
बेंगलुरु: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के वैज्ञानिकों की एक टीम ने 18 मई को चंद्रयान-3 के विक्रम लैंडर द्वारा चंद्रमा पर किए गए ‘हॉप’ प्रयोग और ‘चंद्रमा की सतह के थर्मोफिजिकल प्रयोग’ (ChaSTE) के नतीजों की एक रिपोर्ट साझा की।
शोधकर्ताओं ने बताया, “हालांकि हम इसे अक्सर ‘चंद्रमा की मिट्टी’ कहते हैं, लेकिन इसके लिए ज़्यादा सही शब्द ‘चंद्रमा का रेगोलिथ’ है। चंद्रमा का रेगोलिथ असल में टूटी हुई चट्टानें होती हैं—कांच जैसे छोटे-छोटे, नुकीले टुकड़े जो खुरदरे होते हैं और हर चीज़ से चिपक जाते हैं।”
उन्होंने यह भी बताया कि रेगोलिथ की जटिल बनावट में कुछ अनोखे भू-तकनीकी और थर्मोफिजिकल गुण होते हैं। उन्होंने कहा कि रेगोलिथ की ऊपरी 2-6 सेंटीमीटर परत बहुत ज़्यादा चिपचिपी और अत्यधिक छिद्रपूर्ण पाई गई है, जो एक ‘थर्मल कंबल’ (गर्मी रोकने वाली परत) की तरह काम कर सकती है।
ISRO के वैज्ञानिकों ने कहा, “किसी अंतरिक्ष यात्री के लिए इसका मतलब यह है कि सतह पर चलना उन्हें सूखे आटे पर चलने जैसा महसूस हो सकता है, जबकि बस कुछ इंच नीचे ही स्थिति अलग होती है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि कुछ सेंटीमीटर की उस छोटी सी गहराई पर भी, रेगोलिथ का घनत्व (bulk density) 750 से बढ़कर 1600 किलोग्राम प्रति घन मीटर (kg m⁻³) हो जाता है।”
चंद्रमा के रेगोलिथ के थर्मल और भौतिक गुणों को समझना वैज्ञानिक और तकनीकी, दोनों ही नज़रियों से ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि रेगोलिथ की थर्मोफिजिकल विशेषताओं में कुछ सवालों के जवाब छिपे हैं—जैसे कि चंद्रमा सूरज से मिलने वाली गर्मी को कैसे संभालता है, या वह कितनी गर्मी सोखता है और कितनी वापस अंतरिक्ष में भेज देता है।





