
चित्रदुर्ग : कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने छात्रों के विरोध-प्रदर्शनों और उनसे जुड़े घटनाक्रम पर केंद्र सरकार तथा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि छात्रों के खिलाफ दर्ज मामले वापस लिए जाने चाहिए और केंद्रीय शिक्षा मंत्री को अपने पद से इस्तीफा देना चाहिए। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि छात्रों के साथ हुए कथित दुर्व्यवहार और लाठीचार्ज से पूरे देश में आक्रोश है तथा भाजपा इस जनभावना का सामना नहीं कर पा रही है।
शनिवार को चित्रदुर्ग में पत्रकारों से बातचीत के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि विपक्ष लगातार संसद में इस मुद्दे पर चर्चा की मांग कर रहा है। उनका कहना था कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े गंभीर मामलों पर खुली और व्यापक बहस होनी चाहिए, ताकि छात्रों की चिंताओं का समाधान निकाला जा सके।
संसद में चर्चा की मांग दोहराई
मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने कहा कि विपक्ष ने संसद में इस विषय पर चर्चा कराने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यह केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि लाखों छात्रों और उनके भविष्य से जुड़ा विषय है।
उन्होंने कहा कि यदि किसी परीक्षा या उससे संबंधित घटनाओं को लेकर छात्रों में असंतोष है तो सरकार को उनकी बात सुननी चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवाद और चर्चा ही समस्याओं के समाधान का सबसे प्रभावी माध्यम है।
छात्रों पर दर्ज मामले वापस लेने की मांग
मुख्यमंत्री ने कहा कि विरोध-प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लिया जाना चाहिए। उनका कहना था कि छात्र अपनी मांगों को लेकर लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठा रहे हैं और उनकी बात को गंभीरता से सुना जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि छात्रों पर बल प्रयोग की घटनाओं से समाज के विभिन्न वर्गों में नाराजगी है। उनके अनुसार, इस प्रकार की कार्रवाई से युवाओं में गलत संदेश जाता है और लोकतांत्रिक अधिकारों पर भी सवाल खड़े होते हैं।
शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग
डी.के. शिवकुमार ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग दोहराते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था से जुड़े विवादों की नैतिक जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि किसी बड़े विवाद के कारण छात्रों का भरोसा प्रभावित हुआ है तो जवाबदेही तय करना आवश्यक है।
उन्होंने आरोप लगाया कि छात्रों के साथ हुई कथित सख्ती के कारण व्यापक जनाक्रोश पैदा हुआ है और भाजपा इस स्थिति का प्रभावी ढंग से सामना नहीं कर पा रही है।
लोकतांत्रिक अधिकारों का किया जिक्र
मुख्यमंत्री ने कहा कि लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि क्या किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों को अपनी बात रखने से रोका जा सकता है।
उन्होंने कहा, "क्या हम लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध प्रदर्शनों को मना कर सकते हैं? क्या मैं उन लोगों को रोक सकता हूं जो मेरा विरोध करते हैं? मीडिया भी कई बार सरकार की आलोचना करता है। क्या उसे भी रोका जा सकता है?"
मुख्यमंत्री का कहना था कि सरकारों को आलोचना स्वीकार करने की क्षमता रखनी चाहिए और जनता की आवाज सुननी चाहिए।
केपीएससी अध्यक्ष के मुद्दे पर भी बोले
मुख्यमंत्री ने कर्नाटक लोक सेवा आयोग (केपीएससी) के अध्यक्ष से जुड़े विवाद पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि वर्तमान अध्यक्ष की नियुक्ति उनकी सरकार ने नहीं की थी, बल्कि यह नियुक्ति पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के कार्यकाल में हुई थी।
उन्होंने कहा कि यदि संबंधित पदाधिकारी के खिलाफ गंभीर प्रश्न उठे हैं तो समय रहते उचित कार्रवाई होनी चाहिए थी। उनके अनुसार, पहले ही पत्र लिखकर उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी जानी चाहिए थी।
राज्यपाल की कार्रवाई पर सरकार का रुख
डी.के. शिवकुमार ने कहा कि राज्यपाल की ओर से जो प्रस्ताव या संस्तुति भेजी गई है, उसे राज्य सरकार ने स्वीकार कर लिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी और जांच के निष्कर्षों के आधार पर आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
उन्होंने कहा कि सरकार किसी भी मामले में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के पक्ष में है। यदि जांच में किसी स्तर पर अनियमितता सामने आती है तो कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।
संवाद से समाधान पर जोर
मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार का उद्देश्य किसी भी विवाद को टकराव के बजाय संवाद के माध्यम से सुलझाना है। उन्होंने दोहराया कि छात्रों की समस्याओं, शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों और प्रशासनिक मामलों पर सरकार गंभीरता से विचार कर रही है।
उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना सभी राजनीतिक दलों और संवैधानिक संस्थाओं की जिम्मेदारी है। छात्रों का भविष्य सुरक्षित रहे और शिक्षा व्यवस्था में जनता का विश्वास बना रहे, इसके लिए आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए।
मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद छात्रों से जुड़े मुद्दों, शिक्षा व्यवस्था और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज होने की संभावना है।





