
बेंगलुरु। कर्नाटक में नकली और गलत लेबल लगाकर बेची जा रही दवाओं के कथित नेटवर्क के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बड़ी कार्रवाई की है। ईडी के बेंगलुरु जोनल कार्यालय ने मनी लॉन्ड्रिंग की जांच के तहत बेंगलुरु और आसपास के पांच ठिकानों पर तलाशी और जब्ती अभियान चलाया। इस दौरान कई महत्वपूर्ण दस्तावेज और डिजिटल उपकरण जब्त किए गए। एजेंसी ने एक आरोपी से जुड़े बैंक खातों में जमा लगभग नौ लाख रुपये की राशि भी फ्रीज की है। जांच में आरोप सामने आया है कि कम कीमत वाली दवाओं को महंगे ब्रांड की दवाओं के नाम से पैक करके बाजार में पहुंचाया जा रहा था।
ईडी के अनुसार, यह कार्रवाई धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 की धारा 17 के तहत की गई है। जांच का संबंध 18 अगस्त 2026 को बेंगलुरु दक्षिण जिले के तवारेकेरे पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर संख्या 0266/2026 से है। इस एफआईआर के आधार पर ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज कर वित्तीय लेनदेन की जांच शुरू की थी।
ईडी की ओर से दो नवंबर को जारी जानकारी के मुताबिक, तलाशी के दौरान आरोपी वीरेश कुमार से संबंधित बैंक खातों में लगभग नौ लाख रुपये फ्रीज किए गए हैं। इसके अलावा विभिन्न व्यक्तियों और संस्थाओं से जुड़े डिजिटल उपकरण, रिकॉर्ड और जांच के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज कब्जे में लिए गए हैं।
इस मामले की शुरुआत अगस्त में हुई थी, जब औषधि नियंत्रण प्राधिकरण और पुलिस ने संयुक्त कार्रवाई करते हुए बेंगलुरु दक्षिण के सीके तांड्या गांव में एक आवासीय परिसर पर छापा मारा था। अधिकारियों को जानकारी मिली थी कि वहां बिना वैध लाइसेंस और अनुमति के दवाओं का भंडारण किया जा रहा है।
छापेमारी के दौरान दवाओं के लेबल बदलने और उन्हें दूसरी कंपनियों के उत्पादों की तरह प्रस्तुत करने से संबंधित सामग्री मिलने का दावा किया गया था। इसके बाद पुलिस ने संबंधित धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की और मामले की जांच शुरू हुई।
मामले में भारतीय न्याय संहिता की धारा 318(4) और कॉपीराइट अधिनियम, 1957 की धारा 63 के तहत अपराध दर्ज किए गए थे। इन धाराओं से जुड़े आरोपों को आधार बनाकर ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू की। इस संबंध में प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट यानी ईसीआईआर संख्या ECIR/BGZO/45/2026 दर्ज की गई।
जांच में सामने आए आरोपों के अनुसार, आर. प्रशांत नामक व्यक्ति ने बिदादी के पास एक फार्महाउस की व्यवस्था की थी। इस परिसर का इस्तेमाल बिना आवश्यक औषधि लाइसेंस के दवाओं की पैकिंग और लेबल बदलने के लिए किए जाने का आरोप है।
ईडी का दावा है कि विभिन्न राज्यों से कम कीमत वाली दवाएं बड़ी मात्रा में मंगाई जाती थीं। इसके बाद उन्हें नए वायल यानी दवा की छोटी शीशियों में पैक किया जाता था। इन पर महंगी दवा कंपनियों के ब्रांड वाले लेबल लगाकर उन्हें बाजार में भेजा जाता था।
जांच एजेंसी के अनुसार, कुछ दवाओं को फाइजर कंपनी के महंगे एंटीबायोटिक उत्पादों के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा था। इनमें जाविसेफ्टा (Zavicefta) और एम्ब्लावियो (Emblaveo) जैसे ब्रांड शामिल बताए गए हैं। आरोप है कि जिन शीशियों पर इन ब्रांडों के लेबल लगाए गए थे, उनमें वास्तव में कम कीमत वाली जेनेरिक दवाएं भरी गई थीं।
यह मामला इसलिए गंभीर है, क्योंकि चिकित्सक किसी मरीज की स्थिति के अनुसार दवा लिखते हैं और उसकी गुणवत्ता तथा वास्तविक सामग्री उपचार के लिए महत्वपूर्ण होती है। यदि किसी दवा की पहचान, संरचना या पैकिंग गलत हो, तो मरीज के उपचार पर गंभीर असर पड़ सकता है।
