
कोप्पल। कर्नाटक के कोप्पल जिले में चारे की गंभीर कमी ने पशुपालकों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। गंगवती तालुक के बोम्मासागर गांव के रहने वाले चरवाहे कृष्णप्पा कटापुर और उनके परिवार को अपने 400 से ज्यादा मवेशियों के साथ करीब 200 किलोमीटर दूर हावेरी तालुक की ओर जाना पड़ा। परिवार का कहना है कि स्थानीय स्तर पर पर्याप्त हरा चारा नहीं मिलने और खेतों में फसल सूखने के कारण उनके पास दूसरे जिले की ओर जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा।
कृष्णप्पा कटापुर के परिवार ने बताया कि धान की बुवाई में देरी और पानी की कमी के कारण खेतों के अंतिम हिस्सों तक पर्याप्त सिंचाई नहीं पहुंच सकी। इससे कई जगह फसलें सूख गईं और पशुओं के लिए उपलब्ध हरे चारे में भारी कमी आ गई। हालात इतने खराब हो गए कि पशुपालकों को अपने मवेशियों के साथ लंबी दूरी तय करनी पड़ी।
परिवार के मुताबिक वे 400 से ज्यादा मवेशियों को लेकर हावेरी तालुक पहुंचे हैं, जहां उन्हें उम्मीद है कि खेतों और ग्रामीण इलाकों में पशुओं के लिए पर्याप्त चारा मिल सकेगा। इतने बड़े झुंड के साथ यात्रा करना आसान नहीं है। मवेशियों के लिए पानी, चारा और सुरक्षित ठहरने की व्यवस्था करना परिवार के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।
कृष्णप्पा ने बताया कि कोप्पल जिले में कई अन्य चरवाहे भी इसी तरह की समस्या का सामना कर रहे हैं। उनके मुताबिक बड़ी संख्या में पशुपालक अपने मवेशियों के साथ जिले से बाहर निकल चुके हैं और ऐसे इलाकों की तलाश कर रहे हैं जहां हरा चारा और पानी उपलब्ध हो।
स्थानीय चरवाहों का कहना है कि क्षेत्र की झीलें सूख चुकी हैं और पिछले दो सीजन से चारे की समस्या लगातार बनी हुई है। इसका एक बड़ा कारण तुंगभद्रा बांध में पानी का कम स्तर बताया जा रहा है। बांध में पर्याप्त पानी नहीं होने से सिंचाई व्यवस्था प्रभावित हुई और इसका असर धान समेत कई फसलों पर पड़ा।
धान की खेती को पर्याप्त पानी की जरूरत होती है। लेकिन इस बार कई क्षेत्रों में बुवाई समय पर नहीं हो सकी। जिन किसानों ने बुवाई की भी, उनके खेतों के अंतिम छोर तक पर्याप्त पानी नहीं पहुंच पाया। इससे फसल कमजोर हुई और कुछ जगह पूरी तरह सूख गई।
धान की फसल कटने या बढ़ने के बाद उसका अवशेष पशुओं के लिए महत्वपूर्ण चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन जब फसल ही कमजोर हो या खेत सूख जाएं तो पशुपालकों को यह सहारा भी नहीं मिल पाता। यही वजह है कि कोप्पल के कई चरवाहों के सामने पशुओं को खिलाने का संकट खड़ा हो गया है।
चरवाहों का कहना है कि यह स्थिति केवल कुछ दिनों की नहीं है। पिछले दो सीजन से उन्हें पर्याप्त चारा जुटाने में कठिनाई हो रही है। पहले आसपास के गांवों और खेतों से पशुओं के लिए चारा मिल जाता था, लेकिन लगातार पानी की कमी के कारण अब स्थानीय विकल्प तेजी से घट रहे हैं।
झीलों और छोटे जलस्रोतों के सूखने से समस्या और गंभीर हो गई है। पशुओं को केवल चारे की ही नहीं, बल्कि प्रतिदिन बड़ी मात्रा में पानी की भी जरूरत होती है। ऐसे में सूखे क्षेत्रों में मवेशियों को लंबे समय तक रखना मुश्किल हो जाता है।
