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बेंगलुरु। कर्नाटक सरकार ने अस्पतालों में मरीजों को दी जाने वाली महंगी दवाओं और मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमतों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। राज्य सरकार की जांच में अस्पतालों की खरीद लागत यानी ‘लैंडिंग कॉस्ट’ और दवाओं पर छपी अधिकतम खुदरा कीमत यानी MRP के बीच बहुत बड़ा अंतर सामने आया है। कुछ मामलों में यह अंतर वास्तविक खरीद लागत से 10 गुना से लेकर 52 गुना से भी ज्यादा पाया गया है। इसके बाद कर्नाटक सरकार ने केंद्र सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप करने और दवाओं की कीमतों को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए कदम उठाने की मांग की है।
कर्नाटक फूड सेफ्टी एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की ओर से 1 अक्टूबर को जारी प्रेस नोट में इस संबंध में जानकारी दी गई। सरकार के मुताबिक हाल ही में कैंसर का इलाज करने वाले अस्पतालों में जांच की गई थी। इन अस्पतालों में कई महंगी दवाओं और मेडिकल कंज्यूमेबल्स का बड़े स्तर पर इस्तेमाल किया जाता है। जांच के दौरान उनकी खरीद कीमत और मरीजों से वसूली जाने वाली कीमतों की तुलना की गई।
जांच में सामने आया कि कई दवा कंपनियां अस्पतालों को दवाएं काफी कम ‘इंस्टीट्यूशनल प्राइस’ यानी संस्थागत कीमत पर उपलब्ध करा रही हैं। यह कीमत आम बाजार में छपी MRP से काफी कम होती है। इसके बावजूद कुछ मामलों में मरीजों से दवा के पैकेट पर छपी पूरी MRP या उसके आसपास की राशि वसूली जा रही है।
फूड सेफ्टी एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने इस कीमत के अंतर को लेकर चिंता जाहिर की है। सरकार का कहना है कि जब अस्पताल किसी दवा या मेडिकल उत्पाद को बहुत कम कीमत में खरीद रहे हैं और मरीज को वही उत्पाद कई गुना अधिक कीमत पर दिया जा रहा है, तो इससे इलाज का कुल खर्च तेजी से बढ़ जाता है।
खास तौर पर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में कई दवाएं पहले से ही महंगी होती हैं। मरीजों को लंबे समय तक इलाज कराना पड़ सकता है और कई प्रकार की दवाओं, इंजेक्शन और मेडिकल सामान की जरूरत पड़ती है। ऐसे में खरीद लागत और MRP के बीच बहुत ज्यादा अंतर सीधे मरीज और उसके परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ा सकता है।
जांच में सामने आए मामलों में कीमतों का अंतर 10 गुना से लेकर 52 गुना से अधिक तक बताया गया है। यानी कुछ मेडिकल उत्पाद अस्पतालों को जिस कीमत पर मिल रहे हैं, उनकी MRP उससे कई गुना अधिक दर्ज है। कर्नाटक सरकार ने इसे गंभीर मामला बताते हुए केंद्र से इसके नियमन पर विचार करने की मांग की है।
राज्य सरकार का कहना है कि अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली दवाओं और मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमतों में पारदर्शिता जरूरी है। मरीजों को यह पता होना चाहिए कि जिस दवा या मेडिकल सामग्री के लिए उनसे पैसे लिए जा रहे हैं, उसकी वास्तविक संस्थागत खरीद कीमत क्या है और उस पर कितना अतिरिक्त शुल्क लिया जा रहा है।
इस मामले में सरकार का मुख्य जोर दवा कंपनियों द्वारा अस्पतालों को दी जाने वाली संस्थागत कीमत और प्रिंटेड MRP के बीच अंतर पर है। बड़ी मात्रा में दवाएं खरीदने वाले अस्पतालों को कंपनियां सामान्य खुदरा बाजार की तुलना में काफी कम कीमत पर उत्पाद दे सकती हैं। इसके बावजूद पैकेट पर बहुत अधिक MRP छपी होने से मरीज से अधिक कीमत वसूलने की गुंजाइश बनी रहती है।
कर्नाटक सरकार का मानना है कि दवा और मेडिकल उत्पादों की कीमतों के इस मॉडल की समीक्षा की जरूरत है। खास तौर पर ऐसी दवाएं और मेडिकल कंज्यूमेबल्स, जिनका इस्तेमाल अस्पताल में भर्ती मरीज ही करते हैं, उनकी कीमत तय करने और मरीजों से शुल्क लेने की व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाया जाना चाहिए।
सरकार ने केंद्र से हस्तक्षेप की मांग इसलिए भी की है क्योंकि दवाओं की कीमतों से जुड़े कई महत्वपूर्ण नियामक अधिकार केंद्रीय स्तर पर हैं। ऐसे में राज्य सरकार चाहती है कि संस्थागत कीमत और MRP के बीच बहुत अधिक अंतर वाले मामलों की समीक्षा की जाए और जरूरत पड़ने पर उचित नियामक व्यवस्था बनाई जाए।
फूड सेफ्टी एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन की जांच का फोकस खास तौर पर ऐसे अस्पतालों पर रहा, जहां महंगे इलाज और दवाओं का इस्तेमाल होता है। कैंसर उपचार के दौरान मरीज को कई बार लंबे समय तक अस्पताल और विशेषज्ञ डॉक्टरों की सेवाओं की आवश्यकता होती है। इसके साथ महंगी दवाओं का खर्च भी जुड़ जाता है। ऐसे में दवाओं के दाम में कई गुना अंतर इलाज की लागत को और बढ़ा सकता है।
सरकार ने यह भी संकेत दिया है कि सिर्फ दवाओं ही नहीं, बल्कि अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले मेडिकल सामान और कंज्यूमेबल्स की कीमतों को लेकर भी इसी तरह की स्थिति हो सकती है। ये ऐसी वस्तुएं होती हैं जिनका इस्तेमाल इलाज या चिकित्सा प्रक्रिया के दौरान किया जाता है और जिनकी लागत मरीज के अस्पताल बिल में शामिल होती है।
कर्नाटक सरकार के इस कदम के बाद अस्पतालों में दवाओं के मूल्य निर्धारण और बिलिंग प्रक्रिया को लेकर नई बहस शुरू हो सकती है। एक ओर अस्पतालों में इलाज उपलब्ध कराने की लागत होती है, वहीं दूसरी ओर सरकार मरीजों से दवाओं और मेडिकल सामग्री के लिए वसूली जाने वाली राशि में पारदर्शिता सुनिश्चित करना चाहती है।
राज्य सरकार ने साफ किया है कि जांच में सामने आए कीमतों के बड़े अंतर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सरकार चाहती है कि केंद्र इस मामले की समीक्षा करे और ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जिससे मरीजों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ न पड़े।
फिलहाल कर्नाटक सरकार ने केंद्र सरकार के हस्तक्षेप की मांग करते हुए दवा और मेडिकल कंज्यूमेबल्स के संस्थागत खरीद मूल्य तथा MRP के बीच भारी अंतर का मुद्दा उठाया है। जांच में 10 गुना से लेकर 52 गुना से भी अधिक का अंतर सामने आने के बाद अब निगाह इस बात पर है कि दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता और मरीजों के हितों की सुरक्षा के लिए आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।
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