
बेंगलुरु। कर्नाटक के खाद्य और औषधि प्रशासन विभाग ने दवाओं की कीमतों से जुड़े एक बड़े कथित फ्रॉड रैकेट का पर्दाफाश किया है। जांच के दायरे में 254 फार्मास्युटिकल कंपनियां आई हैं। अधिकारियों के मुताबिक मरीजों को बेची जाने वाली दवाओं और मेडिकल उपकरणों की वास्तविक खरीद कीमत तथा उन पर दर्ज अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) के बीच भारी अंतर पाया गया है। आरोप है कि कुछ मामलों में मरीजों से दवाओं की कीमत पर 60 से 90 प्रतिशत तक ज्यादा मुनाफा वसूला जा रहा था।
जांच में सामने आए आंकड़ों ने अधिकारियों को भी हैरान कर दिया। एक दवा की खरीद कीमत केवल 86 रुपये पाई गई, जबकि उसकी MRP 4,228 रुपये दर्ज थी। इसी तरह 160 रुपये कीमत वाली एक अन्य दवा की MRP 7,110 रुपये तक रखी गई थी।
खाद्य और औषधि प्रशासन विभाग की जांच में अस्पतालों और मरीजों को सप्लाई की जा रही जीवन रक्षक दवाओं तथा मेडिकल उपकरणों की कीमतों की पड़ताल की गई। इसी दौरान खरीद कीमत और MRP के बीच बड़े अंतर का मामला सामने आया।
अधिकारियों के अनुसार इस व्यवस्था का सबसे ज्यादा असर उन मरीजों पर पड़ रहा था जिन्हें गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए महंगी दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। खास तौर पर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के उपचार में इस्तेमाल होने वाली जीवन रक्षक दवाओं में कीमतों का बड़ा अंतर सामने आने की बात कही गई है।
जांच में यह भी पाया गया कि कीमत नियंत्रण के दायरे से बाहर की कुछ दवाओं पर अत्यधिक MRP दर्ज की जा रही थी। आरोप है कि वास्तविक कीमत की तुलना में कई गुना अधिक मूल्य निर्धारित करके मरीजों से बड़ी रकम वसूली जा रही थी।
₹86 में खरीदी गई दवा की MRP ₹4,228 होने का मामला इस कथित खेल का प्रमुख उदाहरण बनकर सामने आया है। खरीद कीमत और MRP के बीच हजारों रुपये का अंतर होने से सवाल उठे हैं कि आखिर मरीज तक पहुंचते-पहुंचते दवा की कीमत इतनी अधिक कैसे हो गई।
इसी तरह ₹160 की दवा पर ₹7,110 की MRP दर्ज होने का मामला भी जांच में सामने आया। अधिकारियों ने ऐसी कीमतों के पीछे फार्मा कंपनियों की भूमिका की जांच की है। मामले में कुल 254 कंपनियों के नाम सामने आने से जांच का दायरा काफी बड़ा माना जा रहा है।
जीवन रक्षक दवाओं की जरूरत आमतौर पर मरीजों के लिए तत्काल होती है। गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीज और उनके परिजन कई बार इलाज के दौरान दवा की कीमत की तुलना करने की स्थिति में नहीं होते। ऐसे में अत्यधिक MRP का सीधा आर्थिक बोझ मरीजों और उनके परिवारों पर पड़ सकता है।
विशेष रूप से कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाएं पहले से महंगी मानी जाती हैं। जांच में आरोप है कि ऐसी दवाओं से भी बड़ी मात्रा में मुनाफा कमाया जा रहा था। वास्तविक खरीद मूल्य और मरीज से ली जाने वाली रकम के बीच भारी अंतर ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया है।
