
उडुपी। कर्नाटक के तटीय क्षेत्र में पर्यटन और कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने की उम्मीदों से जुड़े मंगलुरु-मारवन्थे कोस्टल पैसेंजर फेरी प्रोजेक्ट को फिलहाल केंद्र सरकार से आर्थिक सहायता नहीं मिल पाएगी। केंद्र ने उडुपी जिले में प्रस्तावित इस परियोजना के लिए सागरमाला योजना के तहत फंड उपलब्ध कराने से इनकार कर दिया है। सरकार की ओर से इसका कारण योजना के तहत वर्तमान में उपलब्ध धनराशि की कमी बताया गया है।
केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने लोकसभा में उडुपी-चिकमगलूरु के सांसद कोटा श्रीनिवास पुजारी के लिखित सवाल के जवाब में यह जानकारी दी। मंत्री ने बताया कि कर्नाटक सरकार ने सागरमाला योजना के तहत मंगलुरु और मारवन्थे के बीच पैसेंजर फेरी सेवा शुरू करने के लिए एक फीजिबिलिटी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। इसके अलावा कोटा पडुकेरे में आवश्यक बुनियादी ढांचे के साथ इंटीग्रेटेड कोस्टल टूरिज्म और मरीना विकास से जुड़ी प्री-फीजिबिलिटी रिपोर्ट भी केंद्र को सौंपी गई थी।
हालांकि, केंद्र सरकार ने फिलहाल इस परियोजना के लिए वित्तीय सहायता देने में असमर्थता जताई है। सरकार का कहना है कि सागरमाला योजना के मौजूदा फंड से सभी प्रस्तावित परियोजनाओं को सहायता देना संभव नहीं है।
तटीय पर्यटन को मिल सकती थी नई दिशा
मंगलुरु-मारवन्थे कोस्टल पैसेंजर फेरी प्रोजेक्ट को कर्नाटक के तटीय क्षेत्र में पर्यटन विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा था। इस परियोजना के माध्यम से समुद्री पर्यटन को बढ़ावा देने, यात्रियों के लिए एक नया परिवहन विकल्प उपलब्ध कराने और तटीय क्षेत्रों को बेहतर तरीके से जोड़ने की योजना थी।
विशेषज्ञों का मानना था कि यदि यह परियोजना शुरू होती तो उडुपी, मंगलुरु और आसपास के तटीय इलाकों में पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा मिलता। समुद्र के रास्ते यात्री परिवहन शुरू होने से स्थानीय व्यवसायों, होटल उद्योग और पर्यटन आधारित रोजगार को भी फायदा पहुंचने की उम्मीद थी।
इसके अलावा यह परियोजना नेशनल हाईवे-66 पर बढ़ते यातायात दबाव को कम करने के लिए एक वैकल्पिक परिवहन व्यवस्था के रूप में भी काम कर सकती थी। सड़क मार्ग के अलावा समुद्री परिवहन विकल्प उपलब्ध होने से यात्रियों को एक नया माध्यम मिल सकता था।
फेरी सेवा और मरीना विकास की थी योजना
कर्नाटक सरकार की ओर से प्रस्तुत प्रस्ताव में मंगलुरु-मारवन्थे के बीच पैसेंजर फेरी सेवा के साथ-साथ कोटा पडुकेरे क्षेत्र में तटीय पर्यटन और मरीना विकास की योजना भी शामिल थी। इसका उद्देश्य तटीय इलाकों में आधुनिक सुविधाएं विकसित करना और समुद्री पर्यटन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देना था।
मरीना परियोजनाओं के माध्यम से पर्यटकों के लिए नौकायन, समुद्री गतिविधियों और मनोरंजन से जुड़ी सुविधाएं विकसित की जा सकती थीं। इससे तटीय क्षेत्रों में निवेश और रोजगार के नए अवसर पैदा होने की संभावना थी।
सागरमाला योजना से जुड़ी उम्मीदें
सागरमाला योजना केंद्र सरकार की एक प्रमुख पहल है, जिसका उद्देश्य देश के बंदरगाहों और तटीय क्षेत्रों का विकास करना है। इसके तहत बंदरगाह आधारित विकास, तटीय संपर्क और समुद्री परिवहन को बढ़ावा देने वाली परियोजनाओं को प्रोत्साहित किया जाता है।
कर्नाटक जैसे लंबे समुद्री तट वाले राज्य में सागरमाला योजना से कई परियोजनाओं को गति मिलने की उम्मीद रही है। मंगलुरु-मारवन्थे फेरी परियोजना भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव के रूप में देखी जा रही थी।
हालांकि, केंद्र के ताजा फैसले के बाद इस परियोजना के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। अब राज्य सरकार को परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए वैकल्पिक वित्तीय विकल्पों पर विचार करना पड़ सकता है।
सांसद ने उठाया था परियोजना का मुद्दा
उडुपी-चिकमगलूरु के सांसद कोटा श्रीनिवास पुजारी ने लोकसभा में इस परियोजना से जुड़े सवाल पूछे थे। उन्होंने केंद्र सरकार से सागरमाला योजना के तहत प्रस्तावित फेरी सेवा और तटीय पर्यटन परियोजनाओं की स्थिति के बारे में जानकारी मांगी थी।
जवाब में केंद्रीय मंत्री ने परियोजना से संबंधित रिपोर्ट जमा होने की पुष्टि की, लेकिन फंड उपलब्धता की कमी के कारण आर्थिक सहायता नहीं दिए जाने की बात कही।
अब राज्य सरकार के विकल्पों पर नजर
केंद्र से वित्तीय सहायता नहीं मिलने के बाद अब यह देखना होगा कि कर्नाटक सरकार इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए क्या कदम उठाती है। राज्य सरकार निजी निवेश, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल या अन्य वित्तीय विकल्पों पर विचार कर सकती है।
तटीय क्षेत्र के लोगों और पर्यटन उद्योग से जुड़े लोगों को उम्मीद थी कि यह परियोजना क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। फिलहाल केंद्र के फैसले के बाद परियोजना की गति धीमी पड़ सकती है, लेकिन भविष्य में नए विकल्पों के जरिए इसे आगे बढ़ाने की संभावना बनी हुई है।
मंगलुरु-मारवन्थे कोस्टल पैसेंजर फेरी प्रोजेक्ट केवल परिवहन सुविधा नहीं, बल्कि तटीय अर्थव्यवस्था और पर्यटन विकास से जुड़ी एक बड़ी पहल के रूप में देखा जा रहा था। अब इसकी अगली दिशा राज्य सरकार की रणनीति और वित्तीय व्यवस्था पर निर्भर करेगी।





