कर्नाटक

उत्तर कन्नड़ में 110 एकड़ वन भूमि पर सरकार का कब्जा

Kavita2
24 Aug 2026 10:58 AM IST
उत्तर कन्नड़ में 110 एकड़ वन भूमि पर सरकार का कब्जा
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उत्तर कन्नड़। कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले में वन विभाग ने पश्चिमी घाट के महत्वपूर्ण वन्यजीव गलियारे से जुड़ी 110 एकड़ वन भूमि को रविवार को अपने कब्जे में ले लिया। यह जमीन सिरसी-बनावसी हाईवे से जुड़ी हुई है और इसकी व्यावसायिक कीमत 100 करोड़ रुपये से अधिक आंकी गई है। अधिकारियों के अनुसार, यह कार्रवाई लंबे समय से लंबित भूमि विवाद और लीज की अवधि समाप्त होने के बाद जमीन वापस लेने की प्रक्रिया के तहत की गई।

यह 110 एकड़ भूमि उस कुल 389.07 एकड़ वन भूमि का हिस्सा है, जिसे सरकार ने कामधेनु कोऑपरेटिव मिल्क एंड फ्रूट प्रोसेसिंग सोसाइटी को लीज पर दिया था। बताया गया है कि इस जमीन की लीज वर्ष 1989 में समाप्त हो गई थी, लेकिन इसके बावजूद वन विभाग लंबे समय तक पूरी जमीन को अपने कब्जे में वापस नहीं ले सका।

1989 में समाप्त हो गई थी लीज

अधिकारियों के मुताबिक, सरकार ने 389.07 एकड़ वन भूमि को संबंधित सहकारी संस्था को निर्धारित अवधि के लिए लीज पर दिया था। लीज की अवधि 1989 में समाप्त हो जाने के बाद जमीन को वापस सरकार के कब्जे में आना था।

हालांकि, लीज समाप्त होने के बावजूद भूमि का कब्जा वापस लेने की प्रक्रिया लंबे समय तक पूरी नहीं हो सकी। इस दौरान जमीन के अधिकार और कब्जे को लेकर विवाद की स्थिति बनी रही।

वन विभाग की ओर से जमीन वापस लेने की पहले भी कोशिश की गई थी, लेकिन यह प्रयास सफल नहीं हो सका। अधिकारियों के अनुसार, पहले की कोशिश में प्रक्रियात्मक और कानूनी विवाद पैदा हो गया था, जिसके बाद मामला अदालत तक पहुंच गया।

हाई कोर्ट के आदेश के बाद कार्रवाई

मामले में जमीन पर अपना अधिकार जताने वाले पक्षों ने बेदखली की कार्रवाई को चुनौती देने के लिए हाई कोर्ट का रुख किया था। हालांकि, वे अदालत में विभाग की कार्रवाई पर रोक हासिल करने में सफल नहीं रहे।

अदालत के आदेश में वन विभाग को कानून के अनुसार जमीन का कब्जा वापस लेने की अनुमति दी गई थी। इसके बाद विभाग ने रविवार को कार्रवाई करते हुए खाली पड़ी 110 एकड़ जमीन को अपने कब्जे में ले लिया।

इस कार्रवाई की अगुवाई सिरसी के डिप्टी कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट संदीप सूर्यवंशी ने की। वन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी पुलिस बल की सहायता से मौके पर पहुंचे और जमीन का कब्जा विभाग के नियंत्रण में लिया।

पुलिस की मौजूदगी में हुई कार्रवाई

कब्जा लेने की कार्रवाई के दौरान किसी तरह की अप्रिय स्थिति से बचने के लिए पुलिस की मौजूदगी सुनिश्चित की गई थी। अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर जमीन की स्थिति का निरीक्षण किया और खाली हिस्से को वन विभाग के नियंत्रण में ले लिया।

अधिकारियों के अनुसार, जिस 110 एकड़ जमीन का कब्जा लिया गया है, उसका बड़ा हिस्सा खाली था। इसी वजह से इसे वापस लेने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान रही।

वन विभाग अब जमीन के भविष्य के इस्तेमाल और इसके संरक्षण से जुड़े पहलुओं का आकलन कर सकता है। चूंकि यह क्षेत्र पश्चिमी घाट के वन्यजीव गलियारे का हिस्सा रहा है, इसलिए पर्यावरणीय दृष्टि से भी जमीन का महत्व काफी अधिक माना जा रहा है।

