
मैसूर। कर्नाटक के कावेरी वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी में वन विभाग के कर्मचारियों की गोलीबारी में मारे गए तीन संदिग्ध शिकारियों की मौत का मामला लगातार गरमाता जा रहा है। रविवार को मैसूर के K.R. हॉस्पिटल स्थित मुर्दाघर के बाहर उस समय हंगामे और तनाव की स्थिति बन गई, जब मृतकों के परिजनों ने शवों का पोस्टमार्टम कराने के लिए सहमति देने से इनकार कर दिया। परिवारों ने गोलीबारी की परिस्थितियों और इसमें शामिल वन कर्मचारियों की पहचान सार्वजनिक करने की मांग की है।
घटना के करीब 36 घंटे बाद भी तीनों शव मैसूर मेडिकल कॉलेज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट (MMCRI) के मुर्दाघर में रखे हुए थे। परिजनों का कहना था कि जब तक उन्हें घटना से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं मिलता, वे पोस्टमार्टम की प्रक्रिया के लिए अपनी सहमति नहीं देंगे।
मुर्दाघर के बाहर बड़ी संख्या में मृतकों के रिश्तेदार और ग्रामीण पहुंचे थे। लोगों ने अधिकारियों से पूरे घटनाक्रम को लेकर जवाब मांगा। परिजनों की नाराजगी इस बात को लेकर भी थी कि कई बार पूछने के बावजूद कथित गोलीबारी में शामिल वन विभाग के कर्मचारियों के नाम उन्हें नहीं बताए गए।
परिवारों ने मांग की कि प्रशासन यह स्पष्ट करे कि कावेरी वन्यजीव अभयारण्य में आखिर ऐसी कौन सी परिस्थितियां बनीं, जिनमें वन कर्मचारियों को गोली चलानी पड़ी। उनका कहना है कि केवल मृतकों को संदिग्ध शिकारी बताना पर्याप्त नहीं है। पूरे घटनाक्रम की जानकारी सामने आनी चाहिए और यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि गोलीबारी से पहले क्या हुआ था।
तीन लोगों की मौत के बाद उनके परिवारों के भविष्य को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। परिजनों ने अधिकारियों से पूछा कि मृतकों के छोटे-छोटे बच्चों और आश्रित परिवारों की जिम्मेदारी अब कौन लेगा। परिवारों का कहना है कि तीन लोगों की मौत से उनके घरों पर आर्थिक और सामाजिक संकट खड़ा हो गया है।
मामले को लेकर स्थानीय लोगों के बीच भी नाराजगी बढ़ रही है। किसानों, दलित और आदिवासी संगठनों के नेताओं ने पहले ही मृतकों के परिवारों के प्रति समर्थन जताते हुए घटना की निष्पक्ष जांच की मांग की है। अब पोस्टमार्टम को लेकर पैदा हुए गतिरोध ने मामले को और संवेदनशील बना दिया है।
इससे पहले बढ़ते विरोध के बीच चामराजनगर जिला प्रशासन ने तीनों मौतों की जांच के आदेश दिए थे। कोल्लेगल के सब-डिविजनल ऑफिसर दिनेश कुमार मीणा को जांच अधिकारी नियुक्त किया गया है। उन्हें सात दिनों के भीतर जांच रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा गया है।
जांच अधिकारी घटनास्थल का दौरा कर मौका-मुआयना कर चुके हैं। मामले में पोस्टमार्टम रिपोर्ट को भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे मृतकों को लगी गोलियों और चोटों की प्रकृति से जुड़ी जानकारी मिल सकती है। लेकिन परिजनों की सहमति नहीं मिलने के कारण पोस्टमार्टम को लेकर गतिरोध बना रहा।
परिवारों की मांग है कि जांच पूरी तरह पारदर्शी हो और घटना से जुड़ा कोई तथ्य छिपाया न जाए। खास तौर पर गोलीबारी में शामिल वन कर्मचारियों की पहचान और उनकी भूमिका स्पष्ट करने की मांग की जा रही है। परिजनों का सवाल है कि यदि तीनों लोग अवैध शिकार के संदेह में पकड़े गए थे तो उन्हें जिंदा गिरफ्तार करने की कोशिश क्यों नहीं की गई।
