कर्नाटक

‘ब्रिज मैन ऑफ इंडिया’ पद्म श्री गिरीश भारद्वाज का निधन

Kavita2
7 July 2026 10:42 AM IST
‘ब्रिज मैन ऑफ इंडिया’ पद्म श्री गिरीश भारद्वाज का निधन
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Karnataka कर्नाटक: पद्म श्री से सम्मानित और ‘ब्रिज मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से मशहूर गिरीश भारद्वाज का मंगलवार को निधन हो गया। वह 76 वर्ष के थे। उन्होंने कर्नाटक समेत कई राज्यों के दूरदराज के गांवों में कम लागत वाले और पर्यावरण के अनुकूल हैंगिंग फुटब्रिज बनाकर हजारों लोगों की जिंदगी आसान बनाई थी।

गिरीश भारद्वाज ने सुल्लिया स्थित एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से इंजीनियरिंग जगत, ग्रामीण विकास से जुड़े लोगों और स्थानीय समुदायों में शोक की लहर है।

गांवों को जोड़ने वाले इंजीनियर के रूप में बनाई पहचान

गिरीश भारद्वाज ने कर्नाटक, केरल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा के ग्रामीण इलाकों में 150 से ज्यादा इको-फ्रेंडली और कम लागत वाले हैंगिंग फुटब्रिज डिजाइन और तैयार किए।

उनके बनाए पुल सिर्फ नदी और नालों को पार करने का माध्यम नहीं थे, बल्कि दूर-दराज के गांवों के लोगों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार तक पहुंच का रास्ता बने।

उनके काम की खासियत यह थी कि उन्होंने आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीक को ग्रामीण जरूरतों के साथ जोड़ा। कम खर्च में मजबूत और टिकाऊ पुल बनाना उनकी पहचान बन गया।

पिता की सलाह ने बदली जिंदगी की दिशा

गिरीश भारद्वाज ने 1970 के दशक में मांड्या के पीईएस कॉलेज से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका सपना किसी निजी कंपनी या फैक्ट्री में नौकरी करने का था।

लेकिन उनके पिता, जो किसान थे, ने उन्हें गांवों की समस्याओं को समझने और उनके समाधान खोजने के लिए प्रेरित किया।

पिता की सलाह ने उनकी सोच बदल दी। उन्होंने तय किया कि वह अपनी इंजीनियरिंग की जानकारी का इस्तेमाल ग्रामीण इलाकों की परेशानियां दूर करने में करेंगे।

इसके बाद उन्होंने रैशनल इंजीनियरिंग वर्क्स की शुरुआत की। यह संस्थान शुरुआती दौर में सामान्य फैब्रिकेशन कार्य और कृषि उपकरण बनाने का काम करता था। बाद में उन्होंने सुल्लिया में अयाशिल्पा इंडस्ट्रीज की स्थापना की।

एक गांव की समस्या ने शुरू कराया पुल बनाने का सफर

गिरीश भारद्वाज के पुल निर्माण के सफर की शुरुआत दक्षिण कन्नड़ जिले के सुल्लिया तालुक के दूरदराज गांव आरामबुरू से हुई।

गांव के लोगों ने नदी पार करने में होने वाली परेशानियों को दूर करने के लिए उनसे फुटब्रिज बनाने की अपील की।

शुरुआत में भारद्वाज को गांव वालों की इस सोच पर हैरानी हुई कि कोई भी इंजीनियर पुल बना सकता है। लेकिन जब उन्होंने ग्रामीणों की वास्तविक समस्याओं को देखा तो उन्होंने इस चुनौती को स्वीकार करने का फैसला किया।

उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों के इंजीनियर मित्रों की मदद ली और पुल निर्माण से जुड़ी किताबों का अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने कम लागत वाले हैंगिंग फुटब्रिज का डिजाइन तैयार किया।

ग्रामीणों के सहयोग से तैयार हुआ पहला पुल

आरामबुरू में बनाया गया पहला पुल एक सामुदायिक प्रयास का उदाहरण बना। इस प्रोजेक्ट के लिए ग्रामीणों ने भी योगदान दिया।

कई लोगों ने ‘श्रमदान’ के माध्यम से निर्माण कार्य में सहयोग किया। कुछ लोगों ने आर्थिक मदद भी जुटाई।

इस मॉडल ने साबित किया कि स्थानीय लोगों की भागीदारी से कम संसाधनों में भी बड़ी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।

पुलों से बदली ग्रामीणों की जिंदगी

गिरीश भारद्वाज द्वारा बनाए गए पुलों ने कई गांवों की तस्वीर बदल दी। जहां पहले बारिश के मौसम में लोगों को नदी-नाले पार करने में घंटों लग जाते थे, वहीं पुल बनने के बाद आवाजाही आसान हो गई।

स्कूल जाने वाले बच्चों, किसानों, मरीजों और रोजमर्रा के कामों के लिए बाहर जाने वाले लोगों को बड़ी राहत मिली।

उनके पुलों की खासियत कम लागत, स्थानीय संसाधनों का उपयोग और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील डिजाइन थी।

पद्म श्री से हुए सम्मानित

ग्रामीण विकास और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उनके असाधारण योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री सम्मान से नवाजा था।

उन्हें देशभर में एक ऐसे इंजीनियर के रूप में पहचान मिली, जिन्होंने अपनी तकनीकी क्षमता का इस्तेमाल समाज के कमजोर और दूरदराज के लोगों के लिए किया।

युवाओं के लिए बने प्रेरणा

गिरीश भारद्वाज का जीवन इस बात का उदाहरण रहा कि इंजीनियरिंग केवल बड़े प्रोजेक्ट और शहरों तक सीमित नहीं है। तकनीक का इस्तेमाल समाज की वास्तविक समस्याओं को हल करने के लिए भी किया जा सकता है।

उन्होंने युवाओं को हमेशा स्थानीय समस्याओं को समझने और उनके समाधान के लिए आगे आने की प्रेरणा दी।

एक अनोखी विरासत छोड़ गए भारद्वाज

गिरीश भारद्वाज भले ही अब इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन उनके बनाए पुल और उनका काम हमेशा लोगों को जोड़ता रहेगा।

उन्होंने लोहे और रस्सियों से बने पुलों के जरिए सिर्फ नदियां नहीं पार कराईं, बल्कि गांवों और शहरों के बीच की दूरी भी कम की।

‘ब्रिज मैन ऑफ इंडिया’ के रूप में उनकी पहचान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।

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