
Karnataka कर्नाटक: बिजली क्षेत्र में निजी कंपनियों की एंट्री को लेकर बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक विवाद सामने आया है। मुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार ने सोमवार को संकेत दिया कि राज्य सरकार पावर सेक्टर में निजी कंपनियों की भागीदारी पर रोक लगाने पर विचार कर सकती है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय कैबिनेट की बैठक में चर्चा के बाद ही लिया जाएगा।
मुख्यमंत्री ने यह बात कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड (KPTCL) के कर्मचारियों को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस तरह के बड़े नीतिगत फैसले वे अकेले नहीं ले सकते और इन्हें कैबिनेट के समक्ष रखना आवश्यक है।
हालांकि, अपने संबोधन में मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि उनका व्यक्तिगत मत है कि ऊर्जा क्षेत्र में निजी कंपनियों को प्रवेश देने की व्यवस्था सही नहीं है। उन्होंने मौजूदा कानून और नीति पर सवाल उठाते हुए इसे गलत दिशा में उठाया गया कदम बताया।
शिवकुमार ने कहा कि KPTCL और ESCOMs जैसी सरकारी संस्थाओं ने पिछले कई दशकों से राज्य में बिजली ढांचे को मजबूत करने का काम किया है। उन्होंने कहा कि इन संस्थाओं ने लंबे समय तक बिजली लाइनों के निर्माण और वितरण प्रणाली को विकसित किया है, जिसमें सरकार का लगातार सहयोग रहा है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि यदि अब निजी कंपनियां केवल कनेक्शन देकर इस पूरी व्यवस्था का लाभ उठाने की कोशिश करेंगी, तो यह उचित नहीं होगा। उन्होंने कहा कि राज्य की सार्वजनिक बिजली व्यवस्था को मजबूत करने में सरकारी संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है और उसे कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।
इस मुद्दे पर ऊर्जा मंत्री के. जे. जॉर्ज ने भी अपना पक्ष रखा है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि बिजली क्षेत्र में निजीकरण का कोई विकल्प नहीं है। उन्होंने दावा किया कि राज्य का ऊर्जा विभाग मजबूत स्थिति में है और उपभोक्ताओं को भरोसेमंद बिजली आपूर्ति देने में पूरी तरह सक्षम है।
ऊर्जा मंत्री के बयान से यह संकेत मिला है कि सरकार के भीतर इस मुद्दे पर एक स्पष्ट रुख बनाने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, अंतिम निर्णय कैबिनेट स्तर पर चर्चा के बाद ही लिया जाएगा।
सूत्रों के अनुसार, यह मुद्दा आने वाली कैबिनेट बैठक में विस्तृत रूप से उठाया जा सकता है, जहां बिजली क्षेत्र में निजी भागीदारी के संभावित प्रभावों और मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा की जाएगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि बिजली क्षेत्र में निजी कंपनियों की भूमिका को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। एक पक्ष मानता है कि इससे दक्षता और निवेश बढ़ सकता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे सार्वजनिक क्षेत्र की सेवाओं के लिए खतरा मानता है।
कर्नाटक में यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि राज्य का बिजली नेटवर्क KPTCL और ESCOMs के जरिए लंबे समय से संचालित हो रहा है। ऐसे में किसी भी बड़े बदलाव का सीधा असर उपभोक्ताओं और बिजली ढांचे पर पड़ सकता है।
फिलहाल सरकार के दोनों प्रमुख नेताओं के बयानों से यह स्पष्ट है कि राज्य इस नीति पर गंभीरता से विचार कर रहा है और जल्द ही इस पर कोई बड़ा फैसला सामने आ सकता है।
कैबिनेट की आगामी बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा के बाद ही यह तय होगा कि कर्नाटक में बिजली क्षेत्र में निजी कंपनियों की भूमिका रहेगी या नहीं।





