कर्नाटक

कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पर घमासान आर अशोक बोले केरल मॉडल पर कराएं जमीनी सर्वे

Kavita2
22 Sept 2026 11:31 AM IST
कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पर घमासान आर अशोक बोले केरल मॉडल पर कराएं जमीनी सर्वे
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बेंगलुरु: पश्चिमी घाट के पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों (ESA) को लेकर कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पर कर्नाटक में राजनीतिक और प्रशासनिक बहस तेज हो गई है। विधानसभा में विपक्ष के नेता आर. अशोक ने सोमवार को राज्य सरकार से केरल की तर्ज पर प्रभावित क्षेत्रों का भौतिक यानी जमीनी सर्वे कराने की मांग की। उन्होंने कहा कि पर्यावरण और वन मामलों की जानकारी रखने वाले कानूनी विशेषज्ञों की एक टीम भी बनाई जानी चाहिए, ताकि राज्य अपना पक्ष संबंधित न्यायिक और केंद्रीय मंचों पर प्रभावी तरीके से रख सके।

आर. अशोक ने यह मुद्दा विधान सौधा में शुरू हुए कर्नाटक विधानमंडल के तीन दिवसीय विशेष सत्र के पहले दिन उठाया। यह विशेष सत्र 21 से 23 सितंबर तक राज्य में सूखे की स्थिति और पश्चिमी घाट से संबंधित कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पर चर्चा के लिए बुलाया गया है।

1,576 गांव ESA के दायरे में

अशोक ने विधानसभा में कहा कि कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के तहत कर्नाटक के 1,576 गांवों में करीब 20,668 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र ESA के दायरे में बताया गया है। उन्होंने अन्य राज्यों के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि महाराष्ट्र में करीब 17,000 वर्ग किलोमीटर, केरल में 9,000 वर्ग किलोमीटर, तमिलनाडु में 6,000 वर्ग किलोमीटर और गोवा में 1,400 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र शामिल है।

कर्नाटक सरकार भी रिपोर्ट के मौजूदा स्वरूप को लेकर आपत्ति जता चुकी है। राज्य सरकार का कहना है कि प्रस्तावित ESA व्यवस्था से मलनाड और पश्चिमी घाट क्षेत्र में रहने वाले किसानों तथा स्थानीय निवासियों के हित प्रभावित हो सकते हैं। शिवमोग्गा जिले में ही प्रस्तावित ESA सूची में 484 गांव बताए गए हैं।

सैटेलाइट सर्वे पर अशोक ने उठाए सवाल

आर. अशोक ने दावा किया कि कस्तूरीरंगन समिति द्वारा सर्वे के दौरान सैटेलाइट तस्वीरों का इस्तेमाल किए जाने के कारण कॉफी बागानों, खेतों, सुपारी के बागानों और अन्य हरित क्षेत्रों को भी जंगल के रूप में दिखाए जाने की समस्या पैदा हुई।

उनके मुताबिक इससे कर्नाटक के 10 जिलों में बड़ी संख्या में किसानों के सामने समस्या खड़ी हो सकती है। उन्होंने इसे तकनीकी मुद्दा बताते हुए कहा कि वास्तविक स्थिति जानने के लिए जमीनी स्तर पर प्रत्येक गांव और भूमि की स्थिति का सत्यापन किया जाना चाहिए। यह अशोक का विधानसभा में रखा गया पक्ष है।

केरल मॉडल अपनाने की मांग

विपक्ष के नेता ने इस मामले में केरल के तरीके का उदाहरण दिया। उनके अनुसार केरल ने गांवों में जाकर जमीन, बागान, मकान और अन्य संरचनाओं का जमीनी सर्वे किया और उसके आधार पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार की।

अशोक ने कहा कि केरल की ओर से तैयार रिपोर्ट को केंद्र और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के समक्ष रखा गया, जिससे वास्तविक जमीन की स्थिति को सामने रखने में मदद मिली। उन्होंने कर्नाटक सरकार से भी इसी तरह गांव-गांव जाकर सर्वे कराने और वास्तविक वन क्षेत्र तथा मानव बस्तियों एवं कृषि भूमि के बीच अंतर स्पष्ट करने की मांग की।

मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने भी विशेष सत्र के दौरान पश्चिमी घाट में प्राकृतिक जंगल और कृषि भूमि की पहचान अधिक सटीक तरीके से करने के लिए जमीनी सत्यापन तथा आधुनिक मैपिंग तकनीक के इस्तेमाल का प्रस्ताव रखा है।

