
Karnataka कर्नाटक: कर्नाटक के इतिहास से जुड़ी एक महत्वपूर्ण खोज में गडग जिले के मेवुंडी गांव में राष्ट्रकूट काल का एक दुर्लभ शिलालेख मिला है। यह शिलालेख किसी साधारण योद्धा या राजा की वीरता की कहानी नहीं बताता, बल्कि एक ऐसे सेवक की याद में स्थापित किया गया है जिसने अपने स्वामी के प्रति अत्यधिक निष्ठा दिखाते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया था।
यह शिलालेख हाल ही में इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वाले शोधकर्ताओं की एक टीम को मिला, जो राज्य के विभिन्न हिस्सों में वीरगल्लू पत्थरों पर अध्ययन कर रही थी। इस टीम का नेतृत्व शोधकर्ता श्वेता भस्मे कर रही थीं, जो वीरगल्लू पत्थरों पर एक विस्तृत शोध पत्र तैयार कर रही हैं। इसी अध्ययन के दौरान यह दुर्लभ ऐतिहासिक शिलालेख सामने आया।
शिलालेख के अनुसार, यह घटना राष्ट्रकूट काल की है, जब आज के कर्नाटक के लक्ष्मेश्वर क्षेत्र, जिसे उस समय पुलिगेरे कहा जाता था, पर कुप्पे उरासा नामक एक राजा का शासन था। बताया जाता है कि राजा की बीमारी के कारण मृत्यु हो गई थी, जिसके बाद उनके करीबी सेवक रत्तेयन्ना ने अपने स्वामी के प्रति गहरी भक्ति और वफादारी का उदाहरण प्रस्तुत किया।
इतिहासकारों के अनुसार, शिलालेख में दर्ज विवरण बताता है कि रत्तेयन्ना ने राजा की मृत्यु के बाद उनके प्रति अपनी निष्ठा प्रकट करते हुए आत्मबलिदान का निर्णय लिया। यह घटना उस समय की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं को भी दर्शाती है, जहां राजभक्ति और स्वामी-सेवक संबंध को अत्यधिक महत्व दिया जाता था।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह शिलालेख न केवल एक ऐतिहासिक दस्तावेज है, बल्कि यह उस युग की सामाजिक संरचना, विश्वास प्रणाली और राजनीतिक व्यवस्था को समझने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वीरगल्लू पत्थर अक्सर युद्ध में वीरता दिखाने वाले योद्धाओं की स्मृति में बनाए जाते थे, लेकिन यह शिलालेख एक सेवक की निष्ठा और बलिदान की अनोखी कहानी को सामने लाता है।
श्वेता भस्मे और उनकी टीम ने बताया कि यह खोज कर्नाटक के इतिहास में एक महत्वपूर्ण जोड़ है, क्योंकि यह राष्ट्रकूट काल की सामाजिक परंपराओं और मानवीय संबंधों पर नई रोशनी डालती है। उन्होंने कहा कि ऐसे शिलालेख प्राचीन भारत की संस्कृति और मूल्यों को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण स्रोत हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के ऐतिहासिक अवशेष न केवल अतीत को समझने में मदद करते हैं, बल्कि यह भी बताते हैं कि उस समय समाज में वफादारी, सम्मान और त्याग जैसे मूल्यों को कितना महत्व दिया जाता था।
फिलहाल इस शिलालेख को संरक्षित करने और विस्तृत अध्ययन के लिए पुरातत्व विभाग को सौंपने की प्रक्रिया पर काम किया जा रहा है। उम्मीद की जा रही है कि आगे के शोध से राष्ट्रकूट काल के इतिहास से जुड़े और भी महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।





