
बेंगलुरु। बेंगलुरु दक्षिण जिले में प्रस्तावित बिदादी टाउनशिप प्रोजेक्ट को लेकर किसानों के बीच मतभेद सामने आने लगे हैं। परियोजना से प्रभावित होने वाले बैरामंगला और कंचुगरनहल्ली गांवों के किसानों के एक प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार से मुलाकात कर परियोजना के लिए अपनी जमीन देने पर सहमति जताई है। किसानों ने मुख्यमंत्री से जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया को जल्द आगे बढ़ाने और अंतिम नोटिफिकेशन जारी करने का अनुरोध किया।
दूसरी ओर, बिदादी के आसपास के किसानों का एक अन्य समूह प्रस्तावित टाउनशिप के लिए जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहा है। इस गुट का कहना है कि वे अपनी उपजाऊ कृषि भूमि किसी भी कीमत पर नहीं देना चाहते। किसानों के दो अलग-अलग रुख के कारण बिदादी टाउनशिप परियोजना को लेकर स्थिति महत्वपूर्ण हो गई है।
बैरामंगला और कंचुगरनहल्ली गांवों से आए प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री के सामने अपनी सहमति रखी। किसानों का कहना है कि यदि सरकार परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करना चाहती है तो इसमें अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने जल्द अंतिम अधिसूचना जारी करने की मांग की, ताकि अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ सके और परियोजना को लेकर स्पष्टता आए।
किसानों के इस रुख से संकेत मिलता है कि प्रस्तावित टाउनशिप को लेकर प्रभावित क्षेत्रों में सभी किसान एकमत नहीं हैं। जहां एक समूह परियोजना के बदले मिलने वाले मुआवजे या विकसित जमीन के विकल्प को स्वीकार करने के लिए तैयार है, वहीं दूसरा समूह कृषि भूमि के अधिग्रहण को ही अपनी आजीविका के लिए खतरा मान रहा है।
मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने कुछ दिन पहले बिदादी के आसपास के किसानों के सामने जमीन देने के लिए दो विकल्प रखे थे। सरकार की ओर से बताए गए विकल्पों के अनुसार, किसान चाहें तो अपनी जमीन के बदले प्रति एकड़ तीन करोड़ रुपये का मुआवजा ले सकते हैं। दूसरा विकल्प विकसित जमीन के रूप में कुल अधिग्रहित जमीन का 50 प्रतिशत हिस्सा वापस लेने का है।
सरकार की ओर से रखे गए इन विकल्पों का उद्देश्य किसानों को परियोजना में भागीदारी के लिए आकर्षित करना और जमीन अधिग्रहण को लेकर सहमति बनाना माना जा रहा है। विकसित जमीन का विकल्प उन किसानों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है जो भविष्य में जमीन की बढ़ी हुई कीमत का लाभ लेना चाहते हैं। वहीं कुछ किसान तत्काल आर्थिक मुआवजे को प्राथमिकता दे सकते हैं।
हालांकि विरोध कर रहे किसानों का तर्क अलग है। उनका कहना है कि कृषि भूमि केवल संपत्ति नहीं, बल्कि उनके परिवारों की आजीविका का मुख्य आधार है। उपजाऊ जमीन एक बार चली जाने के बाद उसे दोबारा हासिल करना संभव नहीं होगा। ऐसे में वे परियोजना के लिए जमीन देने के प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं।
बिदादी क्षेत्र बेंगलुरु के तेजी से विकसित हो रहे इलाकों में शामिल है। राजधानी के विस्तार और आसपास के क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के विकास के साथ यहां जमीन की मांग भी बढ़ रही है। प्रस्तावित टाउनशिप परियोजना को इसी व्यापक शहरी विकास से जोड़कर देखा जा रहा है।
