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कर्नाटक में अदरक की खेती पर संकट, चार साल में 39% घटा रकबा

Kavita2
18 Oct 2026 11:35 AM IST
कर्नाटक में अदरक की खेती पर संकट, चार साल में 39% घटा रकबा
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बेंगलुरु। कर्नाटक में अदरक की खेती लगातार चुनौतियों का सामना कर रही है। फसलों में फैल रही बीमारियों, खेती की बढ़ती लागत और रासायनिक कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल से मिट्टी की उर्वरता प्रभावित होने की आशंकाओं के बीच बड़ी संख्या में किसान अदरक की खेती से दूरी बना रहे हैं। कर्नाटक राज्य मसाला विकास बोर्ड से संबंधित उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021-22 में प्रदेश में 45,859 हेक्टेयर भूमि पर अदरक की खेती होती थी, लेकिन वर्ष 2025-26 में यह रकबा घटकर 27,961 हेक्टेयर रह गया। इसी अवधि में उत्पादन लगभग पांच लाख टन से घटकर 3.3 लाख टन पर पहुंच गया। इस गिरावट ने किसानों की आय, कृषि उत्पादन और मसाला उद्योग के भविष्य को लेकर चिंता बढ़ा दी है। हालांकि, विभिन्न कृषि आंकड़ा स्रोतों में कुछ अंतर है, इसलिए इन आंकड़ों को राज्य मसाला विकास बोर्ड से संबंधित उपलब्ध विवरण के आधार पर प्रस्तुत किया जा रहा है।

चार वर्षों में 17,898 हेक्टेयर घटा खेती का रकबा

कर्नाटक में अदरक उत्पादन से जुड़े आंकड़े खेती के बदलते रुझान को दर्शाते हैं।

वर्ष 2021-22 में राज्य के किसानों ने 45,859 हेक्टेयर क्षेत्र में अदरक की खेती की थी। उस समय राज्य में लगभग पांच लाख टन अदरक का उत्पादन हुआ था।

इसके विपरीत वर्ष 2025-26 में खेती का क्षेत्रफल घटकर केवल 27,961 हेक्टेयर रह गया। यानी चार वर्षों में लगभग 17,898 हेक्टेयर क्षेत्र अदरक की खेती से बाहर हो गया।

यह करीब 39 प्रतिशत की गिरावट है। उत्पादन में भी लगभग 34 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई है।

इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि अदरक की खेती का क्षेत्रफल तेजी से कम हुआ है। हालांकि, उत्पादन में गिरावट के पीछे क्षेत्रफल घटने के अलावा मौसम, रोग प्रकोप और अन्य परिस्थितियों की भूमिका का अलग से आकलन जरूरी है।

फसलों में फैल रही बीमारियों से किसानों की मुश्किलें बढ़ीं

कर्नाटक में अदरक की खेती के सामने प्रमुख चुनौती फसलों में लगने वाली बीमारियां हैं।

भारतीय मसाला अनुसंधान संस्थान (ICAR-IISR) के वैज्ञानिकों ने राज्य के कोडागु जिले में अदरक की फसल को प्रभावित करने वाले एक नए फफूंदजनित रोग की पहचान की थी।

यह रोग पाइरिकुलेरिया नामक रोगजनक से जुड़ा है। इसके कारण अदरक की पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और उन पर गहरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं।

संक्रमण अधिक फैलने पर पत्तियां समय से पहले सूख सकती हैं। इससे पौधों की वृद्धि और अदरक की गांठों के विकास पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, वर्ष 2024 में कोडागु और वर्ष 2025 में मैसूर समेत अन्य क्षेत्रों में इस रोग का प्रकोप देखा गया।

शिवमोग्गा में भी सामने आईं गंभीर बीमारियां

कर्नाटक के शिवमोग्गा जिले में भी अदरक की फसल पर विभिन्न रोगों का असर देखा गया है।

वर्ष 2025 में किए गए एक वैज्ञानिक अध्ययन में शिवमोग्गा जिले के सात तालुकों के 59 गांवों में स्थित 66 खेतों का सर्वेक्षण किया गया।

अध्ययन में अदरक की फसल पर बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट, ब्लास्ट और लीफ स्पॉट जैसी बीमारियों का प्रकोप सामने आया।

शोधकर्ताओं ने पाया कि कई खेतों में संक्रमण मध्यम से गंभीर स्तर तक पहुंच चुका था।

ऐसी बीमारियां किसानों की उत्पादन लागत बढ़ा सकती हैं, क्योंकि प्रभावित फसलों के उपचार और प्रबंधन के लिए अतिरिक्त संसाधनों की जरूरत पड़ती है।

कीटनाशकों का अत्यधिक इस्तेमाल भी चिंता का विषय

अदरक की फसल को बीमारियों और कीटों से बचाने के लिए किसान विभिन्न प्रकार के कृषि रसायनों का उपयोग करते हैं।

हालांकि, रासायनिक कीटनाशकों और फफूंदनाशकों का अनियंत्रित या आवश्यकता से अधिक इस्तेमाल मिट्टी की गुणवत्ता तथा पर्यावरण के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए जैविक पदार्थों, उचित फसल चक्र और संतुलित पोषण प्रबंधन का उपयोग महत्वपूर्ण है।

