कर्नाटक

बेंगलुरु में 133 करोड़ के कचरा टेंडर पर विवाद, 12.99 करोड़ की सिक्योरिटी राशि को लेकर उठे सवाल

Kavita2
28 Oct 2026 11:36 AM IST
बेंगलुरु में 133 करोड़ के कचरा टेंडर पर विवाद, 12.99 करोड़ की सिक्योरिटी राशि को लेकर उठे सवाल
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बेंगलुरु। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में कचरा प्रबंधन से जुड़ी टेंडर प्रक्रिया को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। विधानसभा में विपक्ष के नेता और भाजपा के वरिष्ठ नेता आर. अशोक ने ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी (GBA) के अंतर्गत कचरा और अपशिष्ट ट्रांसफर स्टेशनों के निर्माण एवं रखरखाव के लिए जारी लगभग 133 करोड़ रुपये के टेंडरों में गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाया है। उन्होंने मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को पत्र लिखकर पूरे मामले की स्वतंत्र लोकायुक्त जांच कराने की मांग की है। विपक्ष के नेता का आरोप है कि टेंडर आवंटन के दौरान निर्धारित पात्रता शर्तों का उल्लंघन किया गया और लगभग 12.99 करोड़ रुपये की अतिरिक्त सुरक्षा जमा राशि भी नहीं ली गई। इसके अलावा वित्त विभाग के निर्देशों को नजरअंदाज करके ठेके दिए जाने का आरोप भी लगाया गया है।

1. मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर लोकायुक्त जांच की मांग

आर. अशोक ने मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को भेजे पत्र में कहा है कि बेंगलुरु की कचरा प्रबंधन व्यवस्था को बेहतर बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई परियोजना में गंभीर वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताओं की शिकायतें सामने आई हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि लगभग 133 करोड़ रुपये के टेंडरों के आवंटन में पारदर्शिता और निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। उनका कहना है कि सार्वजनिक धन से जुड़ी इतनी बड़ी परियोजना में नियमों का उल्लंघन होना गंभीर विषय है।

अशोक ने मांग की है कि टेंडर प्रक्रिया से जुड़े सभी दस्तावेजों की जांच की जाए और ठेके देने में शामिल अधिकारियों तथा अन्य संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की भी पड़ताल की जाए।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि जांच में अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं, तो संबंधित लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।

2. पात्रता पूरी नहीं करने वाली कंपनी को ठेका देने का आरोप

विपक्ष के नेता ने टेंडर प्राप्त करने वाली मुनियप्पा एंटरप्राइजेज नामक कंपनी की वित्तीय पात्रता पर सवाल उठाए हैं।

अशोक के मुताबिक, राज्य सरकार ने वर्ष 2018 में इस तरह के टेंडरों के लिए कंपनी का न्यूनतम वार्षिक कारोबार 10 करोड़ रुपये होना अनिवार्य किया था। लेकिन जिस कंपनी को ठेका दिया गया, उसका वित्त वर्ष 2023-24 में कारोबार केवल 3.34 करोड़ रुपये था।

उन्होंने दावा किया कि इससे पहले के वर्षों में भी संबंधित कंपनी का सालाना कारोबार लगभग एक से दो करोड़ रुपये के बीच था।

ऐसे में अशोक ने सवाल उठाया कि निर्धारित वित्तीय पात्रता पूरी नहीं करने के बावजूद कंपनी को टेंडर कैसे दिया गया।

उन्होंने कंपनी के पिछले वर्षों के वित्तीय विवरण और जीएसटी पंजीकरण की भी जांच कराने की मांग की है।

हालांकि, कंपनी के खिलाफ लगाए गए इन आरोपों की किसी स्वतंत्र जांच में पुष्टि होने की जानकारी फिलहाल सामने नहीं आई है।

3. करीब 12.99 करोड़ की सुरक्षा जमा राशि नहीं लेने का आरोप

इस पूरे विवाद में अतिरिक्त सुरक्षा जमा राशि का मुद्दा भी प्रमुखता से सामने आया है।

आर. अशोक का आरोप है कि टेंडर के दो महत्वपूर्ण पैकेजों में निर्धारित अतिरिक्त सुरक्षा राशि जमा कराए बिना ही आगे की प्रक्रिया पूरी कर दी गई।

उनके अनुसार, पैकेज नंबर दो की अनुमानित लागत लगभग 55.04 करोड़ रुपये थी। इस पैकेज में करीब 6.79 करोड़ रुपये की अतिरिक्त सुरक्षा राशि जमा कराई जानी थी।