नकली या गलत लेबल वाली दवाओं की आपूर्ति स्वास्थ्य व्यवस्था में भरोसे को भी प्रभावित कर सकती है। हालांकि, इस मामले में विभिन्न दवाओं की वास्तविक रासायनिक संरचना और उनके इस्तेमाल से किसी मरीज को नुकसान पहुंचने की पुष्टि अलग-अलग जांच तथा चिकित्सकीय साक्ष्यों से ही की जा सकती है।
ईडी की जांच में कथित सप्लाई नेटवर्क के संबंध में भी जानकारी सामने आई है। एजेंसी के अनुसार, गलत तरीके से पैक की गई दवाओं की आपूर्ति मेसर्स डीएम फार्मास्यूटिकल्स के माध्यम से मेसर्स कृपा हेल्थकेयर तक पहुंचाई गई थी।
इसके बाद कृपा हेल्थकेयर के जरिए इन दवाओं की आपूर्ति अन्य दवा कारोबारियों और अस्पतालों को किए जाने का आरोप है। एजेंसी का कहना है कि कथित नकली दवाओं को वास्तविक दवाओं के साथ मिलाकर भेजा जाता था, जिससे उनकी पहचान करना कठिन हो सके।
इससे पहले अगस्त में कर्नाटक के खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन विभाग ने बिदादी के पास एक फार्महाउस में कार्रवाई कर लगभग 4.91 करोड़ रुपये मूल्य की संदिग्ध दवाएं जब्त करने की जानकारी दी थी। उस दौरान कम कीमत वाली दवाओं को महंगे ब्रांड के नाम से पैक करने से संबंधित गतिविधियों का खुलासा हुआ था। जांच में एक्सपायर हो चुकी दवाओं के डिब्बे भी मिलने की बात सामने आई थी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए कर्नाटक सरकार ने अगस्त में विशेष जांच दल यानी एसआईटी का गठन किया था। इस टीम में पुलिस और औषधि नियंत्रण विभाग के अधिकारी शामिल किए गए। शुरुआती जांच के दौरान चार आरोपियों को गिरफ्तार किया गया था।
सितंबर में पुलिस ने कथित नेटवर्क से जुड़े प्रमुख आरोपी आर. प्रशांत बाबू को बेंगलुरु के केम्पेगौड़ा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से गिरफ्तार किया था। वह शारजाह से लौट रहा था। पुलिस जांच में उसके कथित नेटवर्क के विभिन्न राज्यों तक फैले होने की आशंका सामने आई थी।
अब ईडी यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि कथित नकली दवाओं के कारोबार से कितनी धनराशि अर्जित की गई और उस रकम का इस्तेमाल कहां किया गया। जांच में बैंक खातों, वित्तीय दस्तावेजों और डिजिटल रिकॉर्ड की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
एजेंसी की कार्रवाई से यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि नेटवर्क से जुड़े लोगों के बीच आर्थिक लेनदेन किस प्रकार हुआ। इसके अलावा दवाओं की खरीद, पुनः पैकिंग और बिक्री से संबंधित दस्तावेजों का भी परीक्षण किया जा रहा है।
मनी लॉन्ड्रिंग की जांच में किसी कारोबार से होने वाली कथित अवैध कमाई और उससे जुड़ी संपत्तियों का पता लगाना महत्वपूर्ण होता है। यदि जांच के दौरान किसी संपत्ति या बैंक खाते का संबंध अपराध से अर्जित आय से पाया जाता है, तो लागू कानून के तहत आगे की कार्रवाई की जा सकती है।
फिलहाल ईडी ने पांच ठिकानों पर तलाशी और लगभग नौ लाख रुपये के बैंक खातों को फ्रीज किए जाने की जानकारी दी है। जब्त दस्तावेजों और डिजिटल उपकरणों की जांच से कथित नेटवर्क के अन्य आर्थिक संबंध सामने आ सकते हैं।
हालांकि, इस मामले में जिन व्यक्तियों और संस्थाओं के नाम सामने आए हैं, उनके खिलाफ आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगी। केवल तलाशी, जब्ती या बैंक खाते फ्रीज होने से किसी व्यक्ति का दोष सिद्ध नहीं माना जा सकता।
कर्नाटक में सामने आया यह मामला दवाओं की आपूर्ति और गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बनकर उभरा है। अब जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि कथित गलत लेबल वाली दवाएं किन-किन स्थानों तक पहुंचीं और इस कारोबार से प्राप्त रकम का इस्तेमाल कहां किया गया।