एक ही खेत में लगातार अदरक की खेती करने से कुछ मिट्टीजनित रोगों का खतरा भी बढ़ सकता है।

इसलिए केवल रसायनों पर निर्भर रहने के बजाय वैज्ञानिक तरीके से रोग प्रबंधन अपनाने की आवश्यकता है।

हालांकि, राज्य में अदरक की खेती का घटता क्षेत्रफल सीधे तौर पर कीटनाशकों के इस्तेमाल के कारण ही कम हुआ है, इसकी पुष्टि के लिए विस्तृत अध्ययन जरूरी होगा।

खेती की बढ़ती लागत से प्रभावित हो रही किसानों की आमदनी

अदरक की खेती में बीज, मजदूरी, सिंचाई, खाद, रोग प्रबंधन और फसल कटाई पर काफी खर्च आता है।

यदि फसल में बीमारी लग जाए या बाजार में उचित कीमत न मिले, तो किसानों के सामने आर्थिक नुकसान का खतरा बढ़ जाता है।

कर्नाटक में अदरक उत्पादन पर किए गए एक कृषि आर्थिक अध्ययन में भी खेती के क्षेत्रफल, उत्पादन और उत्पादकता में उतार-चढ़ाव को महत्वपूर्ण समस्या बताया गया था।

अध्ययन के अनुसार, सॉफ्ट रॉट जैसी बीमारियां, अपर्याप्त फसल प्रबंधन और मौसम संबंधी परिस्थितियां उत्पादन में अस्थिरता का कारण बन सकती हैं।

इससे किसानों के लिए अदरक की खेती से मिलने वाली संभावित आमदनी का अनुमान लगाना कठिन हो जाता है।

अदरक उत्पादन में गिरावट का बाजार पर भी पड़ सकता है असर

कर्नाटक देश के महत्वपूर्ण अदरक उत्पादक राज्यों में शामिल है। यहां उत्पादित अदरक का उपयोग घरेलू उपभोग के अलावा मसाला प्रसंस्करण और अन्य खाद्य उत्पादों में होता है।

अदरक की खेती का रकबा घटने से राज्य की कुल आपूर्ति क्षमता प्रभावित हो सकती है।

यदि उत्पादन में गिरावट बनी रहती है, तो व्यापारियों और प्रसंस्करण उद्योगों को दूसरे उत्पादक राज्यों से अधिक मात्रा में अदरक मंगाने की जरूरत पड़ सकती है।

हालांकि, बाजार में अदरक की कीमतें केवल एक राज्य के उत्पादन पर निर्भर नहीं करतीं। देश के अन्य हिस्सों में फसल की स्थिति, परिवहन लागत, मांग और भंडारण व्यवस्था भी कीमतों को प्रभावित करती हैं।

वैज्ञानिक खेती और रोग प्रबंधन पर जोर

अदरक की खेती को दोबारा लाभकारी बनाने के लिए कृषि वैज्ञानिक बेहतर रोग प्रबंधन और स्वस्थ रोपण सामग्री के इस्तेमाल को महत्वपूर्ण मानते हैं।

भारतीय मसाला अनुसंधान संस्थान ने किसानों को रोगमुक्त बीज अदरक का चयन करने, खेतों में जल निकासी की व्यवस्था बनाए रखने और संक्रमण के शुरुआती लक्षणों की निगरानी करने की सलाह दी है।

संस्थान के अनुसार, लगातार नमी और अनुकूल तापमान की स्थिति में कुछ फफूंदजनित रोग तेजी से फैल सकते हैं।

ऐसे में किसानों को रोग की सही पहचान के बाद ही वैज्ञानिक सलाह के अनुसार उपचार करना चाहिए।

किसानों को तकनीकी सहायता और प्रशिक्षण की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि अदरक उत्पादक किसानों को समय पर तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है।

इसके लिए कृषि और बागवानी विभागों के माध्यम से मिट्टी परीक्षण, रोग पहचान, फसल चक्र और सुरक्षित कीटनाशक उपयोग के संबंध में जागरूकता बढ़ाई जा सकती है।

किसानों को बेहतर किस्मों की रोपण सामग्री और वैज्ञानिक खेती के तरीकों से भी लाभ मिल सकता है।

विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां फसल रोगों का प्रकोप लगातार सामने आ रहा है, नियमित खेत निरीक्षण और कृषि वैज्ञानिकों की सलाह उपयोगी साबित हो सकती है।

अदरक की खेती को बचाना बड़ी चुनौती

कर्नाटक में अदरक की खेती का रकबा वर्ष 2021-22 के 45,859 हेक्टेयर से घटकर वर्ष 2025-26 में 27,961 हेक्टेयर रह जाना कृषि क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण चिंता का विषय है।

चार वर्षों में लगभग 39 प्रतिशत क्षेत्रफल और करीब 34 प्रतिशत उत्पादन घटने से किसानों के सामने नई चुनौतियां पैदा हुई हैं।

फसल रोगों की रोकथाम, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना और खेती की लागत नियंत्रित करना अब प्रमुख जरूरतों में शामिल है।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक खेती, बेहतर रोग प्रबंधन और किसानों को पर्याप्त तकनीकी सहायता उपलब्ध कराकर अदरक उत्पादन में स्थिरता लाने की दिशा में प्रयास किए जा सकते हैं।

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