इसी तरह पैकेज नंबर पांच में लगभग 5.99 करोड़ रुपये की अतिरिक्त सुरक्षा राशि लेने का प्रावधान था।

अशोक ने दावा किया कि दोनों पैकेजों सहित करीब 12.99 करोड़ रुपये की अतिरिक्त सुरक्षा राशि नहीं ली गई।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब टेंडर नियमों के तहत सुरक्षा राशि जमा कराना आवश्यक था, तब संबंधित कंपनी को इस शर्त से राहत किस आधार पर दी गई।

अतिरिक्त सुरक्षा जमा राशि का उद्देश्य सरकारी परियोजनाओं में वित्तीय जोखिम को कम करना और ठेकेदार द्वारा निर्धारित शर्तों के पालन को सुनिश्चित करना होता है।

ऐसे में विपक्ष के नेता ने पूरे मामले की जांच कर जिम्मेदारी तय करने की मांग की है।

4. वित्त विभाग की चेतावनी के बाद भी जारी हुआ स्वीकृति पत्र

आर. अशोक ने आरोप लगाया कि कर्नाटक के वित्त विभाग ने टेंडर प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों पर पहले ही आपत्ति और चेतावनी जारी की थी।

इसके बावजूद संबंधित कंपनी को 22 मई 2026 को लेटर ऑफ एक्सेप्टेंस यानी टेंडर स्वीकृति पत्र जारी कर दिया गया।

उन्होंने पूछा कि जब वित्त विभाग ने प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए थे, तब उसके निर्देशों का पालन किए बिना आगे की कार्रवाई क्यों की गई।

अशोक का आरोप है कि बेंगलुरु सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट लिमिटेड (BSWML) की ओर से भी अतिरिक्त सुरक्षा राशि जमा कराए बिना कार्यादेश जारी किए गए।

उन्होंने इस बात की जांच कराने की मांग की कि स्वीकृति पत्र जारी करने और कार्यादेश देने का निर्णय किन अधिकारियों ने लिया था।

विपक्ष के नेता ने यह सवाल भी उठाया कि अन्य पात्र कंपनियों के साथ दरों को कम करने के लिए बातचीत क्यों नहीं की गई।

उनका कहना है कि यदि टेंडर प्रक्रिया में पर्याप्त प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित की जाती, तो सरकारी खर्च कम करने की संभावना बन सकती थी।

5. जमीन तय किए बिना 21 पैकेजों के टेंडर जारी करने पर सवाल

विपक्ष के नेता ने केवल वित्तीय प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि पूरी कचरा प्रबंधन परियोजना की योजना पर भी सवाल उठाए हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि अपशिष्ट ट्रांसफर स्टेशन स्थापित करने के लिए उपयुक्त जमीन की पहचान किए बिना ही कुल 21 पैकेजों के टेंडर जारी कर दिए गए।

अशोक के मुताबिक, किसी भी कचरा ट्रांसफर स्टेशन को स्थापित करने से पहले उसकी जगह, परिवहन व्यवस्था और परिचालन क्षमता का आकलन जरूरी है।

उन्होंने यह भी कहा कि प्रस्तावित व्यवस्था में कचरा ढोने वाले छोटे वाहनों को लगभग आठ से दस किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ सकती है। ऐसी स्थिति में एक दिन में कई चक्कर लगाना मुश्किल हो सकता है।

उनका कहना है कि इन सभी पहलुओं की तकनीकी और प्रशासनिक समीक्षा आवश्यक है।

बेंगलुरु जैसे बड़े महानगर में कचरे के संग्रहण, परिवहन और निपटान के लिए प्रभावी व्यवस्था बेहद जरूरी है। कचरा ट्रांसफर स्टेशन इस व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं, जहां अलग-अलग इलाकों से एकत्र कचरे को आगे प्रसंस्करण या निपटान केंद्रों तक पहुंचाने की व्यवस्था की जाती है।

फिलहाल आर. अशोक ने टेंडर प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच, संबंधित दस्तावेजों की पड़ताल और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच की मांग की है। उपलब्ध रिपोर्टों में सरकार, संबंधित प्राधिकरण और कंपनी की विस्तृत प्रतिक्रिया स्पष्ट नहीं है। आरोपों की सत्यता आधिकारिक जांच के बाद ही स्थापित हो सकेगी।

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