कर्नाटक

SIR विवाद में BJP का बड़ा दांव विजयेंद्र ने FIR वापस लेने की मांग की

Ratna Netam
3 Oct 2026 3:25 PM IST
SIR विवाद में BJP का बड़ा दांव विजयेंद्र ने FIR वापस लेने की मांग की
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बेंगलुरु। कर्नाटक में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान फॉर्म-7 के कथित गलत इस्तेमाल को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रदेश अध्यक्ष बी.वाई. विजयेंद्र ने शनिवार को उन भाजपा कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज मामलों और FIR को वापस लेने की मांग की, जिन्होंने SIR प्रक्रिया के दौरान फॉर्म-7 आवेदन जमा किए थे। विजयेंद्र ने आरोप लगाया कि इन कार्यकर्ताओं के खिलाफ मामले राजनीतिक दबाव में दर्ज किए गए हैं।विजयेंद्र के नेतृत्व में भाजपा के एक प्रतिनिधिमंडल ने कर्नाटक के डायरेक्टर जनरल और इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (DG-IGP) एम.ए. सलीम से मुलाकात की और उन्हें एक ज्ञापन सौंपा। भाजपा ने मांग की कि फॉर्म-7 से जुड़े मामलों में पुलिस कार्रवाई कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर हो तथा किसी भी राजनीतिक हस्तक्षेप से बचा जाए।
BJP ने फॉर्म-7 को बताया वैधानिक प्रक्रिया
विजयेंद्र ने कहा कि फॉर्म-7 चुनाव आयोग की निर्धारित प्रक्रिया का हिस्सा है। इसके जरिए कोई नागरिक मतदाता सूची में दर्ज ऐसे नामों पर आपत्ति दर्ज करा सकता है, जिनके बारे में उसे संदेह हो कि वे अयोग्य हैं, डुप्लीकेट हैं या नियमों के खिलाफ सूची में शामिल किए गए हैं। उनके अनुसार, केवल फॉर्म-7 जमा करना अपने आप में गैरकानूनी काम नहीं है।उन्होंने आरोप लगाया कि इस वैधानिक प्रक्रिया का इस्तेमाल करने वाले भाजपा कार्यकर्ताओं पर मुकदमे दर्ज कर उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। विजयेंद्र का कहना है कि यदि किसी आवेदन में गलत जानकारी, फर्जी दस्तावेज या कानून का उल्लंघन पाया जाता है, तो जांच कानून के अनुसार होनी चाहिए, लेकिन राजनीतिक आधार पर कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए।
भाजपा प्रतिनिधिमंडल ने पुलिस प्रमुख को सौंपा ज्ञापन
DG-IGP एम.ए. सलीम से हुई मुलाकात के दौरान भाजपा प्रतिनिधिमंडल में पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा, विधानसभा में विपक्ष के नेता आर. अशोक, विधान परिषद में विपक्ष के नेता चलवाड़ी नारायणस्वामी, पूर्व उपमुख्यमंत्री सी.एन. अश्वथ नारायण समेत कई नेता शामिल थे। प्रतिनिधिमंडल ने फॉर्म-7 विवाद में भाजपा कार्यकर्ताओं के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई का मुद्दा उठाया।भाजपा ने ज्ञापन के जरिए यह भी मांग रखी कि फॉर्म-7 से संबंधित शिकायतों की जांच स्वतंत्र तरीके से की जाए और जांच के दौरान किसी दल या राजनीतिक संगठन का दबाव न हो। पार्टी ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति ने नियमों के तहत आपत्ति दर्ज कराई है तो सिर्फ इस आधार पर उसके खिलाफ मामला नहीं बनाया जाना चाहिए।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
कर्नाटक में SIR प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में फॉर्म-7 आवेदन दाखिल किए जाने की शिकायतों के बाद विवाद बढ़ा। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने आरोप लगाया था कि बड़े पैमाने पर फॉर्म-7 के जरिए पात्र मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने इस मामले की आपराधिक जांच की मांग की थी।शिवकुमार के आरोपों के बाद राज्य के अलग-अलग हिस्सों से ऐसे मामले सामने आए, जिनमें कथित तौर पर बड़ी संख्या में मतदाता नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 आवेदन दाखिल किए गए थे। कुछ मामलों में पुलिस ने FIR दर्ज की और जांच शुरू की।
कई जगह FIR दर्ज होने से बढ़ा मामला
