कर्नाटक

कर्नाटक ने ESA मसौदा ठुकराया

Kavita2
22 Sept 2026 5:26 PM IST
कर्नाटक ने ESA मसौदा ठुकराया
x

बेंगलुरु: कर्नाटक विधानसभा ने मंगलवार को सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर पश्चिमी घाट के पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों यानी इकोलॉजिकली सेंसिटिव एरिया (ESA) को लेकर केंद्र सरकार की सातवीं मसौदा अधिसूचना को मौजूदा स्वरूप में स्वीकार नहीं करने का फैसला किया। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार द्वारा पेश प्रस्ताव को सदन ने सर्वसम्मति से मंजूरी दी। प्रस्ताव में पश्चिमी घाट के पर्यावरण संरक्षण की जरूरत को स्वीकार करते हुए स्थानीय लोगों की आजीविका, कृषि भूमि और बस्तियों से जुड़े मुद्दों का समाधान करने की मांग की गई है।

केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 27 जुलाई 2026 को कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशों के आधार पर सातवीं मसौदा अधिसूचना जारी की थी। राज्य को इस पर अपनी आपत्तियां और सुझाव देने के लिए 60 दिन का समय दिया गया था। इसी मुद्दे पर चर्चा के लिए कर्नाटक विधानमंडल का विशेष सत्र बुलाया गया।

पश्चिमी घाट को बताया महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन

मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने प्रस्ताव पेश करते हुए पश्चिमी घाट को कर्नाटक के सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र का संरक्षण जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन के लिए जरूरी है।

इसके साथ ही सरकार का तर्क है कि पर्यावरण संरक्षण की प्रक्रिया में वहां पीढ़ियों से रहने वाले किसानों, स्थानीय निवासियों और अन्य समुदायों के हितों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

सदन में सत्ता पक्ष और विपक्ष के सदस्यों ने पश्चिमी घाट के संरक्षण की आवश्यकता पर सहमति जताते हुए ESA सीमांकन के तरीके और स्थानीय आबादी पर उसके संभावित असर को लेकर चिंताएं रखीं।

10 जिलों का क्षेत्र प्रस्तावित ESA में

राज्य सरकार के अनुसार मसौदा अधिसूचना के दायरे में कर्नाटक के पश्चिमी घाट से जुड़े करीब 20,668 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को शामिल किया गया है। राज्य सरकार ने पहले विधानसभा में बताया था कि सातवीं अधिसूचना में 10 जिलों के 1,449 गांव शामिल हैं। कुछ अन्य आधिकारिक और मीडिया विवरणों में गांवों तथा तालुकों की संख्या अलग बताई गई है, लेकिन प्रस्तावित ESA का कुल क्षेत्र लगभग 20,668 वर्ग किलोमीटर है।

इन जिलों में बेलगावी, चामराजनगर, चिक्कमगलुरु, कोडागु, हासन, उत्तर कन्नड़, दक्षिण कन्नड़, मैसूरु, शिवमोग्गा और उडुपी शामिल हैं।

कृषि भूमि और मकानों को लेकर चिंता

विधानसभा के प्रस्ताव में प्रमुख आपत्ति इस बात को लेकर जताई गई कि ESA की सीमाओं में केवल प्राकृतिक वन क्षेत्र ही नहीं बल्कि कृषि भूमि, बागान, मकान और सार्वजनिक सुविधाओं वाले क्षेत्र भी आ सकते हैं।

राज्य का कहना है कि इससे संबंधित इलाकों में रहने वाले लोगों के बीच जमीन के इस्तेमाल, विकास कार्यों और भविष्य की आजीविका को लेकर आशंकाएं पैदा हुई हैं।

केंद्र की मसौदा अधिसूचना का उद्देश्य पश्चिमी घाट के संवेदनशील पर्यावरण की रक्षा करना है और इसमें खनन, उत्खनन तथा कुछ प्रदूषणकारी गतिविधियों पर प्रतिबंध प्रस्तावित हैं। दूसरी ओर राज्य के जनप्रतिनिधियों ने मांग की है कि संरक्षण के उपाय स्थानीय वास्तविकताओं और भूमि उपयोग की सटीक पहचान के आधार पर तय किए जाएं।

सैटेलाइट डेटा के आधार पर सीमांकन पर आपत्ति

कर्नाटक विधानसभा ने ESA की सीमाएं तय करने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। राज्य का प्रमुख तर्क है कि केवल उपग्रह आधारित आंकड़ों पर निर्भर रहने के बजाय जमीन पर वास्तविक स्थिति की जांच की जानी चाहिए।