कानूनी विशेषज्ञों की टीम बनाने का सुझाव

आर. अशोक ने केवल सर्वे कराने की मांग नहीं की बल्कि राज्य सरकार से पर्यावरण और वन कानूनों में विशेषज्ञता रखने वाले वकीलों और कानूनी विशेषज्ञों की टीम बनाने को भी कहा।

उनका कहना था कि तकनीकी आंकड़ों के साथ मजबूत कानूनी पक्ष तैयार किया जाना चाहिए। इससे कर्नाटक सरकार संबंधित मंचों के सामने यह बता सकेगी कि किन क्षेत्रों में वास्तव में प्राकृतिक वन मौजूद हैं और किन इलाकों में वर्षों से कृषि, बागवानी तथा आबादी मौजूद है।

सड़क और बिजली परियोजनाओं पर जताई चिंता

अशोक ने दावा किया कि रिपोर्ट मौजूदा स्वरूप में लागू होने पर ESA में आने वाले क्षेत्रों में सड़क निर्माण, पुलों की मरम्मत, पेयजल पाइपलाइन और बिजली कनेक्शन जैसी विकास गतिविधियों पर अतिरिक्त नियामकीय प्रक्रिया का असर पड़ सकता है।

उन्होंने कहा कि इससे पश्चिमी घाट और मलनाड क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए व्यावहारिक समस्याएं पैदा हो सकती हैं। हालांकि ESA में वास्तव में कौन-सी गतिविधि प्रतिबंधित या विनियमित होगी, यह लागू होने वाली अंतिम अधिसूचना और उसमें निर्धारित शर्तों पर निर्भर करेगा।

राज्य सरकार भी जता चुकी है विरोध

इस मुद्दे पर केवल विपक्ष ही सवाल नहीं उठा रहा है। कर्नाटक सरकार ने भी कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के मौजूदा प्रस्तावों पर आपत्ति व्यक्त की है। राज्य सरकार के मंत्री मधु बंगारप्पा ने हाल में कहा था कि सरकार किसानों और मलनाड क्षेत्र के निवासियों के हितों को प्रभावित करने वाली व्यवस्था का विरोध करेगी।

इस तरह कर्नाटक में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों पश्चिमी घाट के संरक्षण की जरूरत के साथ स्थानीय लोगों और किसानों के हितों का मुद्दा उठा रहे हैं, हालांकि केंद्र की अधिसूचना और जिम्मेदारी को लेकर उनके राजनीतिक तर्क अलग हैं।

केंद्र के पास प्रतिनिधिमंडल भेजने की तैयारी

कर्नाटक सरकार इस मुद्दे को केंद्र के सामने उठाने के लिए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजने की तैयारी भी कर रही है। रिपोर्ट के मुताबिक सांसदों और विधायकों के प्रतिनिधिमंडल के जरिए राज्य की आपत्तियां केंद्र सरकार के सामने रखने की योजना है।

आर. अशोक ने भी कहा है कि उनकी पार्टी इस मुद्दे पर राज्य के प्रतिनिधिमंडल के साथ केंद्र के पास जाने के लिए तैयार है। उन्होंने साथ ही कहा कि कस्तूरीरंगन रिपोर्ट को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय तकनीकी और कानूनी तरीके से समाधान तलाशा जाना चाहिए।

तीन दिन के सत्र को बढ़ाने की भी मांग

अशोक ने कस्तूरीरंगन रिपोर्ट और सूखे जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा के लिए तीन दिन के विशेष सत्र को पर्याप्त नहीं बताया। उन्होंने सत्र को एक सप्ताह तक चलाने की मांग की। भाजपा की ओर से भी कहा गया है कि सूखे, पश्चिमी घाट और किसानों से जुड़े मुद्दों पर विस्तृत चर्चा के लिए अधिक समय दिया जाना चाहिए।

फिलहाल कस्तूरीरंगन रिपोर्ट का मुद्दा कर्नाटक में पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय लोगों की आजीविका के बीच संतुलन की बड़ी बहस बन गया है। आर. अशोक ने केरल मॉडल पर जमीनी सर्वे और विशेषज्ञ कानूनी टीम का सुझाव दिया है, जबकि राज्य सरकार भी अधिक सटीक भूमि मैपिंग के विकल्प पर विचार कर रही है। आगे राज्य की ओर से तैयार किए जाने वाले जमीनी आंकड़े और केंद्र के साथ होने वाली बातचीत इस विवाद की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

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