
बेंगलुरु। कर्नाटक में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर विवाद सामने आया है। बुधवार को 'पीपल अगेंस्ट SIR' मंच ने राज्य सरकार से मांग की कि SIR प्रक्रिया के जरिए तैयार की गई अंतिम मतदाता सूची को खारिज किया जाए और आगामी स्थानीय निकाय चुनाव पुरानी मतदाता सूची के आधार पर ही कराए जाएं। मंच ने मतदाता सूची से पात्र नागरिकों के नाम हटाए जाने की आशंका जताते हुए चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कार्यकर्ता नूर श्रीधर ने कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी वी. अनबुकुमार के उस दावे को चुनौती दी, जिसमें उन्होंने कहा था कि किसी भी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से नहीं हटाया गया है।
मंच का कहना है कि मतदाता सूची में किसी भी तरह की त्रुटि सीधे तौर पर नागरिकों के मतदान अधिकार को प्रभावित कर सकती है। संगठन ने राज्य सरकार से इस मामले को गंभीरता से लेने और स्थानीय निकाय चुनावों में मतदाताओं की भागीदारी सुनिश्चित करने की अपील की है।
अंतिम मतदाता सूची खारिज करने की मांग
'पीपल अगेंस्ट SIR' मंच ने बुधवार को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज्य सरकार के सामने अपनी प्रमुख मांग रखी।
संगठन ने कहा कि SIR के आधार पर तैयार अंतिम मतदाता सूची को स्थानीय निकाय चुनावों के लिए स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। मंच चाहता है कि चुनाव पुरानी मतदाता सूची के आधार पर कराए जाएं।
मंच की चिंता है कि यदि संशोधित सूची में पात्र मतदाताओं के नाम छूट गए हैं, तो वे चुनाव में अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे।
हालांकि, संगठन की ओर से उठाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि मंच ने कथित रूप से हटाए गए मतदाताओं की कितनी शिकायतें या दस्तावेज सार्वजनिक किए हैं।
नूर श्रीधर ने मुख्य निर्वाचन अधिकारी के दावे को दी चुनौती
प्रेस कॉन्फ्रेंस में कार्यकर्ता नूर श्रीधर ने कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी वी. अनबुकुमार के बयान पर सवाल उठाए।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अनबुकुमार ने कहा था कि SIR प्रक्रिया के दौरान किसी भी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से नहीं हटाया गया है।
इस दावे पर प्रतिक्रिया देते हुए नूर श्रीधर ने कहा कि संगठन इसे चुनौती देता है।
उनकी आपत्ति का मुख्य आधार मतदाता सूची की विश्वसनीयता और पात्र नागरिकों के मतदान अधिकार की सुरक्षा है।
हालांकि, श्रीधर के पूरे बयान और उनके द्वारा प्रस्तुत संभावित साक्ष्यों का विवरण उपलब्ध नहीं है। इसलिए यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि किसी विशेष संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं।
अंतिम मतदाता सूची में करीब 99 लाख नाम कम
कर्नाटक में SIR प्रक्रिया पूरी होने के बाद 27 अक्टूबर को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की गई।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पुनरीक्षण से पहले राज्य में 5,54,32,314 पंजीकृत मतदाता थे। नई सूची में यह संख्या घटकर 4,55,00,011 रह गई।
इस तरह पुरानी सूची की तुलना में कुल 99,32,303 नाम कम हैं। हालांकि, इस अंतर का अर्थ यह नहीं है कि सभी नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं। चुनाव अधिकारियों के अनुसार, प्रक्रिया में मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित और दोहरी प्रविष्टियों वाले मतदाताओं की पहचान भी की गई।
मतदाता सूची में बदलाव को लेकर उठे सवाल
SIR प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटने और दस्तावेजों के सत्यापन को लेकर राजनीतिक दलों तथा नागरिक संगठनों ने आपत्तियां उठाई हैं।
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, पुनरीक्षण के दौरान लगभग 43.82 लाख मतदाताओं को सत्यापन संबंधी नोटिस जारी किए गए थे।
इसके अतिरिक्त, 22 अक्टूबर तक नाम हटाने से जुड़ी आपत्तियों के लिए 2,28,917 फॉर्म-7 आवेदन प्राप्त हुए थे।
