
बेंगलुरु। देश की ‘सिलिकॉन सिटी’ के रूप में पहचान बना चुके बेंगलुरु पर तेजी से बढ़ती आबादी और बुनियादी ढांचे का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। ट्रैफिक जाम, प्रदूषण, पानी की कमी और कचरा प्रबंधन जैसी समस्याओं के बीच अब कर्नाटक में एक और बड़े आर्थिक केंद्र को विकसित करने की चर्चा तेज हो गई है। विचार यह है कि मुंबई-पुणे मॉडल की तर्ज पर बेंगलुरु के समानांतर एक ऐसा शहर या आर्थिक हब तैयार किया जाए, जहां उद्योगों, विशेष रूप से आईटी और तकनीकी क्षेत्र के लिए बड़े पैमाने पर अवसर विकसित किए जा सकें।
अनुमानों के मुताबिक बेंगलुरु की आबादी करीब 1.47 करोड़ से 1.55 करोड़ के बीच पहुंच चुकी है। वहीं शहर में लगभग 26 लाख आईटी प्रोफेशनल्स के काम करने की बात कही जा रही है। आईटी, स्टार्टअप और अन्य उद्योगों में रोजगार के अवसरों के कारण देश के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में लोग लगातार बेंगलुरु पहुंच रहे हैं। इससे आवास, सड़क, सार्वजनिक परिवहन, पानी और कचरा प्रबंधन जैसी सुविधाओं पर दबाव बढ़ रहा है।
‘दूसरा बेंगलुरु’ बनाने का सुझाव
हाल ही में कर्नाटक सरकार के साथ हुई एक बैठक के दौरान नीति आयोग से जुड़े अशोक कुमार लाहिरी ने बेंगलुरु पर बढ़ते आबादी और बुनियादी ढांचे के दबाव को कम करने के लिए ‘दूसरा बेंगलुरु’ विकसित करने का सुझाव दिया।
इस प्रस्ताव के पीछे विचार यह है कि राज्य में एक और मजबूत आर्थिक और रोजगार केंद्र बनाया जाए, ताकि निवेश और रोजगार के अवसर केवल बेंगलुरु तक सीमित न रहें।
यदि राज्य के किसी दूसरे शहर या क्षेत्र को बड़े आर्थिक केंद्र के रूप में विकसित किया जाता है तो कंपनियों और कर्मचारियों को बेंगलुरु के बाहर भी बेहतर विकल्प मिल सकते हैं।
मुंबई-पुणे मॉडल की तर्ज पर योजना
इस चर्चा में महाराष्ट्र के मुंबई-पुणे मॉडल को उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है। मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है, लेकिन पुणे ने भी पिछले कुछ दशकों में आईटी, ऑटोमोबाइल, शिक्षा, स्टार्टअप और औद्योगिक क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है।
इससे मुंबई पर रोजगार और निवेश का पूरा दबाव केंद्रित होने के बजाय एक अन्य बड़े शहर में भी आर्थिक गतिविधियां विकसित हुई हैं।
कर्नाटक में भी इसी तरह बेंगलुरु के समानांतर दूसरा बड़ा आर्थिक केंद्र तैयार करने की संभावना पर विचार किया जा रहा है।
तेजी से बढ़ रही बेंगलुरु की आबादी
बेंगलुरु की आबादी में पिछले वर्षों के दौरान तेजी से बढ़ोतरी हुई है। आईटी कंपनियों, स्टार्टअप्स और वैश्विक तकनीकी कंपनियों की मौजूदगी शहर को रोजगार का बड़ा केंद्र बनाती है।
देश के अलग-अलग राज्यों से इंजीनियर, आईटी प्रोफेशनल्स, उद्यमी और अन्य क्षेत्रों से जुड़े लोग रोजगार और कारोबार के लिए यहां पहुंचते हैं।
इसका सीधा असर शहर की आबादी पर पड़ रहा है। जैसे-जैसे आबादी बढ़ रही है, शहर के मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर पर दबाव भी बढ़ता जा रहा है।
26 लाख IT प्रोफेशनल्स का बड़ा आधार
बेंगलुरु को भारत की आईटी राजधानी कहा जाता है। यहां करीब 26 लाख आईटी प्रोफेशनल्स होने का अनुमान बताया जा रहा है।
आने वाले समय में तकनीकी क्षेत्र के विस्तार के साथ यह संख्या और बढ़ सकती है। नई कंपनियों और निवेश के आने से रोजगार बढ़ेंगे तो दूसरे शहरों और राज्यों से लोगों का बेंगलुरु आना भी जारी रह सकता है।
ऐसे में भविष्य की आबादी और बुनियादी जरूरतों को देखते हुए अभी से वैकल्पिक आर्थिक केंद्र विकसित करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