कर्नाटक पुलिस ने फॉर्म-7 आवेदन से जुड़े आरोपों के मामले में अलग-अलग जिलों में FIR दर्ज की हैं। पुलिस के मुताबिक, कुछ शिकायतों में आरोप लगाया गया कि अल्पसंख्यक और अन्य समुदायों के मतदाताओं के नाम हटाने के लिए बड़ी संख्या में आवेदन जमा किए गए।बेलगावी में भाजपा नेता रवि पाटिल और अन्य लोगों के खिलाफ 198 मतदाताओं के नाम हटाने की कथित कोशिश के आरोप में FIR दर्ज होने की जानकारी सामने आई। आरोप था कि फॉर्म-7 आवेदनों के जरिए मतदाता सूची से नाम हटाने की कोशिश की गई और आवेदन में कथित रूप से गलत या जाली जानकारी का इस्तेमाल हुआ। मामले की जांच जारी है।मामले की प्रकृति को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हुए हैं। भाजपा का कहना है कि उसके कार्यकर्ताओं ने चुनाव आयोग के नियमों के तहत उपलब्ध प्रक्रिया का इस्तेमाल किया, जबकि राज्य सरकार और शिकायतकर्ताओं की ओर से कुछ मामलों में फॉर्म-7 के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
चुनाव आयोग ने भी दिए कार्रवाई के निर्देश
फॉर्म-7 विवाद बढ़ने के बीच कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी वी. अनबुकुमार ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि मतदाता सूची में बदलाव के लिए जानबूझकर झूठी जानकारी या गलत आपत्ति दाखिल करने वालों के खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई की जाए। यह निर्देश उन रिपोर्टों के बाद आया, जिनमें बड़ी संख्या में फॉर्म-7 आवेदन और कथित रूप से गलत विवरण के इस्तेमाल का मुद्दा सामने आया था।चुनाव आयोग की ओर से यह रुख स्पष्ट किया गया कि मतदाता सूची में नाम हटाने या जोड़ने की प्रक्रिया निर्धारित कानूनी प्रावधानों के तहत ही होनी चाहिए। किसी आपत्ति या दावे में गलत जानकारी दिए जाने पर जांच और आवश्यक कार्रवाई की जा सकती है।
विजयेंद्र ने कहा- जांच कानून के मुताबिक हो
विजयेंद्र ने पुलिस से मुलाकात के बाद कहा कि भाजपा फॉर्म-7 के इस्तेमाल को गैरकानूनी नहीं मानती, क्योंकि यह निर्वाचन प्रक्रिया में निर्धारित प्रावधान है। उनका कहना था कि अगर किसी मामले में व्यक्ति ने गलत दस्तावेज लगाए हैं या जानबूझकर गलत जानकारी दी है, तो उसकी जांच और कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन सभी फॉर्म-7 आवेदनों को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता।उन्होंने राज्य सरकार पर आरोप लगाया कि वह चुनाव आयोग पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही है और भाजपा कार्यकर्ताओं के खिलाफ FIR इसी राजनीतिक दबाव का परिणाम हैं। यह विजयेंद्र का आरोप है; राज्य सरकार और पुलिस की ओर से इन सभी आरोपों को स्वीकार किए जाने की पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों में नहीं है।
भाजपा ने कहा- डरने की जरूरत नहीं
फॉर्म-7 विवाद के बीच भाजपा नेताओं ने अपने कार्यकर्ताओं का बचाव करते हुए कहा है कि पार्टी कानूनी प्रक्रिया के जरिए मामलों का सामना करेगी। वरिष्ठ भाजपा नेता बी.एस. येदियुरप्पा ने भी चेतावनी दी है कि यदि फॉर्म-7 से जुड़े मामलों में भाजपा कार्यकर्ताओं के खिलाफ पुलिस कार्रवाई या उत्पीड़न जारी रहा, तो पार्टी राज्यव्यापी विरोध का रास्ता अपना सकती है।येदियुरप्पा ने कहा कि कार्यकर्ताओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू किए जाने की स्थिति में भाजपा राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर इसका जवाब देगी। इससे संकेत मिलता है कि विवाद अब केवल मतदाता सूची की प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राज्य की राजनीति में भी इसका असर दिखाई देने लगा है।
मतदाता सूची की शुचिता बना मुख्य मुद्दा
कर्नाटक में चल रहा फॉर्म-7 विवाद मूल रूप से मतदाता सूची की शुद्धता और आपत्ति दर्ज कराने की प्रक्रिया से जुड़ा है। एक पक्ष का कहना है कि फॉर्म-7 वैध प्रक्रिया है और इसके जरिए संदिग्ध या अयोग्य प्रविष्टियों पर आपत्ति दर्ज कराई जा सकती है। दूसरे पक्ष की शिकायत है कि यदि इसका इस्तेमाल सामूहिक रूप से पात्र मतदाताओं के नाम हटाने के लिए किया गया, तो यह गंभीर मामला होगा।यही वजह है कि पुलिस जांच और चुनाव अधिकारियों की पड़ताल इस विवाद में महत्वपूर्ण होगी। किन आवेदनों में तथ्य सही थे, किनमें गलत जानकारी दी गई और क्या किसी संगठित तरीके से मतदाता सूची को प्रभावित करने की कोशिश हुई—इन सवालों का जवाब जांच के परिणामों से ही सामने आएगा।फिलहाल बी.वाई. विजयेंद्र ने पुलिस प्रमुख से भाजपा कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। वहीं, फॉर्म-7 के कथित दुरुपयोग से जुड़े मामलों में पुलिस और चुनाव अधिकारियों की जांच जारी है। कर्नाटक में SIR की प्रक्रिया के बीच यह विवाद आने वाले दिनों में और राजनीतिक बहस का विषय बन सकता है।
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