बेंगलुरु: कावेरी जल विवाद को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने शुक्रवार को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. विजय जोसेफ से अपील की कि वे 3 अगस्त को प्रस्तावित अपना बेंगलुरु दौरा फिलहाल टाल दें।
डीके शिवकुमार की यह अपील ऐसे समय आई है, जब कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) ने कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) के उस निर्देश को बरकरार रखा है, जिसमें कर्नाटक को 15 दिनों की अवधि के लिए तमिलनाडु को 3,500 क्यूसेक पानी छोड़ने का निर्देश दिया गया है।
इस फैसले के बाद कर्नाटक के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। खासकर मांड्या जिले में किसानों और स्थानीय संगठनों ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि राज्य में जल संकट की स्थिति के बावजूद तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ना किसानों के हितों के खिलाफ है।
विरोध प्रदर्शनों के बीच बढ़ा दबाव
कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर दोनों राज्यों के बीच लंबे समय से विवाद चला आ रहा है। इस बार भी जल छोड़ने के आदेश के बाद कर्नाटक में नाराजगी बढ़ गई है।
मांड्या, जो कावेरी बेसिन का महत्वपूर्ण कृषि क्षेत्र है, वहां किसानों और विभिन्न संगठनों ने सड़कों पर उतरकर विरोध जताया। प्रदर्शनकारियों ने राज्य सरकार से मांग की कि वह किसानों के हितों को प्राथमिकता दे और पानी छोड़ने के फैसले पर पुनर्विचार करे।
प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि मानसून की अनिश्चितता और जलाशयों में पानी की सीमित उपलब्धता के कारण राज्य के किसानों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
मुख्यमंत्री ने जताई चिंता
डीके शिवकुमार ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री से बेंगलुरु दौरा टालने का अनुरोध करते हुए मौजूदा माहौल का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि कावेरी जल विवाद को लेकर राज्य में भावनाएं काफी संवेदनशील हैं और ऐसे समय में किसी भी तरह की स्थिति को संभालने के लिए सावधानी बरतना जरूरी है।
कर्नाटक सरकार का कहना है कि वह अदालतों और संबंधित प्राधिकरणों के निर्देशों का सम्मान करती है, लेकिन साथ ही राज्य के किसानों और लोगों के हितों की रक्षा करना भी उसकी जिम्मेदारी है।
CWMA के फैसले से नाराजगी
कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण के फैसले के बाद कर्नाटक सरकार पर राजनीतिक और सामाजिक दबाव बढ़ गया है। CWRC के निर्देश को बरकरार रखते हुए कर्नाटक को तमिलनाडु के लिए 3,500 क्यूसेक पानी छोड़ने को कहा गया है।
राज्य सरकार का कहना है कि वह इस मुद्दे पर कानूनी और संवैधानिक रास्तों के जरिए अपनी बात रखेगी। वहीं, विपक्षी दल भी सरकार पर दबाव बना रहे हैं और किसानों के हितों को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
मांड्या में किसानों का प्रदर्शन
मांड्या जिले में कावेरी जल विवाद को लेकर सबसे ज्यादा विरोध देखने को मिला है। यहां किसानों और स्थानीय संगठनों ने प्रदर्शन करते हुए पानी छोड़ने के फैसले का विरोध किया।
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि कावेरी का पानी राज्य के किसानों की जीवनरेखा है। यदि पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं होगा तो कृषि गतिविधियों पर गंभीर असर पड़ सकता है।
कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों ने सरकार से मांग की कि वह राज्य के जल संसाधनों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए आगे का फैसला ले।
दोनों राज्यों के बीच पुराना विवाद
कावेरी नदी जल बंटवारे का विवाद दशकों पुराना है। नदी का पानी कर्नाटक और तमिलनाडु दोनों राज्यों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। दोनों राज्यों के किसान सिंचाई और पेयजल जरूरतों के लिए कावेरी पर निर्भर हैं।
समय-समय पर जल बंटवारे को लेकर दोनों राज्यों के बीच तनाव की स्थिति पैदा होती रही है। केंद्र और न्यायिक संस्थाओं के हस्तक्षेप के बाद भी कई बार यह मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक विवाद का रूप ले लेता है।
आगे की स्थिति पर नजर
फिलहाल कावेरी जल विवाद को लेकर कर्नाटक में राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार की अपील के बाद अब सभी की नजर तमिलनाडु सरकार की प्रतिक्रिया पर है।
राज्य सरकारों के सामने चुनौती यह है कि वे जल विवाद का समाधान निकालने के साथ-साथ दोनों राज्यों के किसानों और आम लोगों के हितों का संतुलन बनाए रखें।
कावेरी जल विवाद एक बार फिर दोनों राज्यों के बीच संवेदनशील मुद्दा बन गया है और आने वाले दिनों में इस पर राजनीतिक तथा प्रशासनिक स्तर पर और गतिविधियां देखने को मिल सकती हैं।





