
बेंगलुरु। कर्नाटक में नया शैक्षणिक सत्र शुरू हुए करीब दो महीने बीत चुके हैं, लेकिन राज्य के कई निजी स्कूलों में अब तक विद्यार्थियों को सभी पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध नहीं हो पाई हैं। बिना सरकारी सहायता प्राप्त और सरकारी सहायता प्राप्त निजी स्कूलों के प्रबंधन संगठनों का कहना है कि किताबों के लिए 100 प्रतिशत भुगतान किए जाने के बावजूद कई पुस्तकों की आपूर्ति अब तक नहीं हुई है। स्कूलों के सामने एक और समस्या यह है कि जून में जरूरत के अनुसार मंगाए जाने वाले दूसरे ऑर्डर की प्रक्रिया भी अभी शुरू नहीं हुई है।
पुस्तकों की कमी का सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ रहा है। स्कूल प्रबंधन के अनुसार, कई छात्र उपलब्ध पुस्तकों की फोटोकॉपी के सहारे कक्षाओं में पढ़ाई कर रहे हैं। इससे न केवल बच्चों पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है, बल्कि नियमित पढ़ाई और शिक्षण प्रक्रिया भी प्रभावित हो रही है।
पहला ऑर्डर जनवरी में दिया गया था
कर्नाटक में स्कूल प्रबंधन संगठनों का कहना है कि किताबों का पहला ऑर्डर जनवरी में ही दिया गया था। स्कूलों ने पिछले वर्ष उपलब्ध प्रवेश आंकड़ों के आधार पर पुस्तकों की जरूरत का अनुमान लगाकर संबंधित जानकारी दी थी।
हालांकि, स्कूलों में नया सत्र शुरू होने के बाद विद्यार्थियों की संख्या में बदलाव होना सामान्य प्रक्रिया है। कुछ कक्षाओं में नए प्रवेश होते हैं, जबकि कुछ विद्यार्थी स्कूल छोड़ देते हैं। ऐसे में वास्तविक जरूरत का पता चलने के बाद अतिरिक्त पुस्तकों के लिए दूसरा ऑर्डर दिया जाता है।
एसोसिएटेड मैनेजमेंट ऑफ प्राइमरी एंड सेकेंडरी स्कूल्स के महासचिव डी. शशि कुमार ने आरोप लगाया कि इस वर्ष अभी तक दूसरे ऑर्डर की प्रक्रिया शुरू नहीं की गई है। उनके मुताबिक, इसका सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ रहा है।
100 फीसदी भुगतान के बाद भी आपूर्ति अधूरी
निजी स्कूल संगठनों का कहना है कि स्कूलों ने किताबों के पहले ऑर्डर के लिए पूरी राशि का भुगतान किया है। इसके बावजूद कई विषयों की पुस्तकें स्कूलों तक नहीं पहुंची हैं। स्कूल प्रबंधन का कहना है कि जब पूरी राशि का भुगतान पहले ही किया जा चुका है, तो पुस्तकों की आपूर्ति में देरी समझ से परे है।
स्कूलों के सामने अब यह सवाल भी है कि जब विद्यार्थियों की संख्या में बदलाव के बाद अतिरिक्त किताबों की जरूरत है, तो दूसरा ऑर्डर कब लिया जाएगा। स्कूल संगठनों का कहना है कि यदि अतिरिक्त पुस्तकों की प्रक्रिया जल्द शुरू नहीं हुई तो समस्या और गंभीर हो सकती है।
फोटोकॉपी से पढ़ाई कर रहे छात्र
किताबों की कमी के चलते कई स्कूलों में विद्यार्थियों को उपलब्ध पुस्तकों की फोटोकॉपी उपलब्ध कराई जा रही है। छात्र इन फोटोकॉपी के माध्यम से कक्षा में पढ़ाई कर रहे हैं और शिक्षक भी इन्हीं सामग्री के आधार पर पाठ्यक्रम आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि, स्कूल प्रबंधन का कहना है कि फोटोकॉपी स्थायी समाधान नहीं है। विद्यार्थियों के लिए पूरी पाठ्यपुस्तक उपलब्ध होना जरूरी है, ताकि वे घर पर भी नियमित रूप से पढ़ाई और अभ्यास कर सकें। अलग-अलग अध्यायों की फोटोकॉपी संभालना भी छोटे बच्चों के लिए मुश्किल हो सकता है।
