
कारवार: कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले में सरकारी निर्माण की योजना पर गंभीर सवाल खड़ा करने वाला मामला सामने आया है। कारवार के पास करीब 8.7 करोड़ रुपये की लागत से बनाया गया पुल वर्षों से जनता के किसी काम नहीं आ रहा है। पुल का निर्माण जनवरी 2022 में ही पूरा हो गया था, लेकिन उसे मुख्य सड़क से जोड़ने वाला संपर्क मार्ग आज तक नहीं बनाया गया। नतीजा यह है कि करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद पुल को आम यातायात के लिए शुरू नहीं किया जा सका है।
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में भी इस परियोजना का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक पुल तैयार होने के बावजूद संपर्क सड़क उपलब्ध नहीं होने के कारण इसका इस्तेमाल शुरू नहीं हो पाया। मामला सामने आने के बाद निर्माण कार्य शुरू करने से पहले की गई योजना और संबंधित अधिकारियों के बीच समन्वय को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
दो गांवों को जोड़ने के लिए बनाया गया था पुल
यह पुल सिद्दारण्यावाड गांव को उम्बलजुग गांव से जोड़ने के उद्देश्य से बनाया गया था। ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर आवागमन उपलब्ध कराने और दोनों गांवों के बीच संपर्क आसान बनाने के लिए परियोजना तैयार की गई थी।
पुल बनने से स्थानीय लोगों को आवाजाही में सुविधा मिलने की उम्मीद थी। ग्रामीणों को बाजार, अस्पताल, स्कूल और अन्य जरूरी सेवाओं तक पहुंचने के लिए बेहतर रास्ता मिल सकता था। कृषि उत्पादों और दूसरी वस्तुओं के परिवहन में भी इसका फायदा मिलने की संभावना थी।
लेकिन निर्माण पूरा होने के बावजूद पुल को सड़क नेटवर्क से नहीं जोड़े जाने के कारण इसका मूल उद्देश्य अब तक पूरा नहीं हुआ है।
जनवरी 2022 में पूरा हुआ था निर्माण
करीब 8.7 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद जनवरी 2022 में पुल बनकर तैयार हो गया था। सामान्य परिस्थितियों में निर्माण पूरा होने के बाद इसे संपर्क सड़कों से जोड़कर यातायात के लिए खोला जाना था।
इसके उलट पुल के तैयार होने के बाद भी उसके दोनों ओर ऐसी सड़क उपलब्ध नहीं कराई गई जिससे सामान्य वाहन वहां तक पहुंच सकें। इस कारण पूरा ढांचा उपयोग से बाहर पड़ा हुआ है।
स्थानीय लोगों में इसे लेकर नाराजगी बताई जा रही है। उनका सवाल है कि जब पुल तक पहुंचने के लिए सड़क ही उपलब्ध नहीं थी तो करोड़ों रुपये खर्च करके पहले पुल तैयार करने का क्या फायदा हुआ।
CAG रिपोर्ट में भी उठा मामला
CAG की रिपोर्ट में इस पुल के उपयोग में नहीं आने की स्थिति का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार संपर्क सड़क नहीं होने के कारण जनवरी 2022 में पूरा हुआ पुल अभी तक चालू नहीं हो पाया।
किसी सरकारी परियोजना के ऑडिट में केवल यह नहीं देखा जाता कि निर्माण पर कितनी रकम खर्च हुई, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण होता है कि जिस उद्देश्य के लिए राशि खर्च की गई थी, वह उद्देश्य हासिल हुआ या नहीं।
इस मामले में पुल का मुख्य ढांचा तैयार है, लेकिन जनता उसका इस्तेमाल नहीं कर पा रही है। ऐसे में परियोजना पर हुए खर्च से अपेक्षित सार्वजनिक लाभ हासिल नहीं हुआ है।
संपर्क सड़क परियोजना का अहम हिस्सा
पुल निर्माण में केवल नदी, नाले या अन्य बाधा के ऊपर ढांचा खड़ा कर देना पर्याप्त नहीं होता। पुल के दोनों सिरों पर संपर्क मार्ग तैयार करना भी उतना ही जरूरी होता है।
एप्रोच रोड के जरिए ही पुल मौजूदा सड़क नेटवर्क का हिस्सा बनता है। अगर संपर्क मार्ग उपलब्ध नहीं हो तो तकनीकी रूप से तैयार पुल भी व्यावहारिक रूप से बेकार हो सकता है।
