
हुबली। केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने मंगलवार को कर्नाटक के गन्ना किसानों से अपील की कि वे गन्ने के लिए अधिक उचित और लाभकारी मूल्य यानी FRP की मांग को लेकर सड़क पर आंदोलन करने के बजाय दिल्ली आकर केंद्र सरकार से सीधे बातचीत करें। जोशी ने भरोसा दिलाया कि किसानों की मांगों पर चर्चा की जाएगी और संबंधित सिफारिशों पर विचार किया जाएगा।
जोशी की यह अपील ऐसे समय में आई है जब कर्नाटक राज्य रैथा संघ और अन्य किसान संगठनों ने हुबली में बड़े विरोध प्रदर्शन की तैयारी की है। किसान गन्ने की कीमत बढ़ाने, चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य में वृद्धि और अन्य मांगों को लेकर केंद्रीय मंत्री के आवास और कार्यालय तक मार्च करने की योजना बना चुके हैं।
जोशी ने एक वीडियो संदेश जारी करते हुए किसानों से कहा कि वे किसी भी समय दिल्ली आ सकते हैं और अपनी मांगों पर चर्चा कर सकते हैं। उन्होंने कहा, “मैं आपसे आग्रह करता हूं कि आप किसी भी समय दिल्ली आएं और हमसे बातचीत करें। किसी को भी सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन करने की जरूरत नहीं है। आप आएं, हम इस विषय पर चर्चा करेंगे।”
किसान संगठनों का मुख्य मुद्दा गन्ने के लिए अधिक लाभकारी मूल्य तय करना है। अलग-अलग संगठनों ने अलग-अलग स्तर पर मांगें रखी हैं। कुछ किसान नेताओं ने प्रति टन गन्ने के लिए 5,500 रुपये तक का भाव तय करने की मांग की है, जबकि कुछ संगठनों ने कम से कम 4,500 रुपये प्रति टन FRP की मांग उठाई है।
किसानों का कहना है कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है। खाद, मजदूरी, परिवहन और सिंचाई पर खर्च बढ़ने के साथ कई इलाकों में बारिश की कमी से उत्पादन भी प्रभावित हुआ है। ऐसे में मौजूदा गन्ना मूल्य उनके लिए पर्याप्त नहीं है। इसी कारण किसान केंद्र और राज्य सरकार से मूल्य निर्धारण के तरीके में बदलाव की मांग कर रहे हैं।
हुबली में प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन को लेकर किसानों ने पहले ही व्यापक तैयारी की थी। कर्नाटक राज्य रैता संघ और हसिरु सेना के नेताओं ने 29 सितंबर को केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी के आवास के बाहर प्रदर्शन का आह्वान किया था। संगठन ने गन्ना उत्पादकों से बड़ी संख्या में हुबली पहुंचने की अपील की थी।
प्रदर्शनकारी किसान केवल गन्ने के दाम तक अपनी मांग सीमित नहीं रखे हुए हैं। कुछ संगठनों ने चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य यानी MSP को भी बढ़ाने की मांग की है। किसान नेताओं का कहना है कि यदि चीनी मिलों को बाजार में बेहतर कीमत मिलेगी तो वे गन्ना उत्पादकों को अधिक भुगतान करने की स्थिति में होंगी।
किसान संगठनों ने एथेनॉल की खरीद कीमत बढ़ाने की मांग भी रखी है। उनका तर्क है कि चीनी उद्योग से जुड़े अतिरिक्त उत्पादों से मिलों की आमदनी बढ़ने पर इसका लाभ गन्ना किसानों तक पहुंचना चाहिए। कुछ किसान नेताओं ने एथेनॉल की कीमत और उसकी खरीद नीति में बदलाव की मांग की है।
दूसरी ओर प्रह्लाद जोशी ने किसानों से आंदोलन से पहले बातचीत का रास्ता अपनाने की अपील की है। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार किसानों के मुद्दों पर चर्चा के लिए तैयार है। जोशी ने संकेत दिया कि संबंधित विभागों और कृषि क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों की सिफारिशों को भी देखा जाएगा और उसके बाद किसानों की चिंताओं का समाधान निकालने की कोशिश की जाएगी।
जोशी केंद्र सरकार में खाद्य और सार्वजनिक वितरण से जुड़े विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, इसलिए गन्ना और चीनी उद्योग से जुड़े कई मुद्दे सीधे उनके मंत्रालय से जुड़े हैं। किसानों ने इसी वजह से हुबली स्थित उनके आवास को प्रदर्शन का प्रमुख केंद्र बनाया है।
कर्नाटक देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में शामिल है। राज्य के उत्तरी हिस्सों में बड़ी संख्या में किसान गन्ने पर निर्भर हैं। बेलगावी, बागलकोट, विजयपुरा, हावेरी और आसपास के क्षेत्रों में गन्ना किसानों की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है। कीमतों में मामूली बदलाव का असर भी बड़ी संख्या में किसान परिवारों और चीनी मिलों पर पड़ता है।
इस बार किसानों की नाराजगी सूखे की स्थिति और बढ़ती खेती लागत के कारण अधिक दिखाई दे रही है। कई किसान संगठनों का कहना है कि कम बारिश से पैदावार पर असर पड़ा है, लेकिन खर्च में कमी नहीं आई। ऐसे में वे चाहते हैं कि गन्ने का मूल्य उत्पादन लागत और वर्तमान बाजार परिस्थितियों के आधार पर बढ़ाया जाए।
किसानों ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की मांग भी उठाई है। हुबली में होने वाले प्रदर्शन से पहले किसान नेताओं ने कहा था कि गन्ने का वैज्ञानिक तरीके से मूल्य निर्धारण होना चाहिए और किसानों को उत्पादन लागत के ऊपर पर्याप्त लाभ मिलना चाहिए।
जोशी के दिल्ली आने के निमंत्रण के बाद अब नजर किसान संगठनों के रुख पर है। यदि संगठन बातचीत का प्रस्ताव स्वीकार करते हैं तो गन्ना मूल्य, चीनी MSP और एथेनॉल दरों जैसे मुद्दों पर केंद्र और किसानों के बीच विस्तृत चर्चा हो सकती है।
हालांकि किसान संगठनों ने अभी तक अपनी घोषित मांगों से पीछे हटने का संकेत नहीं दिया है। कई नेताओं का कहना है कि उनकी मांग लंबे समय से लंबित है और इस बार ठोस निर्णय होना चाहिए। आंदोलन की घोषणा भी इसी दबाव को बढ़ाने के उद्देश्य से की गई थी।
जोशी ने अपने संदेश में किसी टकराव के बजाय बातचीत को प्राथमिकता देने पर जोर दिया। उन्होंने किसानों से कहा कि वे दिल्ली आएं और अपनी समस्याएं सीधे सरकार के सामने रखें। उनका कहना है कि बातचीत के लिए दरवाजे खुले हैं और सड़क पर प्रदर्शन की जरूरत नहीं है।
फिलहाल गन्ने के FRP को लेकर किसानों और केंद्र सरकार के बीच बातचीत की संभावना बनती दिखाई दे रही है। किसान संगठनों की ओर से तय प्रदर्शन और जोशी के दिल्ली बुलावे के बीच अगला कदम महत्वपूर्ण होगा। यदि दोनों पक्ष बातचीत की मेज पर आते हैं तो गन्ने की कीमत से जुड़े लंबे समय से उठ रहे मुद्दों पर समाधान की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता खुल सकता है।





