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कर्नाटक में संकट में पड़ा सदियों पुराना रेशम उद्योग, सस्ती साड़ियों ने छीना बुनकरों का रोजगार

Kavita2
8 Oct 2026 11:51 AM IST
कर्नाटक में संकट में पड़ा सदियों पुराना रेशम उद्योग, सस्ती साड़ियों ने छीना बुनकरों का रोजगार
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बेंगलुरु। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु की भागदौड़ भरी जिंदगी से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित डोड्डाबल्लापुर शहर अपनी सदियों पुरानी रेशम बुनाई की परंपरा के लिए प्रसिद्ध रहा है। कभी इस शहर के घरों और गलियों में करघों की आवाज गूंजती थी और यहां तैयार रेशमी साड़ियों की मांग देश के विभिन्न राज्यों में रहती थी। लेकिन अब यह पारंपरिक उद्योग गंभीर संकट का सामना कर रहा है। मशीनों से तैयार सस्ती साड़ियों की बढ़ती बिक्री, कच्चे माल की महंगाई और घटती मजदूरी ने हजारों बुनकर परिवारों के सामने आजीविका का संकट खड़ा कर दिया है। गुजरात के सूरत में तैयार होने वाली कम कीमत की साड़ियां डोड्डाबल्लापुर के पारंपरिक उत्पादों के लिए बड़ी चुनौती बन गई हैं। स्थानीय बुनकरों का कहना है कि यदि समय रहते इस उद्योग को संरक्षण नहीं मिला तो आने वाली पीढ़ियों के लिए बुनाई की यह विरासत बचाए रखना मुश्किल हो सकता है।

सदियों पुराना है डोड्डाबल्लापुर का बुनाई से रिश्ता

डोड्डाबल्लापुर कर्नाटक के महत्वपूर्ण रेशम बुनाई केंद्रों में शामिल रहा है। इस क्षेत्र में बुनाई की परंपरा की जड़ें पुराने क्षेत्रीय व्यापार, पारंपरिक शिल्प और बुनकर समुदायों से जुड़ी हैं।

स्थानीय इतिहास के अनुसार, मध्यकालीन दौर में व्यापारिक मार्गों और कारीगर समुदायों के कारण यहां कपड़ा उत्पादन को बढ़ावा मिला। बाद के वर्षों में देवांग बुनकर समुदाय ने रेशमी साड़ियों के उत्पादन को प्रमुख व्यवसाय के रूप में विकसित किया।

कभी यहां की हाथ से बुनी साड़ियों की विशेष पहचान थी। शादी-विवाह और धार्मिक आयोजनों के लिए इन साड़ियों की मांग रहती थी।

बेंगलुरु ग्रामीण जिला प्रशासन भी डोड्डाबल्लापुर को पारंपरिक रेशम बुनाई वाले क्षेत्रों में शामिल करता है। यहां की साड़ियों में रेशमी धागे और जरी का उपयोग किया जाता रहा है।

हाथकरघों से पावरलूम तक बदला उद्योग

डोड्डाबल्लापुर में शुरुआत में रेशमी साड़ियों का निर्माण हाथकरघों पर किया जाता था। लेकिन समय के साथ यहां के बुनकरों ने आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल शुरू किया।

वर्ष 1948 में शहर में बिजली पहुंचने के बाद पावरलूम का विस्तार हुआ। इससे कपड़ों का उत्पादन बढ़ा और बुनकरों को अधिक मात्रा में साड़ियां तैयार करने का अवसर मिला।

यहां बनने वाली पारंपरिक साड़ियों का वजन लगभग 850 ग्राम से एक किलोग्राम तक होता था। इनमें भारी जरी बॉर्डर का इस्तेमाल किया जाता था।

इन साड़ियों की बिक्री आंध्र प्रदेश के धर्मावरम के अलावा तमिलनाडु और तेलंगाना के बाजारों में भी होती थी।

हालांकि, समय के साथ शुद्ध रेशम की जगह सेमी-सिल्क और कृत्रिम रेशम का उपयोग बढ़ने लगा। इससे डोड्डाबल्लापुर के पारंपरिक उद्योग की पहचान भी बदलती गई।

सूरत की सस्ती साड़ियों ने बढ़ाई परेशानी

डोड्डाबल्लापुर के बुनकरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती गुजरात के सूरत से आने वाली मशीन निर्मित साड़ियां हैं।

स्थानीय बुनकर संगठनों का कहना है कि सूरत की बड़ी कपड़ा मिलों में डोड्डाबल्लापुर की पारंपरिक साड़ियों जैसे डिजाइन तैयार किए जा रहे हैं।

इन साड़ियों की कीमत स्थानीय उत्पादों की तुलना में काफी कम होती है।

बुनकर अधिकार मंच के अध्यक्ष बीजी हेमंत राजू के अनुसार, सूरत की मिलों में तैयार एक साड़ी की लागत करीब 600 रुपये आती है, जबकि डोड्डाबल्लापुर में इसी प्रकार की साड़ी बनाने की लागत 1,000 रुपये से अधिक हो सकती है।

इसी कीमत के अंतर के कारण व्यापारियों और ग्राहकों का झुकाव सस्ती साड़ियों की ओर बढ़ रहा है।