कारवार के पास बने इस पुल में यही स्थिति सामने आई है। करोड़ों रुपये की संरचना तैयार है, लेकिन उस तक पहुंचने की पर्याप्त सड़क नहीं होने के कारण वाहनों का नियमित आवागमन शुरू नहीं किया जा सका।
प्लानिंग को लेकर उठ रहे सवाल
इस पूरे मामले ने परियोजना शुरू होने से पहले की योजना पर सवाल खड़े किए हैं। किसी भी पुल के निर्माण से पहले तकनीकी सर्वेक्षण के साथ संपर्क सड़क के लिए जमीन की उपलब्धता, मौजूदा सड़क नेटवर्क और निर्माण की व्यवहार्यता का आकलन किया जाना जरूरी होता है।
अगर संपर्क सड़क के निर्माण के लिए अतिरिक्त जमीन की जरूरत हो तो उससे जुड़ी प्रक्रिया भी मुख्य निर्माण के साथ आगे बढ़ाई जानी चाहिए। इसी तरह अलग-अलग सरकारी विभागों से मंजूरी की जरूरत होने पर उसे समय रहते पूरा करना आवश्यक होता है।
पुल बनने के वर्षों बाद भी संपर्क सड़क नहीं होना बताता है कि परियोजना के अलग-अलग हिस्सों के क्रियान्वयन में तालमेल की समस्या रही।
सार्वजनिक धन के इस्तेमाल पर भी सवाल
इस परियोजना पर लगभग 8.7 करोड़ रुपये का सार्वजनिक धन खर्च हुआ है। इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद स्थानीय लोगों को सुविधा नहीं मिलने से सरकारी धन के प्रभावी इस्तेमाल का मुद्दा भी सामने आया है।
बुनियादी ढांचे पर सरकारी खर्च का उद्देश्य लोगों को लंबे समय तक सुविधा उपलब्ध कराना होता है। सड़क और पुल जैसी परियोजनाएं क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने और लोगों की यात्रा को आसान बनाने के लिए बनाई जाती हैं।
अगर कोई परियोजना बनकर तैयार होने के बाद वर्षों तक इस्तेमाल में नहीं आती तो उस निवेश का लाभ भी अटक जाता है।
इसके साथ ही तैयार संरचना के रखरखाव पर भी खर्च करना पड़ सकता है। लंबे समय तक इस्तेमाल नहीं होने के बाद पुल को यातायात के लिए खोलने से पहले उसकी तकनीकी स्थिति की समीक्षा की आवश्यकता भी पड़ सकती है।
ग्रामीणों को अब भी सुविधा का इंतजार
जिन गांवों के लोगों की सुविधा के लिए यह पुल बनाया गया था, उन्हें वर्षों बाद भी इसके शुरू होने का इंतजार है। पुल चालू होने से स्थानीय स्तर पर यात्रा आसान होने की उम्मीद थी, लेकिन संपर्क सड़क नहीं बनने से स्थिति नहीं बदली।
ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क संपर्क का महत्व इसलिए भी अधिक होता है क्योंकि कई इलाकों में वैकल्पिक मार्ग लंबे होते हैं। अच्छी सड़क और पुल मिलने से आपात स्थिति में अस्पताल तक पहुंचने से लेकर बच्चों के स्कूल और किसानों के बाजार तक जाने में आसानी होती है।
ऐसे में तैयार पुल का उपयोग नहीं होना केवल सरकारी निर्माण का मामला नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की दैनिक सुविधा से भी जुड़ा हुआ है।
सड़क बनने के बाद ही मिलेगा पुल का फायदा
अब इस पुल को उपयोगी बनाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण जरूरत संपर्क सड़क तैयार करने की है। जब तक पुल को मुख्य सड़क से नहीं जोड़ा जाता, तब तक करीब 8.7 करोड़ रुपये खर्च करके तैयार किया गया यह ढांचा अपने मूल उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाएगा।
मामले ने सरकारी निर्माण परियोजनाओं में योजना से लेकर अंतिम क्रियान्वयन तक समन्वय की जरूरत को एक बार फिर सामने रखा है। परियोजना की सफलता केवल निर्माण पूरा होने से नहीं, बल्कि उसके जनता के उपयोग में आने से तय होती है।
सिद्दारण्यावाड और उम्बलजुग गांव को जोड़ने के लिए जनवरी 2022 में तैयार हुआ पुल इसी कमी का उदाहरण बन गया है। पुल खड़ा है, लेकिन सड़क नहीं होने के कारण लोग उसका इस्तेमाल नहीं कर सकते। अब स्थानीय लोगों की नजर इस बात पर है कि संपर्क मार्ग कब तैयार होगा और करोड़ों रुपये से बना पुल आखिर कब यातायात के लिए खुलेगा।





