
बेंगलुरु : सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को खराब गुणवत्ता के जूते और मोजे बांटे जाने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। अभिभावकों और स्थानीय लोगों के भारी विरोध के बाद स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग ने शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच कराने का आदेश दिया है। जांच के लिए प्रत्येक जिले में अलग-अलग निरीक्षण टीम बनाई जाएगी। ये टीमें स्कूलों में जाकर बच्चों को दिए गए जूते-मोजों की गुणवत्ता की जांच करेंगी और अपनी रिपोर्ट संबंधित अधिकारियों को सौंपेंगी।
यह मामला शैक्षणिक सत्र 2026-27 की शिक्षा विकास योजना से जुड़ा हुआ है। योजना के अंतर्गत सरकारी स्कूलों में कक्षा पहली से दसवीं तक पढ़ने वाले विद्यार्थियों को जूते और मोजे वितरित किए गए थे। सामग्री मिलने के बाद कई स्थानों से इसकी गुणवत्ता को लेकर शिकायतें सामने आईं। लोगों का आरोप है कि बच्चों को दिए गए जूते और मोजे निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं हैं। कुछ अभिभावकों ने सामग्री को कमजोर बताते हुए इसके ज्यादा समय तक नहीं चलने की आशंका जताई।
शिकायतों की संख्या बढ़ने और लोगों के विरोध को देखते हुए स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग ने मामले में हस्तक्षेप किया है। विभाग ने स्कूल शिक्षा आयुक्त को निर्देश दिया है कि सभी जिलों में निष्पक्ष और प्रभावी तरीके से जांच कराई जाए। इसके लिए जिला पंचायतों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों की देखरेख में जिलावार निरीक्षण टीमों का गठन किया जाएगा। जांच के दौरान स्कूलों को उपलब्ध कराई गई सामग्री की गुणवत्ता के साथ वितरण प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज भी देखे जा सकते हैं।
विभाग की ओर से 8 सितंबर को जारी आदेश में इस मामले को बेहद जरूरी बताया गया है। आदेश से साफ है कि विभाग शिकायतों को सामान्य मामला मानकर छोड़ने के पक्ष में नहीं है। अधिकारियों को जल्द से जल्द निरीक्षण टीमों का गठन करके जांच शुरू कराने के लिए कहा गया है। जांच रिपोर्ट के आधार पर ही आगे की जिम्मेदारी तय होने और आवश्यक कदम उठाए जाने की संभावना है।
जांच को तकनीकी और निष्पक्ष बनाने के लिए निरीक्षण टीमों में केवल शिक्षा विभाग के अधिकारियों को शामिल नहीं किया जाएगा। आदेश में कहा गया है कि स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग से अलग अन्य विभागों के ऐसे अधिकारी या कर्मचारी भी टीम में रखे जाएं जिन्हें संबंधित क्षेत्र का अनुभव और विशेषज्ञता हो। इससे जूते-मोजों की सामग्री, मजबूती, आकार, सिलाई और उपयोगिता जैसे पहलुओं की ठीक तरीके से जांच हो सकेगी।
जिलेवार निरीक्षण टीमें विभिन्न स्कूलों का दौरा कर वहां वितरित किए गए जूते और मोजों के नमूनों की जांच कर सकती हैं। इसके अलावा विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षकों से भी जानकारी ली जा सकती है। इससे यह पता लगाया जा सकेगा कि शिकायतें किसी एक स्कूल या जिले तक सीमित हैं अथवा अलग-अलग क्षेत्रों में एक जैसी समस्या सामने आई है। टीम यह भी देख सकती है कि सभी बच्चों को सामग्री मिली या नहीं और वितरण के समय गुणवत्ता की जांच की गई थी या नहीं।
सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को दी जाने वाली सामग्री का उद्देश्य उनकी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा करना और विद्यालय में नियमित उपस्थिति को प्रोत्साहित करना है। ऐसे में यदि बच्चों को खराब गुणवत्ता की सामग्री दी जाती है तो योजना के उद्देश्य पर सवाल उठना स्वाभाविक है। अभिभावकों का कहना है कि विद्यार्थियों के उपयोग के लिए खरीदी गई सामग्री टिकाऊ और आरामदायक होनी चाहिए। खराब जूते बच्चों के पैरों में चोट या दूसरी परेशानियों का कारण भी बन सकते हैं।
मामले में अब सबकी नजर निरीक्षण टीमों की रिपोर्ट पर रहेगी। रिपोर्ट से स्पष्ट होगा कि जूते-मोजों की गुणवत्ता को लेकर लगाए जा रहे आरोप कितने सही हैं। यदि खरीद या आपूर्ति की प्रक्रिया में लापरवाही सामने आती है तो संबंधित आपूर्तिकर्ताओं और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही निर्धारित की जा सकती है। विभाग सामग्री बदलने या दोषपूर्ण खेप वापस कराने पर भी निर्णय ले सकता है।
इस विवाद ने सरकारी योजनाओं के तहत खरीदी जाने वाली सामग्री की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए हैं। आम लोगों का कहना है कि बड़ी मात्रा में सामान खरीदने से पहले उसकी गुणवत्ता की तकनीकी जांच होनी चाहिए। आपूर्ति के बाद भी नमूने लेकर यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बच्चों तक वही सामग्री पहुंची है जिसका उल्लेख निविदा और अनुबंध में किया गया था।
फिलहाल शिक्षा विभाग ने शिकायतों की जांच कराने का आदेश देकर मामले में कार्रवाई शुरू कर दी है। जिलावार निरीक्षण टीमों की रिपोर्ट आने के बाद स्थिति पूरी तरह साफ होगी। अभिभावकों को उम्मीद है कि जांच निष्पक्ष होगी और बच्चों को निर्धारित मानकों के अनुरूप अच्छी गुणवत्ता के जूते और मोजे उपलब्ध कराए जाएंगे।





