
Karnataka कर्नाटक: सरकार द्वारा खाद की खरीद के लिए किसान पहचान नंबर (FID) अनिवार्य किए जाने के बाद राज्य में ‘बगैर हुकुम’ (बिना मालिकाना हक वाली) जमीन पर खेती करने वाले किसानों के सामने गंभीर समस्या खड़ी हो गई है। नई व्यवस्था के तहत अब केवल उन्हीं किसानों को खाद उपलब्ध कराया जा रहा है जिनके पास जमीन के मालिकाना हक के दस्तावेज और किसान पहचान नंबर मौजूद हैं।
इस बदलाव के कारण हजारों ऐसे किसान प्रभावित हुए हैं, जो वर्षों से किराए या अन्य अस्थायी व्यवस्था के तहत खेती कर रहे हैं। इन किसानों के पास जमीन का स्वामित्व न होने के कारण वे FID प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं, जिससे उन्हें खाद खरीदने में भारी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।
किसानों का कहना है कि खेती का सीधा संबंध खाद और अन्य कृषि संसाधनों की उपलब्धता से है, लेकिन नई व्यवस्था ने उन्हें इस जरूरी सुविधा से लगभग वंचित कर दिया है। उनका कहना है कि समय पर खाद न मिलने से फसल उत्पादन पर सीधा असर पड़ेगा और उनकी आर्थिक स्थिति और कमजोर हो सकती है।
किसान संगठनों के नेताओं ने इस मुद्दे पर राज्य सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने कहा कि सरकार को छोटे और सीमांत किसानों की वास्तविक स्थिति को समझते हुए नीति में आवश्यक लचीलापन लाना चाहिए, ताकि कोई भी किसान खेती से वंचित न रह जाए।
किसान संगठनों ने यह भी सुझाव दिया है कि जिन किसानों के पास मालिकाना हक नहीं है, लेकिन वे लंबे समय से कृषि कार्य कर रहे हैं, उन्हें भी वैकल्पिक दस्तावेज या स्थानीय सत्यापन के आधार पर FID जारी किया जाना चाहिए, ताकि वे भी खाद और अन्य कृषि इनपुट्स प्राप्त कर सकें।
इस मुद्दे ने ग्रामीण क्षेत्रों में चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि खरीफ और रबी सीजन के दौरान खाद की समय पर उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण होती है। किसानों का कहना है कि अगर इस समस्या का समाधान जल्द नहीं किया गया तो इसका सीधा असर उत्पादन और आय पर पड़ेगा।
फिलहाल किसान संगठनों की ओर से सरकार से अपील की गई है कि वह इस नीति की समीक्षा करे और ऐसी व्यवस्था बनाए जिसमें सभी वास्तविक किसानों को बिना किसी बाधा के खाद उपलब्ध हो सके। उन्होंने जोर देकर कहा कि कृषि व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए सभी वर्गों के किसानों को समान अवसर मिलना जरूरी है।





