
बेंगलुरु। कर्नाटक की सदियों पुरानी पारंपरिक रंगमंच कला शैली यक्षगान को राज्य की आधिकारिक कला शैली घोषित करने की मांग जोर पकड़ रही है। कर्नाटक यक्षगान अकादमी ने राज्य सरकार से अपील की है कि यक्षगान को आधिकारिक मान्यता प्रदान की जाए, ताकि इस पारंपरिक कला के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार को और मजबूती मिल सके। अकादमी का कहना है कि यक्षगान कर्नाटक की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसे औपचारिक राज्य स्तरीय मान्यता मिलने से कलाकारों और इस कला के भविष्य को नई दिशा मिल सकती है।
इस संबंध में अकादमी की ओर से मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को एक याचिका सौंपी गई है। अकादमी के अध्यक्ष डॉ. तल्लूर शिवराम शेट्टी ने याचिका के माध्यम से सरकार के सामने यक्षगान को आधिकारिक कला शैली का दर्जा देने की मांग रखी है। उन्होंने कहा कि यक्षगान न केवल कर्नाटक की प्रमुख लोक थिएटर शैलियों में से एक है, बल्कि इसका राज्य की भाषा, साहित्य, लोक परंपराओं और सांस्कृतिक जीवन से भी गहरा संबंध है।
समृद्ध परंपरा का हवाला
अकादमी ने अपनी मांग के समर्थन में यक्षगान की समृद्ध विरासत और लंबे सांस्कृतिक इतिहास का उल्लेख किया है। डॉ. तल्लूर शिवराम शेट्टी के अनुसार, यक्षगान ने लंबे समय से कर्नाटक के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई हुई है। इसकी प्रस्तुति शैली, अभिनय, संवाद, संगीत, वेशभूषा और मंचीय परंपरा इसे अन्य लोक रंगमंच शैलियों से अलग पहचान देती है।
अकादमी का मानना है कि यक्षगान को आधिकारिक कला शैली के रूप में मान्यता मिलने से इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को संस्थागत स्तर पर पहचान मिलेगी। इससे इस कला से जुड़े कलाकारों, प्रशिक्षकों और नई पीढ़ी के विद्यार्थियों के लिए भी सकारात्मक अवसर पैदा हो सकते हैं।
कन्नड़ भाषा और साहित्य में योगदान
यक्षगान की खासियत केवल रंगमंचीय प्रस्तुति तक सीमित नहीं है। अकादमी ने अपनी याचिका में इसके कन्नड़ भाषा और साहित्य में योगदान को भी महत्वपूर्ण बताया है। यक्षगान के माध्यम से लंबे समय से लोककथाओं, धार्मिक और पौराणिक प्रसंगों तथा साहित्यिक सामग्री को मंच पर प्रस्तुत किया जाता रहा है।
डॉ. शेट्टी ने कहा कि यक्षगान ने कन्नड़ की मौखिक और सांस्कृतिक परंपरा को मजबूत करने में भूमिका निभाई है। इस कला के माध्यम से लोकभाषा और साहित्यिक अभिव्यक्ति आम लोगों तक पहुंचती रही है। इसलिए इसे आधिकारिक कला शैली का दर्जा देना केवल एक कला रूप को मान्यता देना नहीं होगा, बल्कि इससे राज्य की व्यापक सांस्कृतिक विरासत को भी सम्मान मिलेगा।
संरक्षण और प्रचार-प्रसार पर जोर
कर्नाटक यक्षगान अकादमी का कहना है कि आधुनिक समय में पारंपरिक कला शैलियों के सामने संरक्षण की चुनौती बनी रहती है। ऐसे में सरकारी स्तर पर आधिकारिक मान्यता मिलने से यक्षगान के प्रचार और संरक्षण के प्रयासों को मजबूती मिल सकती है।
अकादमी के अनुसार, राज्य की आधिकारिक कला शैली के रूप में मान्यता मिलने से यक्षगान को विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सरकारी मंचों पर अधिक प्रमुखता मिल सकती है। साथ ही इस पारंपरिक कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए प्रयासों को भी व्यापक बनाया जा सकता है।
यक्षगान से जुड़े कलाकारों को उम्मीद है कि सरकारी पहचान मिलने के बाद इस कला के प्रशिक्षण, प्रदर्शन और प्रचार से जुड़ी गतिविधियों के लिए भी अधिक संस्थागत समर्थन की संभावनाएं बढ़ेंगी। हालांकि, फिलहाल अकादमी ने मुख्य रूप से आधिकारिक मान्यता की मांग सरकार के सामने रखी है।
कलाकारों और परंपरा के लिए अहम कदम
अकादमी का कहना है कि यक्षगान सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह कर्नाटक की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है। इसमें लोक जीवन, परंपराओं, कथाओं और साहित्य को मंचीय रूप दिया जाता है। इसलिए इसके संरक्षण को सांस्कृतिक जिम्मेदारी के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
डॉ. तल्लूर शिवराम शेट्टी ने मुख्यमंत्री को दी गई याचिका में इसी व्यापक महत्व को रेखांकित किया है। उन्होंने कहा कि यक्षगान अपनी समृद्ध विरासत और सांस्कृतिक महत्व के कारण आधिकारिक पहचान का हकदार है।
अकादमी को उम्मीद है कि राज्य सरकार उनकी मांग पर सकारात्मक रूप से विचार करेगी और यक्षगान को कर्नाटक की आधिकारिक कला शैली घोषित करने की दिशा में कदम उठाएगी।
नई पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत
यक्षगान की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए नई पीढ़ी को इससे जोड़ना भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अकादमी का मानना है कि आधिकारिक मान्यता के बाद युवाओं में इस कला के प्रति रुचि बढ़ाने के लिए नए अवसर तैयार किए जा सकते हैं।
पारंपरिक कलाओं के संरक्षण के लिए केवल मंचीय प्रस्तुतियां पर्याप्त नहीं होतीं। प्रशिक्षण, कलाकारों की भागीदारी, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में स्थान और समाज के बीच जागरूकता भी जरूरी होती है। आधिकारिक दर्जे की मांग को इसी व्यापक प्रयास से जोड़कर देखा जा रहा है।
सरकार के फैसले पर टिकी नजर
अब सबकी नजर इस बात पर है कि मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार और राज्य सरकार यक्षगान अकादमी की इस मांग पर क्या फैसला लेते हैं। फिलहाल अकादमी ने अपनी याचिका के माध्यम से यक्षगान की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को सामने रखते हुए इसे आधिकारिक कला शैली का दर्जा देने का अनुरोध किया है।
कर्नाटक यक्षगान अकादमी का कहना है कि इस कदम से राज्य की सांस्कृतिक पहचान से जुड़े इस पारंपरिक कला रूप को संरक्षित करने और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने में मदद मिलेगी। यक्षगान को आधिकारिक मान्यता देने की मांग ऐसे समय सामने आई है, जब पारंपरिक कला और लोक संस्कृति के संरक्षण को लेकर विभिन्न स्तरों पर चर्चा जारी है।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार इस प्रस्ताव पर क्या कदम उठाती है। यदि यक्षगान को आधिकारिक कला शैली की मान्यता मिलती है, तो यह इस पारंपरिक रंगमंच शैली के संरक्षण और प्रचार-प्रसार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा।