389.07 एकड़ जमीन को चार हिस्सों में बांटने की संभावना

जमीन के इस्तेमाल और मौजूदा स्थिति का विश्लेषण शुरू करने के बाद वन विभाग को पता चला कि 389.07 एकड़ भूमि को चार अलग-अलग समूहों में विभाजित किया जा सकता है।

इनमें खाली पड़ी जमीन एक बड़ा हिस्सा है। विभाग ने इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए जमीन की मौजूदा स्थिति, उपयोग और कब्जे से जुड़े दस्तावेजों का अध्ययन शुरू किया।

अधिकारियों ने जमीन से जुड़े कानूनी मामलों को लेकर अदालत में कैविएट भी दाखिल की। कैविएट दाखिल करने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि भविष्य में संबंधित पक्ष इस मामले में कोई नई कानूनी चुनौती देता है, तो अदालत किसी आदेश से पहले वन विभाग का पक्ष भी सुने।

पश्चिमी घाट के वन्यजीव गलियारे का हिस्सा

जिस जमीन पर वन विभाग ने कब्जा लिया है, उसका महत्व केवल व्यावसायिक कीमत तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र पश्चिमी घाट के वन्यजीव गलियारे से जुड़ा हुआ है। पश्चिमी घाट जैव विविधता की दृष्टि से देश के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में शामिल है।

वन क्षेत्रों के बीच मौजूद ऐसे गलियारे वन्यजीवों की प्राकृतिक आवाजाही के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। इन क्षेत्रों में मानव गतिविधियों और निर्माण का विस्तार होने से वन्यजीवों के आवागमन पर असर पड़ सकता है।

ऐसे में 110 एकड़ वन भूमि को वापस वन विभाग के कब्जे में लिया जाना संरक्षण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विभाग को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि भूमि का उपयोग वन और वन्यजीव संरक्षण के उद्देश्यों के अनुरूप हो।

100 करोड़ रुपये से अधिक की व्यावसायिक कीमत

अधिकारियों के अनुसार, 110 एकड़ जमीन की कमर्शियल वैल्यू 100 करोड़ रुपये से अधिक है। सिरसी-बनावसी हाईवे से जुड़ी होने के कारण जमीन का स्थान इसे आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाता है।

हालांकि, वन विभाग के लिए प्राथमिकता जमीन के व्यावसायिक मूल्य के बजाय इसके कानूनी और पर्यावरणीय दर्जे को बनाए रखना है। लीज अवधि समाप्त होने के बाद जमीन को सरकारी नियंत्रण में वापस लेने की कार्रवाई इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।

लंबे विवाद के बाद मिली सफलता

वन विभाग के लिए यह कार्रवाई इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लीज समाप्त होने के करीब तीन दशक से अधिक समय बाद खाली जमीन का एक बड़ा हिस्सा वापस कब्जे में लिया गया है।

पहले की असफल कोशिश और उसके बाद पैदा हुए कानूनी विवाद के कारण जमीन की वापसी में लंबा समय लगा। अब हाई कोर्ट के आदेश के बाद विभाग ने पुलिस की सहायता से कार्रवाई पूरी की है।

आगे की प्रक्रिया पर नजर

वन विभाग द्वारा 110 एकड़ जमीन पर कब्जा लेने के बाद अब बाकी भूमि की स्थिति पर भी नजर रहेगी। विभाग 389.07 एकड़ जमीन के अलग-अलग हिस्सों की स्थिति का अध्ययन कर रहा है और यह देखा जा रहा है कि कौन-सा हिस्सा खाली है तथा किस हिस्से का इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए किया जा रहा है।

फिलहाल रविवार की कार्रवाई के साथ वन विभाग ने 110 एकड़ खाली वन भूमि को अपने नियंत्रण में ले लिया है। हाईवे से जुड़ी और पश्चिमी घाट के वन्यजीव गलियारे के लिहाज से महत्वपूर्ण इस जमीन की वापसी को विभाग की बड़ी कार्रवाई माना जा रहा है। अब आगे की प्रक्रिया में जमीन के संरक्षण, रिकॉर्ड के अद्यतन और शेष भूमि को लेकर कानूनी स्थिति स्पष्ट करने पर ध्यान दिया जाएगा।

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