
कर्नाटक : शेट्टिहल्ली वाइल्डलाइफ़ सैंक्चुअरी की सीमा को लेकर एक बार फिर विवाद तेज हो सकता है। सोमवार को स्टेट बोर्ड ऑफ़ वाइल्डलाइफ़ यानी SBWL ने शिवमोगा सर्कल के मुख्य वन संरक्षक यानी CCF की रिपोर्ट को स्वीकार करने का फैसला किया। इसके बाद अब राज्य सरकार के इस अभयारण्य की सीमा को लेकर अपने पुराने रुख को दोबारा दोहराने की संभावना जताई जा रही है।
मामला शेट्टिहल्ली वाइल्डलाइफ़ सैंक्चुअरी के क्षेत्रफल में कथित कमी से जुड़ा है। जुलाई 2025 में सेंट्रल एम्पावर्ड कमिटी यानी CEC के समक्ष एक शिकायत की गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि वाइल्डलाइफ़ प्रोटेक्शन एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए सैंक्चुअरी का क्षेत्र 695.6 वर्ग किलोमीटर से घटाकर 395.6 वर्ग किलोमीटर कर दिया गया।
यानी शिकायत के मुताबिक, लगभग 300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को अभयारण्य की सीमा से बाहर कर दिया गया था। इसी मुद्दे को लेकर लंबे समय से वन्यजीव संरक्षण से जुड़े समूह और स्थानीय स्तर पर भी सवाल उठते रहे हैं।
इस शिकायत के बाद संबंधित वन अधिकारियों से रिपोर्ट मांगी गई थी। शिवमोगा सर्कल के CCF ने मामले की समीक्षा के बाद अपनी रिपोर्ट तैयार की थी। अब स्टेट बोर्ड ऑफ़ वाइल्डलाइफ़ ने उस रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया है, जिससे सरकार के रुख को लेकर आगे की दिशा तय होने की संभावना है।
शेट्टिहल्ली वाइल्डलाइफ़ सैंक्चुअरी कर्नाटक के महत्वपूर्ण वन्यजीव क्षेत्रों में शामिल है। यह इलाका जैव विविधता, वन क्षेत्र और कई वन्यजीव प्रजातियों के आवास के लिहाज से संवेदनशील माना जाता है। ऐसे में इसकी सीमा में किसी भी तरह की कमी या बदलाव को लेकर पर्यावरण और वन्यजीव कानूनों के तहत गंभीर सवाल उठते हैं।
शिकायतकर्ताओं का मुख्य आरोप यही था कि सैंक्चुअरी की मूल अधिसूचना में लगभग 695.6 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र शामिल था, लेकिन बाद में प्रभावी सीमा करीब 395.6 वर्ग किलोमीटर रह गई। उनका कहना था कि यदि किसी अधिसूचित वन्यजीव क्षेत्र की सीमा में बदलाव किया जाता है, तो इसके लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन जरूरी है।
वाइल्डलाइफ़ प्रोटेक्शन एक्ट के तहत संरक्षित क्षेत्रों की अधिसूचना और उनकी सीमाओं में बदलाव से जुड़ी प्रक्रिया काफी संवेदनशील होती है। किसी क्षेत्र को सैंक्चुअरी घोषित करने का उद्देश्य वहां मौजूद वन्यजीवों, प्राकृतिक आवास और पारिस्थितिकी तंत्र को दीर्घकालिक सुरक्षा देना होता है।
इसी वजह से शेट्टिहल्ली के क्षेत्रफल में कथित कमी को केवल प्रशासनिक बदलाव के रूप में नहीं देखा जा रहा। यह मामला इस सवाल से भी जुड़ा है कि संरक्षित वन क्षेत्र की सीमा तय करने में मूल अधिसूचना, राजस्व रिकॉर्ड और बाद की सरकारी कार्रवाइयों में किसे प्राथमिकता दी जाए।
SBWL द्वारा CCF की रिपोर्ट स्वीकार किए जाने के बाद अब सरकार यह तर्क दोहरा सकती है कि वर्तमान सीमा निर्धारण में कोई कानूनी उल्लंघन नहीं हुआ या फिर यह स्थिति पुराने रिकॉर्ड और प्रशासनिक व्याख्या के अनुरूप है। हालांकि सरकार की ओर से अंतिम और विस्तृत आधिकारिक स्थिति सामने आने के बाद ही तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट होगी।
मामले में CEC की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट से जुड़े पर्यावरण और वन मामलों में सेंट्रल एम्पावर्ड कमिटी कई महत्वपूर्ण मामलों की जांच और समीक्षा करती रही है। जुलाई 2025 में की गई शिकायत के बाद इस विवाद को औपचारिक रूप से उच्च स्तर पर उठाया गया था।
अब वन विभाग की रिपोर्ट स्वीकार होने से इस मामले में राज्य सरकार का पक्ष और अधिक स्पष्ट हो सकता है। हालांकि शिकायतकर्ताओं की आपत्तियां खत्म होंगी या नहीं, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं और वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों की चिंता यह है कि यदि संरक्षित क्षेत्र का दायरा कम होता है तो इसका असर वन्यजीव आवास, जंगलों की निरंतरता और मानव-वन्यजीव संघर्ष पर पड़ सकता है। बड़े और जुड़े हुए वन क्षेत्र कई प्रजातियों के लिए जरूरी होते हैं क्योंकि वन्यजीव भोजन, पानी और प्रजनन के लिए विस्तृत इलाकों में आवाजाही करते हैं।
दूसरी ओर सरकार और वन विभाग को जमीन के रिकॉर्ड, पुराने नोटिफिकेशन, स्थानीय आबादी और प्रशासनिक सीमाओं जैसे कई पहलुओं को भी ध्यान में रखना पड़ता है। ऐसे मामलों में अक्सर ऐतिहासिक रिकॉर्ड और मौजूदा जमीनी स्थिति के बीच अंतर सामने आता है।
शेट्टिहल्ली वाइल्डलाइफ़ सैंक्चुअरी का यह विवाद इसी तरह की जटिलता को दर्शाता है। एक ओर मूल अधिसूचना में बताए गए क्षेत्रफल का सवाल है, तो दूसरी ओर दशकों के दौरान हुए प्रशासनिक और भौगोलिक बदलावों की व्याख्या भी महत्वपूर्ण है।
SBWL का ताजा फैसला इस विवाद में नया मोड़ माना जा रहा है। CCF की रिपोर्ट को स्वीकार करने के बाद अब राज्य सरकार इस रिपोर्ट को आधार बनाकर CEC या अन्य संबंधित मंचों के सामने अपना पक्ष रख सकती है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि सरकार शेट्टिहल्ली वाइल्डलाइफ़ सैंक्चुअरी की वैध सीमा किस क्षेत्रफल को मानती है और उस दावे के समर्थन में कौन से दस्तावेज और कानूनी आधार प्रस्तुत करती है।
आने वाले समय में इस मामले पर वन विभाग, राज्य सरकार और पर्यावरण से जुड़े पक्षों की प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं। यदि विवाद जारी रहता है तो यह मामला आगे भी कानूनी और प्रशासनिक समीक्षा के दायरे में रह सकता है।





