
Karnataka कर्नाटक: कर्नाटक में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को जमीनी स्तर पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। 2002 के पुराने वोटर रिकॉर्ड को ट्रेस करने में कठिनाई, ट्रेनिंग की कमी और ब्लॉक लेवल अधिकारियों (BLOs) पर बढ़ते काम के दबाव के कारण पूरी प्रक्रिया की रफ्तार धीमी हो गई है। इससे मतदाता सूची के डिजिटाइजेशन कार्य में देरी का खतरा बढ़ गया है।
इस प्रक्रिया में सबसे बड़ी चुनौती “लेगेसी मैपिंग” की बताई जा रही है, जिसमें मतदाताओं को अपनी 2002 की वोटर डिटेल्स या फिर अपने माता-पिता या दादा-दादी की जानकारी के आधार पर सूची में अपनी उपस्थिति सुनिश्चित करनी होती है। यह प्रक्रिया कई लोगों के लिए जटिल साबित हो रही है, क्योंकि पुराने रिकॉर्ड ढूंढना और उनकी पुष्टि करना आसान नहीं है।
अधिकारियों के अनुसार, पहले किए गए मैपिंग अभ्यास में कुल 5.54 करोड़ मतदाताओं में से 91.67 प्रतिशत की मैपिंग का दावा किया गया था। इसमें 2.27 करोड़ लोगों द्वारा स्वयं मैपिंग और 2.52 करोड़ मतदाताओं की प्रोजेनी मैपिंग शामिल थी। हालांकि, इसके बावजूद मौजूदा SIR प्रक्रिया में व्यावहारिक स्तर पर कई समस्याएं सामने आ रही हैं।
घर-घर जाकर गिनती का काम 30 जून से शुरू हुआ है और 29 जुलाई तक चलेगा। इस दौरान लगभग 1.8 करोड़ घरों में गणना फॉर्म बांटे और वापस एकत्र किए जाने हैं। इस कार्य के लिए करीब 59,050 BLOs को तैनात किया गया है। ये BLOs आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, आशा वर्कर्स और सरकारी शिक्षकों सहित विभिन्न सरकारी विभागों से लिए गए हैं।
इसके अलावा राजनीतिक दलों द्वारा नियुक्त लगभग 1.15 लाख ब्लॉक लेवल एजेंट्स (BLAs) भी इस प्रक्रिया में सहयोग कर रहे हैं, ताकि कार्य को तेजी से पूरा किया जा सके।
हालांकि, शुरुआती तीन दिनों के आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। इस अवधि में 55.43 लाख फॉर्म (36.33 प्रतिशत) वितरित किए गए, लेकिन केवल 12.07 लाख फॉर्म (2.18 प्रतिशत) ही डिजिटाइज किए जा सके। यह आंकड़ा दिखाता है कि फॉर्म भरने और उन्हें सिस्टम में अपलोड करने के बीच बड़ा अंतर है, जिससे काम में भारी बैकलॉग बन रहा है।
अधिकारियों के अनुसार, BLOs पर काम का अत्यधिक दबाव है और तकनीकी व प्रशिक्षण संबंधी चुनौतियों के कारण प्रक्रिया अपेक्षित गति नहीं पकड़ पा रही है। कई क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी और डेटा एंट्री की समस्याएं भी सामने आ रही हैं।
चुनाव से जुड़ी इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया में देरी को देखते हुए प्रशासन पर दबाव बढ़ गया है कि वह जल्द से जल्द सुधारात्मक कदम उठाए। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय पर डिजिटाइजेशन पूरा नहीं हुआ तो मतदाता सूची के अंतिम सत्यापन में भी बाधा आ सकती है।
फिलहाल राज्य निर्वाचन आयोग और संबंधित विभाग इस पूरी प्रक्रिया पर नजर बनाए हुए हैं और काम को गति देने के लिए अतिरिक्त संसाधन और प्रशिक्षण उपलब्ध कराने पर विचार कर रहे हैं।