अधिकारियों के अनुसार कुछ दवाएं कीमत नियंत्रण के दायरे से बाहर थीं। कथित तौर पर इसी स्थिति का फायदा उठाकर उन पर वास्तविक कीमत की तुलना में कई गुना अधिक MRP तय की गई। कुछ मामलों में कीमत 60 से 70 गुना तक अधिक होने की बात सामने आई है।
जांच में मेडिकल उपकरणों की कीमतों पर भी ध्यान दिया गया। अस्पतालों और मरीजों को उपलब्ध कराए जाने वाले उपकरणों की खरीद कीमत और उन पर दर्ज MRP के बीच भी अंतर पाया गया। इससे मामला केवल दवाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मेडिकल उपकरण भी जांच के दायरे में आए हैं।
254 फार्मास्युटिकल कंपनियों से जुड़ा मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य क्षेत्र में दवाओं की कीमत तय करने और मरीजों से वसूली जाने वाली राशि को लेकर सवाल उठे हैं। मरीज जब किसी दवा को खरीदता है तो आमतौर पर पैकेट पर दर्ज MRP को ही उसकी निर्धारित कीमत मानता है। यदि MRP ही वास्तविक लागत से कई गुना अधिक रखी गई हो तो इसका सीधा असर मरीज की जेब पर पड़ता है।
दवाओं की खरीद कीमत और MRP में अंतर होना सामान्य व्यापारिक व्यवस्था का हिस्सा हो सकता है, लेकिन जांच में सामने आए अंतर को बेहद अधिक बताया गया है। ₹86 से ₹4,228 और ₹160 से ₹7,110 तक का अंतर इसी वजह से जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बना है।
अधिकारियों के मुताबिक मरीजों से दवाओं की कीमत पर 60 से 90 प्रतिशत तक ज्यादा मुनाफा वसूले जाने की बात सामने आई है। वहीं कुछ दवाओं में वास्तविक कीमत की तुलना में दर्ज MRP कई गुना अधिक पाई गई।
गंभीर बीमारियों के इलाज के दौरान दवाओं पर होने वाला खर्च परिवारों के लिए बड़ी आर्थिक चुनौती बन सकता है। ऐसे में जीवन रक्षक दवाओं की कीमतों में कथित तौर पर इस तरह का भारी अंतर मरीजों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल सकता है।
जांच में यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि दवाओं की वास्तविक खरीद कीमत कितनी थी, कंपनियों ने उन पर कितनी MRP निर्धारित की और अस्पतालों या मरीजों तक पहुंचने के दौरान किस स्तर पर कितना मुनाफा जोड़ा गया।
इस पूरे मामले में कीमत नियंत्रण के दायरे से बाहर रहने वाली दवाएं भी महत्वपूर्ण हैं। आरोप है कि ऐसी दवाओं पर अत्यधिक कीमत तय करके करोड़ों रुपये वसूले जा रहे थे। विशेष रूप से महंगी जीवन रक्षक दवाओं में ज्यादा मुनाफा कमाने की बात सामने आई है।
कर्नाटक खाद्य और औषधि प्रशासन विभाग की कार्रवाई के बाद फार्मा कंपनियों की मूल्य निर्धारण व्यवस्था जांच के केंद्र में आ गई है। बड़ी संख्या में कंपनियों के नाम सामने आने के कारण यह मामला व्यापक स्तर का माना जा रहा है।
फिलहाल 254 फार्मास्युटिकल कंपनियों से जुड़े इस कथित रैकेट में जांच के दौरान सामने आए कीमतों के अंतर ने मरीजों से होने वाली वसूली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ₹86 की दवा पर ₹4,228 और ₹160 की दवा पर ₹7,110 की MRP जैसे मामले इसकी गंभीरता को दिखाते हैं।
अब जांच के आधार पर यह स्पष्ट होगा कि संबंधित कंपनियों की भूमिका क्या रही और कीमतों में इतना बड़ा अंतर किस तरह बनाया गया। जीवन रक्षक दवाओं और मेडिकल उपकरणों से जुड़े इस मामले में आगे होने वाली कार्रवाई पर नजर बनी हुई है।





