
Karnataka कर्नाटक: गदग जिले के बेटागेरी इलाके में एक प्राचीन और दुर्लभ मूर्ति मिलने से इतिहासकारों और शोधकर्ताओं में उत्सुकता बढ़ गई है। यह मूर्ति अब तक स्थानीय लोगों द्वारा भगवान ब्रह्मा की प्रतिमा मानकर पूजा की जा रही थी, लेकिन हालिया अध्ययन में इसके स्वरूप को लेकर नया तथ्य सामने आया है।
जानकारी के अनुसार, बेटागेरी के गारगीपेट इलाके में स्थित इस मूर्ति को वर्षों से लोग ब्रह्मा देव की प्रतिमा समझकर पूजा करते आ रहे थे। लेकिन हाल ही में ब्रह्मा और सूर्य देव की मूर्तियों पर शोध कर रही विशेषज्ञों की एक टीम ने इस मूर्ति का विस्तृत अध्ययन किया। जांच के बाद यह पुष्टि हुई कि यह वास्तव में तीन चेहरों वाले सूर्य देव की एक अत्यंत दुर्लभ प्रतिमा है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह मूर्ति सूर्य देव के तीन अलग-अलग रूपों—सुबह, दोपहर और शाम—का प्रतीक मानी जाती है। यह धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण खोज मानी जा रही है, क्योंकि इस प्रकार की मूर्तियां बहुत कम स्थानों पर पाई जाती हैं।
मूर्ति काले-नीले पत्थर से बनी हुई है और इसमें सूर्य देव को खड़े हुए स्वरूप में दर्शाया गया है। प्रतिमा में सूर्य देव के चार हाथ दिखाए गए हैं, जिनमें वे कमल की कली पकड़े हुए दिखाई देते हैं। उनके सिर पर एक ऊंचा मुकुट है, गले में आभूषण हैं और कंधों पर भी सजावट की गई है। मूर्ति के कमर हिस्से पर पुराने समय के घिसे-पिटे निशान भी स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं, जो इसके प्राचीन होने का संकेत देते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मूर्ति न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि यह उस समय की कला और शिल्प कौशल का भी एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। तीन चेहरों वाला सूर्य देव का स्वरूप भारतीय प्राचीन मूर्तिकला में एक दुर्लभ अवधारणा माना जाता है, जो समय और दिन के विभिन्न चरणों को दर्शाता है।
शोधकर्ताओं की टीम ने बताया कि इस मूर्ति का अध्ययन आगे भी जारी रहेगा, ताकि इसके ऐतिहासिक काल, निर्माण शैली और सांस्कृतिक महत्व के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त की जा सके। इसके लिए मूर्ति की संरचना और पत्थर की गुणवत्ता का भी वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाएगा।
स्थानीय लोगों के लिए यह खोज आश्चर्य का विषय बनी हुई है, क्योंकि वे अब तक इस प्रतिमा को ब्रह्मा देव की मानकर पूजा करते थे। नई जानकारी सामने आने के बाद लोगों में उत्सुकता और श्रद्धा दोनों ही देखने को मिल रही है।
पुरातत्व विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की खोजें क्षेत्र के इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यह मूर्ति संभवतः किसी प्राचीन मंदिर या धार्मिक स्थल का हिस्सा रही होगी, जिसे समय के साथ भुला दिया गया या पुनः स्थापित किया गया।
फिलहाल, इस दुर्लभ मूर्ति को लेकर अध्ययन और शोध जारी है और उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में इसके बारे में और भी महत्वपूर्ण तथ्य सामने आएंगे।





