
कर्नाटक: राज्य के मलनाड क्षेत्रों में मॉनसून के आगमन के साथ ही मैक्रो-फोटोग्राफी और वन्यजीव पर्यटन का दौर एक बार फिर शुरू हो गया है। बारिश के मौसम में उभयचर जीवों, खासकर विभिन्न प्रजातियों के मेंढकों को देखने और उनकी तस्वीरें खींचने के लिए बड़ी संख्या में पर्यटक और फोटोग्राफर जंगलों की ओर रुख कर रहे हैं। हालांकि, इस बीच कुछ टूर ऑपरेटरों द्वारा वन विभाग की अनुमति के बिना कमर्शियल नाइट ट्रेल्स और ‘हर्पिंग’ (सरीसृप व उभयचरों की खोज से जुड़े टूर) आयोजित किए जाने को लेकर पर्यावरणविदों ने चिंता जताई है।
वन्यजीव कार्यकर्ताओं का कहना है कि मॉनसून का समय कई उभयचर प्रजातियों के प्रजनन का महत्वपूर्ण मौसम होता है। ऐसे में रात के समय जंगलों में होने वाली लगातार आवाजाही, तेज रोशनी, पर्यटकों की भीड़ और जीवों को पकड़कर या करीब से देखने की कोशिश उनके प्राकृतिक व्यवहार को प्रभावित कर सकती है।
कार्यकर्ताओं ने वन विभाग से मांग की है कि ऐसी गतिविधियों पर तुरंत निगरानी बढ़ाई जाए और बिना अनुमति चलाए जा रहे व्यावसायिक टूर पर रोक लगाई जाए। उनका कहना है कि वन्यजीव संरक्षण के नियमों का पालन किए बिना आयोजित किए जाने वाले ऐसे कार्यक्रम जैव विविधता के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं।
मलनाड क्षेत्र अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए जाना जाता है। पश्चिमी घाट का यह इलाका कई दुर्लभ और स्थानिक प्रजातियों का प्राकृतिक आवास है। मॉनसून के दौरान यहां की हरियाली, छोटे जलस्रोत और अनुकूल वातावरण बड़ी संख्या में उभयचरों को सक्रिय कर देते हैं। इसी कारण यह क्षेत्र प्रकृति प्रेमियों और फोटोग्राफरों के बीच लोकप्रिय हो गया है।
हाल के वर्षों में मैक्रो-फोटोग्राफी और हर्पिंग टूरिज्म तेजी से बढ़ा है। कई टूर ऑपरेटर सोशल मीडिया के माध्यम से ऐसे पैकेजों का प्रचार कर रहे हैं, जिनमें रात के समय जंगल भ्रमण, मेंढकों और अन्य छोटे जीवों की फोटोग्राफी तथा विशेषज्ञों के साथ वन्यजीव अवलोकन का दावा किया जाता है।
वन्यजीव कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इनमें से कई गतिविधियां आवश्यक अनुमति और पर्यावरणीय नियमों का पालन किए बिना संचालित की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि पर्यटन को बढ़ावा देना गलत नहीं है, लेकिन यह प्रकृति और वन्यजीवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए होना चाहिए।
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, उभयचर जीव पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य के संकेतक माने जाते हैं। मेंढकों की कई प्रजातियां केवल विशेष मौसम और परिस्थितियों में ही प्रजनन करती हैं। ऐसे समय में उनके आवास में हस्तक्षेप होने से उनकी संख्या और व्यवहार पर असर पड़ सकता है।
कार्यकर्ताओं ने यह भी चिंता जताई है कि कुछ पर्यटक बेहतर तस्वीर लेने के लिए जीवों को छूने, स्थान बदलने या उन्हें रोशनी के संपर्क में लंबे समय तक रखने की कोशिश करते हैं। इससे जीवों को तनाव हो सकता है और उनके प्राकृतिक चक्र में बाधा पहुंच सकती है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऐसे कई टूर पैकेजों के प्रचार को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। वन्यजीव प्रेमियों का कहना है कि ऑनलाइन प्रचार के कारण बड़ी संख्या में लोग इन गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं, जिससे संवेदनशील क्षेत्रों पर दबाव बढ़ रहा है।
वन विभाग से जुड़े अधिकारियों ने हालांकि अभी तक सभी गतिविधियों पर आधिकारिक कार्रवाई की जानकारी नहीं दी है, लेकिन पर्यावरण संगठनों की शिकायतों के बाद निगरानी बढ़ाने की मांग तेज हो गई है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि विभाग को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने चाहिए, ताकि पर्यटन और संरक्षण के बीच संतुलन बनाया जा सके।
स्थानीय लोगों का कहना है कि मॉनसून पर्यटन से क्षेत्र के लोगों को रोजगार के अवसर मिलते हैं, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि ऐसे टूर आयोजित किए जाते हैं तो प्रशिक्षित गाइड, सीमित संख्या में पर्यटक और वन विभाग के नियमों का पालन अनिवार्य किया जाना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि जिम्मेदार वन्यजीव पर्यटन से लोगों में प्रकृति के प्रति जागरूकता बढ़ सकती है। लेकिन अनियंत्रित और व्यावसायिक गतिविधियां लंबे समय में पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
मलनाड क्षेत्रों में मॉनसून के दौरान बढ़ती मैक्रो-फोटोग्राफी गतिविधियों के बीच अब वन विभाग की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। पर्यावरणविदों की मांग है कि जैव विविधता वाले क्षेत्रों में किसी भी व्यावसायिक गतिविधि से पहले अनुमति, वैज्ञानिक निगरानी और संरक्षण नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाए, ताकि पश्चिमी घाट की अनमोल प्राकृतिक संपदा सुरक्षित रह सके।





