
Karnataka कर्नाटक: वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस के कुछ नेता इस प्रक्रिया को पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की चुनावी हार से जोड़ रहे हैं। उनका आरोप है कि SIR के दौरान बड़े पैमाने पर वोटरों के नाम हटाए जाने का असर चुनाव परिणामों पर पड़ा।
हालांकि, सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कर्नाटक कांग्रेस सरकार ने इस विवादित प्रक्रिया के खिलाफ औपचारिक विरोध दर्ज कराने से दूरी बनाए रखी है। सरकार की ओर से अब तक कोई आधिकारिक बयान या ठोस कदम नहीं उठाया गया है, जिससे राजनीतिक हलकों में कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
सूत्रों के अनुसार, राज्य कैबिनेट ने पिछले छह से सात बैठकों में SIR से जुड़े पूर्व-कार्यों और उसके संभावित प्रभावों की समीक्षा की है। इन बैठकों में प्रक्रिया के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा तो हुई, लेकिन इसके खिलाफ कोई औपचारिक निर्णय नहीं लिया गया।
कई नागरिक संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस प्रक्रिया में सुधार की मांग की है। इन समूहों का कहना है कि वोटर लिस्ट को ग्राम पंचायत और वार्ड स्तर पर सार्वजनिक किया जाना चाहिए ताकि पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके।
इसके अलावा, उन्होंने रिवीजन और अपील की अवधि को मौजूदा तीन महीने से बढ़ाकर छह महीने करने की भी मांग की है। उनका तर्क है कि कम समय सीमा के कारण कई पात्र मतदाता सूची से बाहर रह सकते हैं।
कुछ संगठनों ने यह भी सुझाव दिया है कि इस पूरी प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जानी चाहिए, ताकि इसके कानूनी और संवैधानिक पहलुओं की समीक्षा हो सके।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि SIR मुद्दा आने वाले समय में राज्य की राजनीति में और गर्मी ला सकता है, क्योंकि यह सीधे मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ है।
फिलहाल, सरकार की चुप्पी और विपक्षी आरोपों के बीच यह मुद्दा लगातार चर्चा में बना हुआ है। आने वाले दिनों में इस पर सरकार का रुख स्पष्ट होने की संभावना है।