ट्रैफिक जाम बनी सबसे बड़ी परेशानी
बेंगलुरु की सबसे चर्चित समस्याओं में ट्रैफिक जाम शामिल है। प्रमुख आईटी कॉरिडोर और व्यावसायिक क्षेत्रों में पीक आवर्स के दौरान भारी यातायात दबाव देखने को मिलता है।
शहर में मेट्रो नेटवर्क का विस्तार किया जा रहा है और सड़कों से जुड़ी कई परियोजनाओं पर भी काम चल रहा है, लेकिन वाहनों की बढ़ती संख्या के कारण समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई है।
यदि रोजगार के नए केंद्र दूसरे क्षेत्रों में विकसित होते हैं तो रोजाना होने वाली यात्राओं और शहर के मुख्य इलाकों पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है।
पानी की कमी भी बड़ी चुनौती
तेजी से बढ़ती आबादी के बीच बेंगलुरु की पानी की जरूरत भी लगातार बढ़ रही है। गर्मी के मौसम में कई इलाकों में पानी की उपलब्धता चिंता का विषय बन जाती है।
नई आवासीय कॉलोनियों और व्यावसायिक परिसरों के विस्तार के साथ पानी की मांग भी बढ़ रही है।
इसलिए शहर के भविष्य की योजना केवल सड़क और परिवहन तक सीमित नहीं रह सकती। पानी, सीवरेज और अन्य शहरी सुविधाओं को भी आबादी के हिसाब से विकसित करना जरूरी होगा।
कचरा प्रबंधन पर भी बढ़ा दबाव
बड़ी आबादी का सीधा असर शहर में पैदा होने वाले कचरे की मात्रा पर भी पड़ता है। बेंगलुरु में कचरा संग्रह, उसके पृथक्करण और वैज्ञानिक तरीके से निपटान की चुनौती लगातार बनी हुई है।
आबादी बढ़ने के साथ नगर निकायों को अधिक संसाधनों और बेहतर तकनीक की जरूरत पड़ रही है।
दूसरा आर्थिक केंद्र विकसित होने से भविष्य में बेंगलुरु पर पड़ने वाले अतिरिक्त शहरी दबाव को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
केवल नया शहर नहीं रोजगार का नया केंद्र जरूरी
‘दूसरा बेंगलुरु’ बनाने का मतलब केवल नया शहर बसाना नहीं होगा। उसे सफल बनाने के लिए रोजगार, उद्योग, आईटी कंपनियां, स्टार्टअप, शिक्षा संस्थान, अस्पताल, आवास और बेहतर परिवहन व्यवस्था भी विकसित करनी होगी।
यदि कंपनियां वहां निवेश नहीं करतीं और रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं बनते तो लोगों का बेंगलुरु की ओर पलायन जारी रहेगा।
इसलिए नए आर्थिक हब को उद्योग और रोजगार से जोड़ना इस योजना की सबसे महत्वपूर्ण शर्त होगी।
निवेश को दूसरे शहरों तक ले जाने की चुनौती
कर्नाटक के कई शहर औद्योगिक और तकनीकी विकास की क्षमता रखते हैं। लेकिन बेंगलुरु जैसी वैश्विक पहचान, कुशल मानव संसाधन और निवेश पारिस्थितिकी तैयार करने में लंबा समय लग सकता है।
सरकार को नए आर्थिक केंद्र के लिए सड़क, रेल, हवाई संपर्क, बिजली, पानी और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी सुविधाओं पर बड़े निवेश की जरूरत होगी।
साथ ही निजी कंपनियों को नए क्षेत्र में निवेश के लिए आकर्षित करने की रणनीति भी बनानी होगी।
भविष्य के बेंगलुरु की तैयारी
बेंगलुरु भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है और इसकी आर्थिक ताकत को कमजोर करने के बजाय उसके विकास को अधिक संतुलित बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है।
यदि राज्य में दूसरा बड़ा आर्थिक केंद्र तैयार होता है तो इससे न केवल बेंगलुरु पर आबादी का दबाव कम हो सकता है बल्कि कर्नाटक के दूसरे हिस्सों में भी रोजगार और निवेश के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
फिलहाल ‘दूसरा बेंगलुरु’ एक सुझाव और चर्चा के स्तर पर है। लेकिन लगातार बढ़ती आबादी, ट्रैफिक, पानी और कचरा प्रबंधन की चुनौतियों को देखते हुए आने वाले समय में यह विचार कर्नाटक की शहरी और आर्थिक विकास रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।





