
बेंगलुरु। कर्नाटक के डिप्टी मुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने माना है कि राज्य सरकार की प्रमुख गारंटी योजनाओं पर बड़े पैमाने पर खर्च होने से सरकारी खजाने पर आर्थिक दबाव बढ़ा है। पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि सरकार फिलहाल इन योजनाओं पर 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर रही है और इतनी बड़ी राशि का वित्तीय असर स्वाभाविक है।
परमेश्वर ने कहा कि इस आर्थिक बोझ को छिपाने का सवाल ही नहीं है। उनके मुताबिक कांग्रेस सरकार ने पिछले तीन वर्षों के दौरान इस खर्च को संभाला है और शेष दो वर्षों में भी इसे संभालने की क्षमता रखती है। उन्होंने कहा कि सरकार ने चुनाव से पहले ही गारंटी योजनाओं के संभावित वित्तीय प्रभाव का आकलन किया था और उसी के आधार पर इन्हें लागू करने का निर्णय लिया गया।
उन्होंने कहा कि सरकार इन योजनाओं पर करीब 52 हजार करोड़ रुपये खर्च कर रही है। इतनी बड़ी राशि खर्च होने से राज्य के वित्त पर दबाव पड़ना तय है, लेकिन सरकार इसे प्रबंधित करने की कोशिश कर रही है। परमेश्वर का यह बयान ऐसे समय आया है जब राज्य की वित्तीय स्थिति और बड़े कल्याणकारी कार्यक्रमों पर खर्च को लेकर राजनीतिक बहस तेज है।
कांग्रेस ने 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले पांच प्रमुख गारंटी योजनाओं की घोषणा की थी। इनमें महिलाओं, परिवारों, बेरोजगार युवाओं और बिजली उपभोक्ताओं से जुड़ी अलग-अलग योजनाएं शामिल थीं। सरकार बनने के बाद इन योजनाओं को चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया।
शुरुआती दौर में सरकार ने इन गारंटी योजनाओं पर सालाना लगभग 45 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया था। बाद में लाभार्थियों की संख्या और योजनाओं के वास्तविक खर्च बढ़ने के साथ कुल वित्तीय भार 50 हजार करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया। परमेश्वर के अनुसार वर्तमान खर्च करीब 52 हजार करोड़ रुपये के स्तर पर है।
राज्य सरकार की वित्तीय स्थिति को लेकर हाल के दिनों में वित्त विभाग ने भी खर्च में सावधानी बरतने की जरूरत बताई है। कर्नाटक की कुल देनदारियां सकल राज्य घरेलू उत्पाद के लगभग 24.9 प्रतिशत तक पहुंचने की सूचना है, जो राज्य के वित्तीय उत्तरदायित्व ढांचे में निर्धारित 25 प्रतिशत की सीमा के करीब है। वित्त विभाग ने नए और अतिरिक्त खर्च को लेकर सतर्कता बरतने की सलाह दी है।
परमेश्वर ने हालांकि इस स्थिति को राज्य की आर्थिक व्यवस्था के पूरी तरह संकट में होने के रूप में देखने से इनकार किया है। हाल ही में विधानसभा में उन्होंने कहा था कि वित्त विभाग की ओर से खर्च में सावधानी की सलाह को राज्य के दिवालिया होने के संकेत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने इसे वित्तीय अनुशासन बनाए रखने की प्रक्रिया बताया था।
कर्नाटक इस समय गंभीर सूखे की स्थिति का भी सामना कर रहा है। राज्य सरकार को सूखा राहत, पेयजल व्यवस्था और किसानों को सहायता के लिए अतिरिक्त धन की जरूरत पड़ रही है। 217 तालुकों में बारिश की कमी दर्ज होने और बड़े पैमाने पर फसल नुकसान के कारण सरकार पर अतिरिक्त खर्च का दबाव बढ़ा है।
सरकार ने सूखा प्रभावित किसानों के लिए प्रति किसान 2,500 रुपये की इनपुट सब्सिडी देने की घोषणा भी की है। इस सहायता पर करीब 1,250 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है और इससे 45 से 50 लाख किसानों को लाभ मिलने की बात कही गई है।
ऐसे में एक तरफ गारंटी योजनाओं पर 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक का वार्षिक खर्च है, जबकि दूसरी तरफ सूखा राहत और विकास परियोजनाओं के लिए अतिरिक्त संसाधनों की जरूरत बढ़ रही है। इसी पृष्ठभूमि में राज्य के वित्तीय प्रबंधन को लेकर बहस तेज हुई है।
परमेश्वर ने कहा कि चुनाव से पहले कांग्रेस ने गारंटी योजनाओं की घोषणा करते समय इनके संभावित खर्च का आकलन किया था। उनका कहना है कि सरकार को पहले से पता था कि इन योजनाओं के लिए बड़ी राशि की जरूरत होगी और उसी के अनुसार वित्तीय व्यवस्था की गई।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि गारंटी योजनाओं को जारी रखना सरकार की प्राथमिकता बनी रहेगी। उनके मुताबिक वित्तीय दबाव होने के बावजूद सरकार लाभार्थियों को मिलने वाली सुविधाओं को अचानक बंद करने की दिशा में नहीं सोच रही है।
कांग्रेस सरकार की प्रमुख गारंटी योजनाओं में ‘गृह ज्योति’ भी शामिल है, जिसके तहत पात्र परिवारों को निर्धारित सीमा तक मुफ्त बिजली उपलब्ध कराई जाती है। यह योजना जुलाई 2023 से लागू है और सरकार ने हाल में इसके लाभार्थियों के सत्यापन की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई है।
राज्य में वित्तीय संसाधनों पर बढ़ते दबाव को देखते हुए खर्च की प्राथमिकताओं पर भी चर्चा बढ़ गई है। वित्त विभाग पहले ही बड़े नए प्रस्तावों और अतिरिक्त परियोजनाओं पर सावधानी बरतने की सलाह दे चुका है। कुछ नई परियोजनाओं के लिए विभाग ने सरकार को वित्तीय व्यवहार्यता पर यथार्थवादी रुख अपनाने को कहा है।
विपक्ष ने गारंटी योजनाओं के खर्च को लेकर सरकार पर कई बार निशाना साधा है। वहीं कांग्रेस सरकार का कहना है कि ये योजनाएं गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों को सीधी आर्थिक राहत देती हैं और इनके लिए जरूरी संसाधनों का प्रबंधन किया जा रहा है।
परमेश्वर के बयान से यह स्पष्ट है कि सरकार भी मानती है कि गारंटी योजनाओं का आर्थिक भार बड़ा है। अंतर केवल इस बात को लेकर है कि इस बोझ को कितना गंभीर माना जाए और सरकार इसे लंबे समय तक किस तरह संभालेगी।
राज्य के सामने अब चुनौती गारंटी योजनाओं को जारी रखते हुए सूखा राहत, बुनियादी ढांचे, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य विकास योजनाओं के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध कराने की है। वित्त विभाग की हालिया चेतावनियों ने इस संतुलन को और महत्वपूर्ण बना दिया है।
फिलहाल परमेश्वर ने दोहराया है कि लगभग 52 हजार करोड़ रुपये का खर्च राज्य सरकार पर आर्थिक दबाव जरूर डाल रहा है, लेकिन सरकार इसे संभाल रही है और आगे भी संभालने का प्रयास करेगी। आने वाले बजट और खर्च संबंधी फैसलों से यह और स्पष्ट होगा कि सरकार कल्याणकारी योजनाओं तथा विकास खर्च के बीच वित्तीय संतुलन किस तरह बनाए रखती है।