इन आंकड़ों के सामने आने के बाद नागरिक संगठनों ने इस बात पर जोर दिया है कि किसी भी पात्र मतदाता का नाम सूची से हटने की शिकायत की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने दी सफाई
कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी वी. अनबुकुमार ने SIR प्रक्रिया में अनियमितताओं के आरोपों को खारिज किया है।
उन्होंने कहा कि केवल फॉर्म-7 के आधार पर किसी पात्र मतदाता का नाम नहीं हटाया गया। अधिकारियों के अनुसार, मतदाता का नाम हटाने से पहले निर्धारित प्रक्रिया के तहत जांच और सुनवाई आवश्यक है।
अनबुकुमार ने यह भी बताया कि जिन पात्र नागरिकों के नाम अंतिम सूची में नहीं हैं, वे फॉर्म-6 के माध्यम से नाम जोड़ने के लिए आवेदन कर सकते हैं।
निर्वाचन कार्यालय का कहना है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने और आवश्यक सुधार करने की प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी।
स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर बढ़ी चिंता
'पीपल अगेंस्ट SIR' मंच की मांग का एक महत्वपूर्ण पहलू आगामी स्थानीय निकाय चुनाव हैं।
संगठन का कहना है कि जब तक मतदाता सूची को लेकर उठाई गई शिकायतों का संतोषजनक समाधान नहीं हो जाता, तब तक नई सूची के आधार पर चुनाव नहीं कराए जाने चाहिए।
स्थानीय निकाय चुनावों में नगर निगम, नगर परिषद और अन्य स्थानीय संस्थाओं के प्रतिनिधि चुने जाते हैं। इन चुनावों का सीधा संबंध नागरिक सुविधाओं, स्वच्छता, जलापूर्ति और स्थानीय विकास से होता है।
ऐसे में पात्र मतदाताओं की भागीदारी सुनिश्चित करना चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता के लिए महत्वपूर्ण है।
हालांकि, पुरानी मतदाता सूची का उपयोग किया जा सकता है या नहीं, इसका निर्णय संबंधित चुनावी कानूनों और सक्षम प्राधिकारियों के अधिकार क्षेत्र के अनुसार होगा।
सामाजिक संगठनों ने पहले भी जताई थी आपत्ति
कर्नाटक में SIR प्रक्रिया के खिलाफ नागरिक संगठनों ने इससे पहले भी अपनी चिंताएं सामने रखी थीं।
अक्टूबर की शुरुआत में नागरिक संगठनों के एक प्रतिनिधिमंडल ने राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंपकर मतदाता सूची की त्रुटियों की जांच और कथित रूप से गलत तरीके से हटाए गए नामों की पहचान के लिए सामाजिक ऑडिट कराने की मांग की थी।
संगठनों ने कहा था कि सभी पात्र मतदाताओं का नाम सुनिश्चित होने तक संशोधित सूची का चुनावों में इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।
मतदाता सूची की पारदर्शिता पर जोर
मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण चुनावी व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य पात्र मतदाताओं के नाम दर्ज करना और अपात्र या दोहरी प्रविष्टियों की पहचान करना है।
लेकिन इस प्रक्रिया के दौरान किसी पात्र नागरिक का नाम गलती से हटना गंभीर चिंता का विषय हो सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, मतदाता सूची में बदलाव के लिए स्पष्ट सूचना, दस्तावेजों के सत्यापन, आपत्ति दर्ज कराने और अपील की प्रभावी व्यवस्था महत्वपूर्ण होती है।
कर्नाटक में इस समय विवाद का मुख्य मुद्दा यही है कि संशोधित सूची तैयार करने की प्रक्रिया में सभी पात्र मतदाताओं के अधिकार सुरक्षित रहे या नहीं।
सरकार और चुनाव अधिकारियों के अगले कदम पर नजर
'पीपल अगेंस्ट SIR' मंच की मांग के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार और संबंधित चुनाव प्राधिकारी इस मुद्दे पर क्या कदम उठाते हैं।
मंच नई मतदाता सूची को खारिज करने और स्थानीय निकाय चुनाव पुरानी सूची से कराने की मांग कर रहा है। दूसरी ओर, निर्वाचन अधिकारियों का कहना है कि पुनरीक्षण प्रक्रिया निर्धारित नियमों के अनुसार पूरी की गई है।
फिलहाल संगठन के आरोपों और निर्वाचन कार्यालय के स्पष्टीकरण के बीच मतदाता सूची की विश्वसनीयता को लेकर सवाल बने हुए हैं।
इस विवाद का समाधान संबंधित शिकायतों की जांच, पारदर्शी अपील प्रक्रिया और पात्र मतदाताओं के नाम सुनिश्चित करने से जुड़ा होगा।