मुख्यमंत्री शिवकुमार ने इससे पहले प्लॉट स्तर पर मैपिंग और आधुनिक तकनीक की मदद से वास्तविक वन क्षेत्र तथा कृषि भूमि को अलग-अलग पहचानने की जरूरत बताई थी। विपक्ष के नेता आर. अशोक ने भी केरल मॉडल की तर्ज पर भौतिक सर्वेक्षण कराने की मांग की थी।

सर्वे नंबर के आधार पर पहचान की मांग

राज्य में मांग उठी है कि ESA घोषित किए जाने वाले क्षेत्रों को गांव की पूरी सीमा के आधार पर निर्धारित करने के बजाय सर्वे नंबर स्तर पर चिह्नित किया जाए।

इससे यह स्पष्ट किया जा सकेगा कि कौन-सी जमीन वास्तव में प्राकृतिक वन क्षेत्र है और कौन-सी जमीन पर कृषि, बागवानी, मकान या दूसरी मानवीय गतिविधियां पहले से चल रही हैं।

सदन में यह चिंता भी सामने आई कि किसी गांव के एक हिस्से में वन क्षेत्र होने के आधार पर पूरे गांव को ESA के दायरे में रखना स्थानीय निवासियों के लिए समस्याएं पैदा कर सकता है। पारित प्रस्ताव ने इस दृष्टिकोण को अवैज्ञानिक बताते हुए अधिक विस्तृत जमीनी सर्वेक्षण की जरूरत पर जोर दिया।

जमीन से जुड़े लंबित मामलों का भी जिक्र

प्रस्ताव में बगर हुकुम भूमि, वन अधिकार अधिनियम के तहत दावे, डीम्ड फॉरेस्ट, भूमि अनुदान, अपील और अदालतों में लंबित मामलों जैसे मुद्दों का भी उल्लेख किया गया।

राज्य विधानसभा की राय है कि ESA की अंतिम सीमा तय करते समय इन जमीन संबंधी मामलों को पर्याप्त रूप से ध्यान में रखना आवश्यक है।

इन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग खेती और बागवानी पर निर्भर हैं। इसलिए जमीन की कानूनी स्थिति और उसके वास्तविक उपयोग की पहचान किए बिना व्यापक प्रतिबंध लागू करने को लेकर सदस्यों ने चिंता जताई।

एक साल का अतिरिक्त समय मांगा

विधानसभा द्वारा पारित प्रस्ताव में केंद्र से सातवीं मसौदा अधिसूचना को मौजूदा स्वरूप में अंतिम रूप नहीं देने के साथ राज्य को विस्तृत जमीनी सर्वेक्षण और वैज्ञानिक सीमांकन के लिए एक साल का अतिरिक्त समय देने की मांग भी की गई है।

राज्य सरकार का उद्देश्य इस अवधि में संबंधित क्षेत्रों का अधिक सटीक सर्वेक्षण कर केंद्र के सामने संशोधित विवरण रखना है।

पहले भी आपत्ति जता चुका है कर्नाटक

कर्नाटक सरकार कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के आधार पर ESA निर्धारण को लेकर पहले भी केंद्र के सामने अपनी आपत्तियां रख चुकी है। इससे पहले जारी छह मसौदा अधिसूचनाएं अंतिम रूप नहीं ले सकीं और जुलाई 2026 में केंद्र ने सातवीं मसौदा अधिसूचना जारी की।

कस्तूरीरंगन समिति ने पश्चिमी घाट के लगभग 37 प्रतिशत हिस्से को ESA के रूप में चिह्नित करने की सिफारिश की थी। समिति की रिपोर्ट 2013 में सामने आई थी और इसमें छह राज्यों के पश्चिमी घाट क्षेत्र शामिल थे।

केंद्र को भेजा जाएगा विधानसभा का प्रस्ताव

सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित होने के बाद अब कर्नाटक सरकार इसे केंद्र के सामने राज्य के आधिकारिक रुख के रूप में रखेगी। राज्य की मांग है कि पश्चिमी घाट का संरक्षण जारी रहे, लेकिन ESA की सीमाएं वास्तविक जमीनी स्थिति और स्थानीय लोगों के हितों को ध्यान में रखकर निर्धारित की जाएं।

इस मुद्दे पर कर्नाटक में सत्ता पक्ष और विपक्ष ने अंतिम प्रस्ताव पर एकजुट रुख अपनाया है। अब केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया और राज्य द्वारा मांगे गए अतिरिक्त समय पर होने वाला फैसला महत्वपूर्ण होगा।

Next Story