
Karnataka कर्नाटक: कन्नड़ भाषा अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। राज्य के CBSE स्कूलों में NCERT की तीसरी भाषा कन्नड़ पाठ्यपुस्तक (R3) को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या इससे कन्नड़ भाषा अधिनियम के वास्तविक उद्देश्य को पूरा किया जा रहा है या नहीं।
यह कानून सभी स्कूलों के लिए कन्नड़ भाषा को पहली या दूसरी भाषा के रूप में पढ़ाना अनिवार्य करता है, लेकिन इसके बावजूद CBSE और CISCE बोर्ड से जुड़े कई स्कूलों में इसके पालन को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। इसी कारण राज्य सरकार की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
आरोप लगाए जा रहे हैं कि सरकार इस कानून को सभी स्कूलों में प्रभावी रूप से लागू कराने में सक्षम नहीं दिख रही है। खासकर निजी और केंद्रीय बोर्ड से संबद्ध स्कूलों में कन्नड़ भाषा की अनिवार्यता को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
शिक्षा विशेषज्ञ वी. पी. निरंजनाराध्या, जो कन्नड़ भाषा अधिनियम के कार्यान्वयन की निगरानी के लिए गठित उच्च स्तरीय समिति के सदस्य भी हैं, ने इस मुद्दे पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि इस समिति का गठन वर्ष 2022 में कानून को प्रभावी ढंग से लागू करने के उद्देश्य से किया गया था, जिसकी अध्यक्षता राज्य के स्कूल शिक्षा मंत्री करते हैं।
उन्होंने कहा कि उन्हें याद नहीं कि समिति की पिछली बैठक कब हुई थी, जो इस बात का संकेत है कि इस दिशा में गंभीरता से काम नहीं किया जा रहा है। उनके अनुसार, यह स्थिति राज्य सरकार की कन्नड़ भाषा के प्रति प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े करती है।
निरंजनाराध्या ने कहा कि सरकार अपने ही बनाए कानून को लागू करने में असफल दिखाई दे रही है, जो न केवल प्रशासनिक कमजोरी को दर्शाता है बल्कि कन्नड़ भाषा के प्रति उदासीनता को भी उजागर करता है।
उन्होंने यह भी कहा कि जब कानून होने के बावजूद उसे जमीनी स्तर पर लागू नहीं किया जाता, तो यह भाषा संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक बड़ी बाधा बन जाता है। खासकर ऐसे समय में जब शिक्षा व्यवस्था में विविध बोर्डों की भागीदारी बढ़ रही है, तब स्थानीय भाषा को मजबूत करना और भी जरूरी हो जाता है।
इस मुद्दे पर शिक्षाविदों का मानना है कि कन्नड़ भाषा को स्कूलों में अनिवार्य रूप से लागू करने के लिए निगरानी व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है। साथ ही CBSE और CISCE स्कूलों में भी नियमों के पालन को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश लागू किए जाने चाहिए।
विवाद के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या केवल पाठ्यपुस्तक उपलब्ध कराना पर्याप्त है या फिर भाषा को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए व्यापक शैक्षणिक सुधारों की आवश्यकता है।
फिलहाल राज्य सरकार की ओर से इस आलोचना पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन इस मुद्दे ने शिक्षा नीति और क्षेत्रीय भाषा के संरक्षण को लेकर एक नई बहस जरूर छेड़ दी है।