हजारों बुनकरों की आजीविका पर संकट

डोड्डाबल्लापुर और आसपास के इलाकों में बड़ी संख्या में परिवार बुनाई के व्यवसाय से जुड़े हैं।

जनवरी 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, क्षेत्र के लगभग 40 हजार करघा मालिकों में से कई को अब दूसरों के लिए ठेके पर काम करना पड़ रहा है।

कुछ बुनकरों की दैनिक कमाई मात्र 100 से 200 रुपये तक रह गई है।

स्थानीय बुनकर केसी द्वारकीश बताते हैं कि उनके परिवार के पास चार पावरलूम हैं। पहले वे अपनी साड़ियां तैयार करके बाजार में बेचते थे, लेकिन अब एजेंटों से कच्चा माल लेकर उनके निर्देशों के अनुसार कपड़ा बुनना पड़ता है।

उनका कहना है कि करघे और बिजली का खर्च उनके नाम पर है, लेकिन उत्पादन से होने वाली आमदनी बहुत सीमित रह गई है।

दिनभर काम करने के बाद भी कम कमाई

बुनकरों की आर्थिक स्थिति का अंदाजा उनकी मजदूरी से लगाया जा सकता है।

केसी द्वारकीश के अनुसार, साधारण कपड़े की बुनाई के लिए प्रति मीटर करीब 13.50 रुपये मिलते हैं। एक करघे से प्रतिदिन लगभग 20 मीटर कपड़ा तैयार हो पाता है।

वहीं साढ़े छह मीटर लंबी साड़ी तैयार करने पर लगभग 200 रुपये मजदूरी मिलती है।

बुनकरों का कहना है कि करघे उनके अपने होने के बावजूद वे आर्थिक रूप से मजदूरों जैसी स्थिति में पहुंच गए हैं।

लगातार बढ़ती लागत और सीमित आमदनी के कारण परिवारों के लिए इस व्यवसाय को जारी रखना कठिन होता जा रहा है।

महंगे रेशमी धागों ने बढ़ाई मुश्किल

रेशम बुनाई के व्यवसाय में कच्चे माल की कीमत भी बड़ी समस्या बन गई है।

स्थानीय बुनकर श्रीनाथ के अनुसार, रेशमी धागे की कीमत करीब 6,500 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है।

उनका कहना है कि धागे की सफाई के बाद उसका उपयोगी वजन कम हो जाता है। इससे उत्पादन लागत और बढ़ जाती है।

पहले बुनकरों को वर्ष के अधिकांश महीनों में काम मिल जाता था, लेकिन अब कुछ परिवारों को साल में केवल दो महीने ही पर्याप्त ऑर्डर मिलते हैं।

शेष समय करघे खाली रहने के कारण परिवारों की आमदनी प्रभावित होती है।

नई पीढ़ी बुनाई से बना रही दूरी

कम आमदनी और अनिश्चित रोजगार का असर युवा पीढ़ी पर भी पड़ रहा है।

कई बुनकर परिवारों में यह परंपरा तीन या उससे अधिक पीढ़ियों से चली आ रही है। लेकिन अब युवा इस व्यवसाय को अपनाने में कम रुचि दिखा रहे हैं।

बुनकरों का कहना है कि लंबे समय तक मेहनत करने के बावजूद पर्याप्त आय नहीं होने से युवा दूसरे रोजगार की तलाश करते हैं।

यदि यही स्थिति बनी रही तो पारंपरिक डिजाइन और बुनाई की तकनीकों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

सरकारी संरक्षण की मांग कर रहे बुनकर

डोड्डाबल्लापुर के बुनकर संगठनों ने सरकार से पारंपरिक कपड़ा उद्योग को संरक्षण देने की मांग की है।

उनका कहना है कि मशीनों से बड़ी मात्रा में तैयार सस्ती साड़ियों के कारण स्थानीय उत्पादन को बाजार में पर्याप्त अवसर नहीं मिल रहा है।

बुनकरों ने संबंधित आरक्षण नियमों के प्रभावी पालन और पारंपरिक उत्पादों की पहचान सुरक्षित रखने की मांग उठाई है।

कर्नाटक में हथकरघा विकास के लिए सरकारी योजनाएं मौजूद हैं, जिनमें प्रशिक्षण, उपकरण और विपणन संबंधी सहायता के प्रावधान शामिल हैं। हालांकि, डोड्डाबल्लापुर के बुनकरों को इन योजनाओं से कितनी राहत मिली है, इसका स्पष्ट आकलन उपलब्ध नहीं है।

विरासत बचाने की चुनौती

डोड्डाबल्लापुर की रेशम बुनाई केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा भी है।

यह उद्योग हजारों परिवारों की आजीविका और पीढ़ियों से चली आ रही कारीगरी से जुड़ा हुआ है।

बुनकरों का कहना है कि बढ़ती प्रतिस्पर्धा, महंगा कच्चा माल और घटते ऑर्डर उनकी सबसे बड़ी परेशानियां हैं।

अब इस पारंपरिक उद्योग का भविष्य बाजार की मांग, उत्पादों की पहचान और बुनकरों को मिलने वाले आर्थिक सहयोग पर निर्भर करेगा।

डोड्डाबल्लापुर के बुनकर अपनी कला को बचाए रखने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि सदियों पुरानी बुनाई की परंपरा आर्थिक रूप से भी टिकाऊ बनी रहे।

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