
Karnataka कर्नाटक : तालुका में मिट्टी के बर्तनों का प्रचलन खत्म होता जा रहा है। मिट्टी की वस्तुओं की जगह अब प्लास्टिक, स्टील और कांच की वस्तुओं ने ले ली है।
मिट्टी के बर्तनों को 'पुराना' मानने की धारणा लोगों के मन में घर कर गई है। अन्य सामग्रियों की तुलना में कम कीमत और उपयोग में आसानी ने मिट्टी के बर्तनों की मांग कम कर दी है।
मिट्टी के बर्तन बनाना सिर्फ एक कला नहीं है। यह आजीविका का साधन है। जैसे-जैसे लोग मिट्टी के बर्तनों से दूर होते जा रहे हैं, इस कला पर निर्भर हजारों कुम्हार परिवार आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं। नई पीढ़ी इस पेशे से दूर होती जा रही है, क्योंकि इस पारंपरिक कौशल को वह सम्मान और समर्थन नहीं मिल रहा है, जिसका वह हकदार है।
प्लास्टिक और धातु के बर्तनों की जगह मिट्टी के बर्तनों का उपयोग पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है। मिट्टी की खुशबू और शीतलता अविस्मरणीय अनुभव प्रदान करती है।
प्राचीन भारतीय संस्कृति में मिट्टी के बर्तनों को शुद्ध माना जाता था। इसका उपयोग पूजा-पाठ, नदियों में स्नान या भोजन करने के लिए किया जाता था। यह जीवनशैली का हिस्सा था। लेकिन आज की 'बाजारवादी' जिंदगी में ये मूल्य खत्म हो गए हैं।





