
बेंगलुरु: कर्नाटक विधान परिषद के पूर्व सभापति बसवराज होरट्टी ने अपने पद से इस्तीफा देने के बाद राज्य सरकार और पार्टी नेतृत्व के रवैये पर नाराजगी जताई है। उन्होंने कहा कि सरकार के इस कदम से उन्हें बेहद दुख हुआ। उन्हें महसूस हुआ कि सरकार और नेतृत्व को अब उन पर भरोसा नहीं है, इसलिए ऐसे हालात में पद पर बने रहना उचित नहीं होगा। होरट्टी ने कहा कि अब वह विधान परिषद में एक सामान्य सदस्य के रूप में अपनी भूमिका निभाएंगे।
पत्रकारों से बातचीत में होरट्टी ने अपने इस्तीफे को लेकर कई सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आखिर उन्होंने ऐसा क्या गलत किया था, जिसके कारण उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की जरूरत पड़ी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न तो उन्होंने भ्रष्टाचार किया और न ही किसी तरह की गड़बड़ी की। ऐसे में उनके खिलाफ कार्रवाई किए जाने का कोई ठोस आधार नहीं था।
‘मैंने क्या गलत किया?’
बसवराज होरट्टी ने कहा कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान नियमों के अनुसार काम किया और किसी तरह की अनियमितता नहीं की। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा, “मैंने क्या गलत किया? क्या मैंने भ्रष्टाचार किया? क्या मैंने कोई गड़बड़ी की?”
पूर्व सभापति ने कहा कि उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की कोई वजह नहीं थी। उनके मुताबिक, यदि किसी पदाधिकारी के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई की जाती है तो उसके पीछे ठोस कारण होना चाहिए। उन्होंने कहा कि उनके मामले में ऐसा कोई कारण नहीं था, जिसे सार्वजनिक रूप से बताया जा सके।
होरट्टी ने यह भी कहा कि सरकार के रवैये से उन्हें यह महसूस हुआ कि नेतृत्व को अब उन पर भरोसा नहीं है। ऐसे में उन्होंने पद पर बने रहने के बजाय इस्तीफा देना बेहतर समझा।
मुख्यमंत्री के घर जाने को बताया अपनी गलती
होरट्टी ने स्वीकार किया कि वह मुख्यमंत्री के घर गए थे। उन्होंने कहा कि उनका मुख्यमंत्री के घर जाना उनकी गलती थी और उन्हें वहां नहीं जाना चाहिए था। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि केवल इस वजह से उनके खिलाफ इस तरह की कार्रवाई किया जाना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री के आवास पर जाने की घटना को लेकर जिस तरह से मामला आगे बढ़ा, उससे उन्हें दुख हुआ। होरट्टी ने कहा कि अब वह इस प्रकरण को पीछे छोड़कर विधान परिषद के सामान्य सदस्य के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाएंगे।
पार्टी के लेटरहेड पर सभापति के नाम की घोषणा पर सवाल
पूर्व सभापति ने पार्टी आलाकमान की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पूरे देश में पहली बार पार्टी के लेटरहेड पर विधान परिषद के सभापति के नाम की घोषणा की गई। उनके अनुसार, इस तरह की प्रक्रिया सही नहीं है।
होरट्टी ने कहा कि किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को लेकर इस प्रकार की घोषणा करना उचित परंपरा नहीं है। उन्होंने इसे गलत कदम बताते हुए कहा कि इस तरह की प्रक्रिया से पद की गरिमा प्रभावित होती है।
उन्होंने कहा कि विधान परिषद के सभापति का पद संवैधानिक और महत्वपूर्ण है। इसलिए इस पद को लेकर राजनीतिक फैसलों और घोषणाओं में उचित प्रक्रिया और परंपराओं का पालन किया जाना चाहिए।
इस्तीफे को लेकर पहले हुई थी बातचीत
बसवराज होरट्टी ने बताया कि विधान परिषद के चेयरमैन पद से इस्तीफा देने को लेकर उन्होंने पहले मुख्यमंत्री से बातचीत की थी। उनके अनुसार, बातचीत के दौरान 14 अगस्त को इस्तीफा देने पर सहमति बनी थी। लेकिन बाद में परिस्थितियां बदल गईं।
होरट्टी का कहना है कि मुख्यमंत्री की ओर से लगातार दबाव बनाए जाने के कारण उन्हें निर्धारित तारीख से पहले ही इस्तीफा देना पड़ा। उन्होंने बताया कि अंततः उन्हें 7 अगस्त को इस्तीफा देना पड़ा।
इस घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में चर्चा को और तेज कर दिया है। इस्तीफे की तारीख को लेकर होरट्टी का बयान बताता है कि उनके और सरकार के बीच इस मुद्दे पर सहमति नहीं बन सकी थी।
अब सामान्य सदस्य के तौर पर निभाएंगे भूमिका
इस्तीफा देने के बाद होरट्टी ने स्पष्ट किया कि वह विधान परिषद की राजनीति से अलग नहीं होंगे। उन्होंने कहा कि अब वह सदन में एक सामान्य सदस्य के रूप में हिस्सा लेंगे। उनका कहना है कि पद चला जाने के बावजूद वह अपनी जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटेंगे।
उन्होंने संकेत दिया कि वह सदन में अपनी बात पहले की तरह रखते रहेंगे और जनता से जुड़े मुद्दों को उठाते रहेंगे। उनके लंबे राजनीतिक अनुभव को देखते हुए आने वाले समय में भी विधान परिषद में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रह सकती है।
सरकार के फैसले से दुखी
होरट्टी ने कहा कि राज्य सरकार के कदम से उन्हें व्यक्तिगत रूप से काफी दुख पहुंचा है। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभाने की कोशिश की। इसके बावजूद यदि सरकार को उन पर भरोसा नहीं रहा तो उनके लिए पद पर बने रहना उचित नहीं था।
उनके बयान से यह भी स्पष्ट है कि इस्तीफा केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक और व्यक्तिगत असंतोष भी जुड़ा हुआ है। उन्होंने अपने खिलाफ लगाए जा रहे सवालों और अविश्वास की स्थिति पर खुलकर नाराजगी जाहिर की।
बसवराज होरट्टी के इस्तीफे और उनके बयानों ने कर्नाटक की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। एक ओर वह अपने खिलाफ कार्रवाई का आधार पूछ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पार्टी नेतृत्व और सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री के घर जाने को अपनी गलती माना है, लेकिन इसे अपने खिलाफ कार्रवाई का पर्याप्त कारण नहीं मानते।
अब होरट्टी विधान परिषद में सभापति की कुर्सी के बजाय एक सामान्य सदस्य के रूप में नजर आएंगे। उनके बयान से संकेत मिलता है कि वह आने वाले दिनों में सदन के भीतर और बाहर इस मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते रहेंगे। दूसरी ओर, सरकार और पार्टी नेतृत्व की ओर से इस घटनाक्रम पर आगे क्या प्रतिक्रिया आती है, इस पर भी राजनीतिक नजरें टिकी रहेंगी।