कृष्णप्पा और उनके परिवार जैसे पारंपरिक चरवाहों के लिए पशुधन ही आजीविका का मुख्य आधार है। दूध, पशुओं की खरीद-बिक्री और अन्य पशुपालन गतिविधियों से परिवार की आमदनी जुड़ी होती है। यदि मवेशियों को पर्याप्त चारा नहीं मिलता है तो उनका स्वास्थ्य और दूध उत्पादन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।
400 से अधिक मवेशियों के साथ करीब 200 किलोमीटर की यात्रा अपने आप में बड़ी चुनौती है। परिवार को रास्ते में ऐसे स्थान तलाशने पड़ते हैं जहां मवेशियों को कुछ समय चरने दिया जा सके। इसके साथ ही सड़क यातायात और पशुओं की सुरक्षा का भी ध्यान रखना पड़ता है।
हावेरी क्षेत्र की ओर जाने के पीछे मुख्य वजह वहां अपेक्षाकृत बेहतर चारा उपलब्ध होने की उम्मीद बताई जा रही है। चरवाहे ऐसे खेतों और इलाकों की तलाश करते हैं जहां फसल अवशेष या प्राकृतिक घास मिल सके। यदि एक स्थान पर चारा खत्म हो जाए तो उन्हें फिर दूसरे क्षेत्र की ओर बढ़ना पड़ता है।
स्थानीय पशुपालकों का कहना है कि यदि आने वाले महीनों में स्थिति नहीं सुधरी तो और अधिक परिवार अपने पशुओं के साथ पलायन कर सकते हैं। खासकर गर्मी बढ़ने के साथ पानी और चारे की मांग और बढ़ जाएगी।
पशुपालकों की सबसे बड़ी मांग यह है कि सूखा प्रभावित और चारा संकट वाले क्षेत्रों में प्रशासन समय रहते चारा उपलब्ध कराए। यदि स्थानीय स्तर पर चारा केंद्र या अस्थायी वितरण व्यवस्था बनाई जाए तो उन्हें सैकड़ों किलोमीटर दूर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
इसके अलावा पशुओं के लिए पीने के पानी की व्यवस्था भी जरूरी है। गांवों में सूखी झीलों और तालाबों की स्थिति को देखते हुए टैंकर या अन्य माध्यम से पानी उपलब्ध कराने की जरूरत महसूस की जा रही है।
कोप्पल जिले में कृषि और पशुपालन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। खेतों से मिलने वाला भूसा और फसल अवशेष पशुओं के चारे का महत्वपूर्ण स्रोत होता है। लेकिन जब सिंचाई प्रभावित होती है और फसल उत्पादन घटता है तो इसका सीधा असर पशुपालकों पर पड़ता है।
तुंगभद्रा बांध में कम पानी का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं रहा। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था का वह हिस्सा भी प्रभावित हुआ है जो पशुपालन पर निर्भर है। चरवाहों के मुताबिक पानी की कमी ने पिछले दो वर्षों में उनकी परेशानी लगातार बढ़ाई है।
फिलहाल कृष्णप्पा कटापुर और उनका परिवार अपने 400 से ज्यादा मवेशियों के साथ हावेरी क्षेत्र में चारे की तलाश कर रहा है। उनके लिए यह यात्रा मजबूरी बन गई है। परिवार को उम्मीद है कि वहां कुछ समय तक पशुओं के लिए पर्याप्त भोजन और पानी मिल सकेगा।
कोप्पल में कई अन्य चरवाहों की भी यही स्थिति बताई जा रही है। सूखी झीलें, कमजोर फसल और कम होते हरे चारे ने उन्हें अपने गांव छोड़ने पर मजबूर किया है। यदि जल और चारा संकट जारी रहा तो आने वाले महीनों में पशुपालकों का यह मौसमी पलायन और बढ़ सकता है।