इसी सवाल को लेकर राजनीतिक स्तर पर भी प्रतिक्रिया सामने आ चुकी है। केंद्रीय मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी ने घटना की निंदा करते हुए सवाल किया था कि कथित शिकारियों को गिरफ्तार क्यों नहीं किया जा सकता था। उन्होंने पूछा था कि क्या वे कुख्यात अपराधी वीरप्पन जैसे थे कि उनके खिलाफ इस तरह की कार्रवाई करनी पड़ी। उन्होंने मामले की जांच की पारदर्शिता पर भी सवाल उठाए थे।
हालांकि घटना में वास्तव में क्या हुआ था, इसका अंतिम निर्धारण जांच के बाद ही हो सकेगा। वन विभाग के कर्मचारियों ने किन परिस्थितियों में कार्रवाई की, क्या उन्हें किसी तरह का तत्काल खतरा था और गोली चलाने से पहले क्या घटनाक्रम हुआ, ये सभी तथ्य जांच के केंद्र में रहेंगे।
कावेरी वन्यजीव अभयारण्य में वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए वन विभाग की टीमें नियमित गश्त करती हैं। संरक्षित क्षेत्र में अवैध शिकार गंभीर अपराध माना जाता है और इसे रोकने के लिए वन विभाग को कार्रवाई करनी होती है। लेकिन किसी कार्रवाई में लोगों की मौत होने पर बल प्रयोग की परिस्थितियों और उसकी आवश्यकता की जांच भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
मृतकों के परिजन इसी पहलू पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि उन्हें यह जानने का अधिकार है कि उनके परिवार के सदस्यों की मौत कैसे हुई। वे गोलीबारी की परिस्थितियों, उसमें शामिल कर्मचारियों और घटना के बाद उठाए गए कदमों की पूरी जानकारी चाहते हैं।
पोस्टमार्टम इस मामले की जांच में महत्वपूर्ण कड़ी साबित हो सकता है। रिपोर्ट से यह पता चल सकता है कि मृतकों को कितनी गोलियां लगीं, गोलियां शरीर के किन हिस्सों में लगीं और मौत का वास्तविक कारण क्या रहा। यही कारण है कि प्रशासन के लिए पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी कराना जांच की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
दूसरी ओर परिवारों के विरोध के कारण अधिकारियों के सामने संवेदनशील स्थिति बनी हुई है। प्रशासन को जांच के लिए जरूरी चिकित्सकीय प्रक्रिया आगे बढ़ाने के साथ मृतकों के परिजनों की चिंताओं और मांगों को भी संबोधित करना होगा। मुर्दाघर के बाहर तनाव को देखते हुए अधिकारियों की ओर से स्थिति को शांत रखने की कोशिश की गई।
तीनों मृतकों के परिवारों की आर्थिक स्थिति और छोटे बच्चों के भविष्य का मुद्दा भी अब प्रमुख मांगों में शामिल हो गया है। परिजन चाहते हैं कि सरकार स्पष्ट करे कि प्रभावित परिवारों को किस तरह की सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। इस संबंध में अंतिम निर्णय राज्य सरकार और प्रशासन की ओर से लिया जाना है।
घटना के 36 घंटे बाद तक शवों का मुर्दाघर में रहना मामले की गंभीरता को दर्शाता है। पोस्टमार्टम में देरी से जांच की प्रक्रिया भी प्रभावित हो सकती है, इसलिए प्रशासन और परिवारों के बीच सहमति बनाने की कोशिश महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
फिलहाल तीन संदिग्ध शिकारियों की मौत का मामला केवल वन विभाग की कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा है। पोस्टमार्टम से इनकार, वन कर्मचारियों की पहचान बताने की मांग, परिवारों के भविष्य और निष्पक्ष जांच जैसे कई सवाल इसके साथ जुड़ गए हैं। अब सभी की निगाह प्रशासन की जांच और सरकार की अगली कार्रवाई पर है। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही कावेरी वन्यजीव अभयारण्य में हुई गोलीबारी की वास्तविक परिस्थितियों को लेकर तस्वीर अधिक स्पष्ट हो सकेगी।





