कर्नाटक

Karnataka HC: KPTCL को सुपरविज़न चार्ज बढ़ाने का अधिकार नहीं, नोटिस रद्द

Kavita2
27 Jun 2026 10:27 AM IST
Karnataka HC: KPTCL को सुपरविज़न चार्ज बढ़ाने का अधिकार नहीं, नोटिस रद्द
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Karnataka कर्नाटक: हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड (KPTCL) को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि KPTCL के पास अपने स्तर पर सुपरविज़न चार्ज बढ़ाने का कोई अधिकार नहीं है। इसी आधार पर कोर्ट ने एक डिमांड नोटिस को रद्द कर दिया है।

यह फैसला जस्टिस रवि वी होसमनी ने सुनाया, जिसमें महाराष्ट्र के कांदिवली स्थित अनुष्का रियल्टी इंक द्वारा दायर याचिका पर विचार किया गया था। याचिका में KPTCL द्वारा जारी किए गए भारी-भरकम सुपरविज़न चार्ज को चुनौती दी गई थी, जिसे अदालत ने असंगत पाया।

मामला बेंगलुरु के केआर पुरम होबली के क्यालसानाहल्ली गांव में एक मल्टी-स्टोरी रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट से जुड़ा है। याचिकाकर्ता कंपनी ने अपने प्रोजेक्ट के लिए 8459 किलोवाट बिजली आपूर्ति की मांग की थी। इस पर बेंगलुरु इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई कंपनी लिमिटेड (BESCOM) ने कुछ शर्तों के साथ बिजली आपूर्ति की मंजूरी दी थी।

इन शर्तों में अनुमानित लागत 4,35,82,608 रुपये का 10 प्रतिशत सुपरविज़न चार्ज शामिल था, जिसे अधिकतम 15,00,000 रुपये तक सीमित रखा गया था। यह व्यवस्था निर्धारित नियमों और स्वीकृत ढांचे के अनुसार तय की गई थी।

हालांकि, बाद में KPTCL ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए 1,20,49,000 रुपये का सुपरविज़न चार्ज डिमांड नोटिस जारी कर दिया। KPTCL ने अपने पक्ष में तर्क दिया कि कर्नाटक इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन (इलेक्ट्रिक सप्लाई एंड डिस्ट्रीब्यूशन) कोड के तहत सुपरविज़न चार्ज 2005 से संशोधित नहीं किए गए थे, इसलिए नए सिरे से शुल्क लगाया जाना उचित है।

इस डिमांड के खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट का रुख किया और तर्क दिया कि KPTCL को इस तरह के चार्ज तय करने या संशोधित करने का कानूनी अधिकार नहीं है। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि इलेक्ट्रिसिटी एक्ट के तहत KPTCL को केवल सीमित कार्य दिए गए हैं, जिनमें प्लानिंग, कोऑर्डिनेशन, ट्रांसमिशन और ऑपरेशनल जिम्मेदारियां शामिल हैं।

वकील ने यह भी कहा कि सुपरविज़न चार्ज तय करना या उसे संशोधित करना नियामक प्राधिकरण (Regulatory Authority) का कार्य है, न कि किसी ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन का। इसलिए KPTCL द्वारा जारी किया गया डिमांड नोटिस कानून के दायरे से बाहर है।

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया और स्पष्ट किया कि KPTCL अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर सुपरविज़न चार्ज नहीं बढ़ा सकता। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई कानूनी रूप से मान्य नहीं है।

अदालत ने अपने आदेश में यह भी माना कि नियामक ढांचे के अनुसार शुल्क निर्धारण का अधिकार केवल संबंधित आयोग या सक्षम प्राधिकरण को है, न कि कार्यान्वयन एजेंसियों को। इस आधार पर अदालत ने KPTCL द्वारा जारी डिमांड नोटिस को रद्द कर दिया।

इस फैसले को रियल एस्टेट और पावर सेक्टर से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है, क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि शुल्क निर्धारण की सीमाएं और अधिकार क्षेत्र क्या हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में बिजली परियोजनाओं और बड़े निर्माण प्रोजेक्ट्स में शुल्क विवादों को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। इससे यह भी स्पष्ट हुआ है कि किसी भी सरकारी या अर्ध-सरकारी संस्था को अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर वित्तीय निर्णय लेने का अधिकार नहीं है।

कुल मिलाकर, कर्नाटक हाई कोर्ट का यह निर्णय न केवल इस मामले में राहत देने वाला है, बल्कि यह प्रशासनिक अधिकारों और नियामक ढांचे की सीमाओं को भी स्पष्ट करता है।

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