
बेंगलुरु। कावेरी जल विवाद के बीच कर्नाटक सरकार ने फिलहाल नदी का पानी छोड़ने की मौजूदा दर को ही जारी रखने का फैसला किया है। राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई तक कावेरी जल छोड़ने की व्यवस्था में कोई नया बदलाव नहीं किया जाएगा।
कर्नाटक के जल संसाधन मंत्री एन. चेलुवरयास्वामी ने मंगलवार को इस संबंध में जानकारी देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई लगभग 24 अगस्त को प्रस्तावित है। ऐसे में तब तक यथास्थिति बनाए रखने का निर्णय लिया गया है। उन्होंने कहा कि सरकार कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) के सामने समीक्षा याचिका दायर करने का विकल्प भी खुला रखेगी।
मंत्री ने कहा कि कर्नाटक सरकार पानी छोड़ने की मौजूदा दर पर पुनर्विचार की मांग को लेकर CWMA के समक्ष अपनी बात रखने के लिए तैयार थी। उन्होंने कहा कि संबंधित आवेदन पर निर्णय होने के बाद सरकार आगे की रणनीति तय करेगी।
चेलुवरयास्वामी ने कहा कि चूंकि फिलहाल अगले आदेश तक मौजूदा स्थिति बनाए रखने की सलाह दी गई है, इसलिए पानी छोड़ने की वर्तमान व्यवस्था जारी रखनी होगी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार किसानों और राज्य के जल संसाधनों के हितों को ध्यान में रखते हुए आगे के कदम उठाएगी।
कावेरी जल विवाद कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच लंबे समय से चला आ रहा है। दोनों राज्य कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर अपने-अपने दावे रखते हैं। बारिश की स्थिति, बांधों में जल भंडारण और किसानों की जरूरतों के आधार पर हर साल यह मुद्दा चर्चा में आता है।
हाल ही में कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण के निर्देशों को लेकर कर्नाटक में असंतोष देखने को मिला था। 12 अगस्त को CWMA ने कावेरी जल नियंत्रण समिति (CWRC) के उस आदेश को बरकरार रखा था, जिसमें कर्नाटक को 15 दिनों तक प्रतिदिन 12,000 क्यूसेक पानी छोड़ने का निर्देश दिया गया था।
इस आदेश के बाद कर्नाटक सरकार ने अपनी चिंताएं जाहिर की थीं। राज्य का कहना था कि जलाशयों में पानी की स्थिति और स्थानीय जरूरतों को देखते हुए पानी छोड़ने की मात्रा पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। सरकार ने किसानों और पेयजल जरूरतों का हवाला देते हुए अपनी स्थिति रखी थी।
जल संसाधन मंत्री ने बताया कि सरकार CWMA के समक्ष समीक्षा की मांग रखने के विकल्प पर विचार कर रही है। उनका कहना है कि राज्य के हितों की रक्षा के लिए सभी कानूनी और संवैधानिक विकल्पों का इस्तेमाल किया जाएगा।
कर्नाटक में कावेरी का पानी किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। खासकर दक्षिणी जिलों में कृषि गतिविधियां काफी हद तक नदी और उससे जुड़े जलाशयों पर निर्भर हैं। कम बारिश या जल स्तर में कमी के दौरान किसानों को सिंचाई के लिए पानी की कमी का सामना करना पड़ता है।
वहीं, तमिलनाडु भी कावेरी जल पर अपनी निर्भरता बताता रहा है। राज्य का कहना है कि नदी का पानी उसके किसानों के लिए जरूरी है और तय व्यवस्था के अनुसार पानी मिलना चाहिए। इसी कारण दोनों राज्यों के बीच समय-समय पर विवाद सामने आते रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि कावेरी जैसे अंतरराज्यीय जल विवादों में संतुलन बनाना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। एक ओर राज्यों की स्थानीय जरूरतें होती हैं, वहीं दूसरी ओर न्यायिक और प्राधिकरणों के आदेशों का पालन करना भी जरूरी होता है।
फिलहाल कर्नाटक सरकार ने टकराव का रास्ता अपनाने के बजाय न्यायिक प्रक्रिया का इंतजार करने का फैसला किया है। सरकार की नजर अब सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई और CWMA के संभावित फैसले पर है।
आने वाले दिनों में कावेरी जल विवाद को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियां तेज हो सकती हैं। हालांकि, फिलहाल कर्नाटक ने पानी छोड़ने की मौजूदा दर जारी रखने और अगले निर्देशों का इंतजार करने का निर्णय लिया है।