इसके अलावा, फोटोकॉपी की गुणवत्ता और पन्नों के व्यवस्थित होने को लेकर भी समस्याएं सामने आ सकती हैं। रंगीन चित्रों, नक्शों और अन्य शैक्षणिक सामग्री वाले विषयों में फोटोकॉपी मूल किताब का विकल्प नहीं बन सकती।
एडमिशन बढ़ने से बढ़ी जरूरत
स्कूल प्रबंधन के अनुसार, किताबों की मांग का आकलन एक निश्चित समय पर उपलब्ध प्रवेश आंकड़ों के आधार पर किया जाता है। जनवरी में जब पहला ऑर्डर दिया गया था, तब स्कूलों ने पिछले वर्ष के प्रवेश आंकड़ों के आधार पर पुस्तकों की संख्या बताई थी।
नया सत्र शुरू होने के बाद कई स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी। ऐसे में अतिरिक्त किताबों की जरूरत पैदा हुई। इसी कारण जून में दूसरा ऑर्डर किया जाना था। स्कूल संगठनों का आरोप है कि इस साल दूसरा ऑर्डर अब तक नहीं लिया गया है।
डी. शशि कुमार के अनुसार, इस देरी के कारण विद्यार्थियों को रोजाना कक्षा में पढ़ाई करने में परेशानी हो रही है। शिक्षक उपलब्ध सामग्री से पढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन सभी विद्यार्थियों के पास अपनी किताबें नहीं होने से शिक्षण प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।
स्कूल प्रबंधन ने जल्द समाधान की मांग की
निजी स्कूल संगठनों ने किताबों की आपूर्ति प्रक्रिया में तेजी लाने की मांग की है। उनका कहना है कि शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में ही विद्यार्थियों को सभी जरूरी पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध हो जानी चाहिए थीं। दो महीने बाद भी किताबों की कमी बने रहना शिक्षा व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है।
स्कूल प्रबंधन का कहना है कि पुस्तकों की आपूर्ति में देरी का असर केवल विद्यार्थियों पर ही नहीं, बल्कि शिक्षकों की पाठ योजना पर भी पड़ता है। शिक्षक किताबों के अनुसार अध्याय और अभ्यास तय करते हैं। जब विद्यार्थियों के पास किताब नहीं होती, तो कक्षा में पढ़ाए गए विषय को दोहराना उनके लिए मुश्किल हो जाता है।
जल्द शुरू करनी होगी दूसरे ऑर्डर की प्रक्रिया
स्कूल संगठनों का कहना है कि मौजूदा समस्या का तत्काल समाधान करने के लिए पहले लंबित किताबों की आपूर्ति पूरी की जानी चाहिए और इसके बाद विद्यार्थियों की वर्तमान संख्या के आधार पर दूसरे ऑर्डर की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए।
स्कूलों का तर्क है कि विद्यार्थियों को पूरे शैक्षणिक सत्र के दौरान नियमित अध्ययन सामग्री मिलना जरूरी है। किताबों की कमी के कारण छात्रों को फोटोकॉपी पर निर्भर रहना पड़ रहा है, जो लंबे समय के लिए व्यावहारिक व्यवस्था नहीं है।
फिलहाल कर्नाटक के निजी स्कूलों में किताबों की कमी का मुद्दा स्कूल प्रबंधन और विद्यार्थियों के लिए बड़ी परेशानी बना हुआ है। स्कूल संगठनों का कहना है कि उन्होंने अपनी ओर से किताबों के लिए पूरा भुगतान कर दिया है, लेकिन आपूर्ति और अतिरिक्त ऑर्डर की प्रक्रिया में देरी हो रही है। अब स्कूल प्रबंधन की नजर इस बात पर है कि संबंधित विभाग और आपूर्ति व्यवस्था कब तक लंबित किताबें उपलब्ध कराती है और दूसरे ऑर्डर की प्रक्रिया कब शुरू होती है। यदि जल्द समाधान नहीं निकला तो शैक्षणिक सत्र आगे बढ़ने के साथ विद्यार्थियों की पढ़ाई पर इसका असर और गहरा सकता है।





