आज वन्यजीवों और घासभूमि के महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में भी जाना जाता है। कर्नाटक पर्यटन के अनुसार, यहां सूखे पर्णपाती जंगलों और घासभूमि का अनूठा पारिस्थितिकी तंत्र है तथा यह क्षेत्र हिरण और अन्य शाकाहारी वन्यजीवों के लिए महत्वपूर्ण है।

पश्चिमी घाट पर बढ़ सकता है दबाव

कर्नाटक के पश्चिमी घाट क्षेत्र में पहले से ही विकास और संसाधन दोहन को लेकर पर्यावरणीय संवेदनशीलता बनी हुई है। पश्चिमी घाट देश के सबसे महत्वपूर्ण जैव विविधता क्षेत्रों में शामिल है। यहां जंगलों में किसी भी तरह की मानवीय गतिविधि का प्रभाव केवल स्थानीय क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जल स्रोतों, वन्यजीवों और आसपास के पारिस्थितिक तंत्र पर भी पड़ सकता है।

खनिज अन्वेषण के लिए प्रस्तावित क्षेत्रों में यदि बड़े पैमाने पर बोरवेल और गड्ढे खोदे जाते हैं, तो जमीन की ऊपरी परत, वनस्पति और स्थानीय जल व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका रहती है। यही कारण है कि पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में अन्वेषण गतिविधियों को लेकर मंजूरियों और उनके प्रभावों की बारीकी से जांच महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

अन्वेषण और खनन में अंतर

खनिजों की खोज के लिए किए जाने वाले अन्वेषण को सीधे खनन के बराबर नहीं माना जा सकता। अन्वेषण का उद्देश्य किसी क्षेत्र में खनिज की मौजूदगी, गुणवत्ता और संभावित भंडार का पता लगाना होता है। इसके लिए भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, ड्रिलिंग, बोरवेल और नमूने लेने जैसी गतिविधियां की जा सकती हैं।

हालांकि, बड़े क्षेत्र में लगातार ड्रिलिंग और खुदाई होने पर पर्यावरणीय प्रभाव का सवाल उठता है। यदि अन्वेषण के बाद किसी क्षेत्र में खनिज का व्यावसायिक भंडार मिलने की पुष्टि होती है, तो भविष्य में वहां खनन की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं। इसलिए पर्यावरणविदों के लिए शुरुआती अन्वेषण चरण ही महत्वपूर्ण माना जाता है।

बुक्कापटना का पारिस्थितिक महत्व

बुक्कापटना वन्यजीव अभयारण्य तुमकुरु जिले के सीरा तालुक में स्थित है। कर्नाटक पर्यटन के अनुसार, यह क्षेत्र सूखे पर्णपाती जंगलों और घासभूमि से मिलकर बना है तथा यहां चीतल, चार सींग वाले मृग और अन्य वन्यजीव पाए जाते हैं। यह क्षेत्र ब्लैकबक की आवाजाही के लिए भी महत्वपूर्ण कॉरिडोर के रूप में काम करता है।

वहीं, वन संबंधी आधिकारिक दस्तावेजों में बुक्कापटना चिंकाड़ा वन्यजीव अभयारण्य के इको-सेंसिटिव जोन से जुड़े प्रावधानों का भी उल्लेख मिलता है। एक आधिकारिक दस्तावेज में इस क्षेत्र के डिफॉल्ट इको-सेंसिटिव जोन में आने और ऐसे क्षेत्र में व्यावसायिक खनन से संबंधित प्रतिबंधों का उल्लेख किया गया है।

बढ़ती कीमतों से बढ़ी कंपनियों की दिलचस्पी

सोना, लौह अयस्क और बॉक्साइट जैसे खनिजों की कीमतों में बढ़ोतरी ने कंपनियों की रुचि को बढ़ाया है। खनिज संसाधनों की खोज को भविष्य के संभावित निवेश और आपूर्ति की जरूरतों से जोड़कर देखा जा रहा है। कर्नाटक में खनिज संसाधनों की मौजूदगी के कारण कई क्षेत्र पहले से ही अन्वेषण गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण रहे हैं।

हालांकि, अब जब प्रस्तावित अन्वेषण का बड़ा हिस्सा वन भूमि तक पहुंच रहा है, तो आर्थिक हितों और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की चुनौती भी सामने आ गई है। कुल 17,460 एकड़ में से 11,600 एकड़ वन भूमि होने का आंकड़ा इस चुनौती की गंभीरता को रेखांकित करता है।

आने वाले समय में इन प्रस्तावों पर मिलने वाली पर्यावरणीय और वन संबंधी मंजूरियां महत्वपूर्ण होंगी। खनिज संसाधनों की खोज से आर्थिक लाभ की संभावनाएं जरूर हैं, लेकिन पश्चिमी घाट, वन्यजीव क्षेत्रों और नए पहचाने जा रहे प्राकृतिक इकोसिस्टम की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रत्येक प्रस्ताव का वैज्ञानिक और पर्यावरणीय मूल्यांकन भी उतना ही जरूरी होगा।

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