टाउनशिप परियोजना का उद्देश्य क्षेत्र में नियोजित शहरी विकास को बढ़ावा देना है। इसके लिए जमीन की उपलब्धता सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। लेकिन बड़ी परियोजनाओं के लिए कृषि भूमि के अधिग्रहण के मामले में स्थानीय लोगों की सहमति और पुनर्वास से जुड़े मुद्दे भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
बैरामंगला और कंचुगरनहल्ली के किसानों का प्रतिनिधिमंडल मुख्यमंत्री से मिलने पहुंचा तो उसने स्पष्ट रूप से जमीन देने की इच्छा जाहिर की। किसानों की ओर से अंतिम नोटिफिकेशन जल्द जारी करने की मांग इस बात का संकेत है कि कम से कम कुछ प्रभावित परिवार परियोजना को लेकर आगे बढ़ने के लिए तैयार हैं।
दूसरी तरफ, विरोध कर रहे किसानों की संख्या और उनकी मांगें भी सरकार के लिए महत्वपूर्ण रहेंगी। यदि कृषि भूमि के अधिग्रहण को लेकर व्यापक विरोध होता है तो परियोजना की प्रक्रिया में चुनौतियां बढ़ सकती हैं। ऐसे में सरकार के सामने दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाने की जिम्मेदारी होगी।
मुआवजे के रूप में प्रति एकड़ तीन करोड़ रुपये का विकल्प किसानों के लिए आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण प्रस्ताव है। लेकिन जमीन की मौजूदा कीमत, भविष्य में होने वाले विकास और परिवार की आजीविका जैसे पहलुओं के आधार पर किसान अलग-अलग निर्णय ले सकते हैं। इसी तरह कुल जमीन का 50 प्रतिशत हिस्सा विकसित जमीन के रूप में वापस लेने का विकल्प भी दीर्घकालिक लाभ से जुड़ा है।
विकसित जमीन मिलने की स्थिति में किसान भविष्य में टाउनशिप के विस्तार से होने वाले आर्थिक लाभ में हिस्सेदारी हासिल कर सकते हैं। हालांकि इसके लिए विकास की समयसीमा, जमीन की वास्तविक स्थिति और अन्य शर्तें भी महत्वपूर्ण होंगी। इसलिए किसानों के बीच इन विकल्पों को लेकर अलग-अलग राय होना स्वाभाविक है।
परियोजना को लेकर अब सबसे बड़ी चुनौती जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया को सहमति के साथ आगे बढ़ाना है। सरकार के सामने उन किसानों की चिंताओं को दूर करना होगा जो कृषि भूमि छोड़ने को तैयार नहीं हैं। साथ ही जो किसान जमीन देने पर सहमत हैं, उनके लिए मुआवजे और विकसित जमीन से जुड़े विकल्पों को स्पष्ट और पारदर्शी तरीके से लागू करना भी जरूरी होगा।
किसानों के प्रतिनिधिमंडल की मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद अब निगाहें सरकार के अगले कदम पर हैं। यदि अंतिम नोटिफिकेशन जल्द जारी होता है तो अधिग्रहण की प्रक्रिया औपचारिक रूप से आगे बढ़ सकती है। वहीं विरोधी किसान समूह अपनी मांगों को लेकर सरकार के सामने अपना पक्ष रख सकता है।
बिदादी टाउनशिप प्रोजेक्ट को लेकर किसानों के बीच सामने आया यह मतभेद बताता है कि बड़े शहरी विकास प्रोजेक्ट केवल भूमि अधिग्रहण का मामला नहीं होते, बल्कि उनसे स्थानीय लोगों की आजीविका और भविष्य भी जुड़ा होता है। इसलिए परियोजना को आगे बढ़ाने के साथ किसानों के हितों और उनकी चिंताओं का समाधान करना भी महत्वपूर्ण होगा।
फिलहाल एक तरफ बैरामंगला और कंचुगरनहल्ली के किसानों का प्रतिनिधिमंडल जमीन देने के लिए तैयार है और जल्द अंतिम नोटिफिकेशन चाहता है, जबकि दूसरी तरफ आसपास के किसानों का एक समूह उपजाऊ कृषि भूमि बचाने के लिए अधिग्रहण का विरोध कर रहा है। मुख्यमंत्री की ओर से रखे गए तीन करोड़ रुपये प्रति एकड़ मुआवजे या 50 प्रतिशत विकसित जमीन के विकल्प के बीच अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार दोनों पक्षों को किस तरह साथ लेकर परियोजना को आगे बढ़ाती है।





