
Karnataka कर्नाटक: राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है, जहां कांग्रेस पार्टी ने कई वर्षों के बाद पहली बार विधान परिषद में बहुमत हासिल कर लिया है। इस नए राजनीतिक समीकरण के बाद राज्य में कई नीतिगत फैसलों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं, जिनमें सबसे अहम मुद्दा गो-हत्या पर रोक लगाने वाले कानून की समीक्षा से जुड़ा है।
सूत्रों के अनुसार, राज्य सरकार अब उस कानून की समीक्षा पर विचार कर रही है, जिसे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के शासनकाल के दौरान लागू किया गया था। यह कानून गो-हत्या पर प्रतिबंध से संबंधित है और लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय रहा है।
जानकारी के मुताबिक, कुछ कांग्रेस विधायक इस कानून को समाप्त करने के लिए एक नया विधेयक लाने पर भी चर्चा कर रहे हैं। उच्च सदन में बहुमत मिलने की स्थिति को देखते हुए पार्टी के भीतर इस मुद्दे पर सक्रियता बढ़ गई है। यह भी कहा जा रहा है कि यह मुद्दा मुस्लिम समुदाय की प्रमुख मांगों में से एक रहा है।
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी हाल के चुनावी अनुभवों को ध्यान में रखते हुए अपने सामाजिक समर्थन आधार को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। सूत्रों के अनुसार, दावणगेरे दक्षिण उपचुनाव के दौरान मुस्लिम समुदाय की नाराज़गी के कारण वोटों का बंटवारा हुआ था, जिसका असर चुनावी परिणामों पर भी देखा गया। हालांकि कांग्रेस ने उपचुनाव जीत लिया था, लेकिन पार्टी को उम्मीद से कम समर्थन मिलने की बात सामने आई थी।
बताया जा रहा है कि पार्टी अब इस नुकसान की भरपाई के लिए समुदाय के साथ अपने संबंधों को फिर से मजबूत करने पर ध्यान दे रही है। इसी संदर्भ में नीतिगत स्तर पर कुछ बदलावों की चर्चा हो रही है।
इसी क्रम में एक और महत्वपूर्ण निर्णय पिछले महीने सामने आया था, जब कांग्रेस सरकार ने स्कूलों में मुस्लिम छात्राओं द्वारा हिजाब पहनने पर 2022 में लगाए गए प्रतिबंध को हटा दिया था। इस कदम को भी सरकार के सामाजिक समावेशी रुख से जोड़कर देखा गया था।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधान परिषद में बहुमत मिलने के बाद कांग्रेस के पास अब नीतिगत फैसलों को आगे बढ़ाने की अधिक स्वतंत्रता होगी। हालांकि गो-हत्या कानून जैसे संवेदनशील मुद्दों पर किसी भी बदलाव से राज्य में राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है।
विपक्षी दलों का कहना है कि इस तरह के फैसले सामाजिक संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं और सरकार को सभी समुदायों के हितों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेना चाहिए। वहीं सत्ताधारी दल का पक्ष है कि किसी भी कानून की समीक्षा लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है और निर्णय व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही लिया जाएगा।
फिलहाल इस मुद्दे पर आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है और आने वाले दिनों में इस पर और स्पष्टता आने की संभावना है।





