
कर्नाटक : सूखा प्रभावित क्षेत्रों के चयन को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। विधानसभा अध्यक्ष जीएस पाटिल ने राज्य सरकार द्वारा कराए गए सूखा सर्वेक्षण पर नाराजगी जताते हुए आरोप लगाया है कि उत्तरी कर्नाटक के जिलों और तालुकों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किया गया है। उन्होंने इस विषय में मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर स्थिति स्पष्ट करने और सूखा प्रभावित क्षेत्रों की सूची पर दोबारा विचार करने की मांग की है।
जीएस पाटिल गुरुवार को गदग सिटी कॉटन मार्केटिंग कोऑपरेटिव सोसाइटी के परिसर में नगर परिषद द्वारा आयोजित सम्मान समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने सूखा सर्वेक्षण में उत्तरी कर्नाटक के कई क्षेत्रों को शामिल नहीं किए जाने पर खुलकर अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि राज्य के सभी क्षेत्रों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए और सूखा घोषित करने का निर्णय वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर लिया जाना चाहिए।
राज्य सरकार ने विभिन्न जिलों में सूखे की स्थिति का आकलन करने के लिए सर्वे कराया है। इस सर्वेक्षण के आधार पर दक्षिणी कर्नाटक के कई जिलों के अनेक तालुकों को सूखा प्रभावित घोषित किया गया है। दूसरी ओर उत्तरी कर्नाटक के ऐसे कई तालुकों को सूची से बाहर रखा गया है जहां पानी की कमी और कृषि संकट जैसी समस्याएं सामने आने की बात कही जा रही है।
पाटिल ने सवाल किया कि आखिर उत्तरी कर्नाटक के तालुकों को सूखा प्रभावित सूची में शामिल क्यों नहीं किया गया। उन्होंने कहा कि इस असमानता से क्षेत्र के किसानों और आम लोगों में असंतोष पैदा होना स्वाभाविक है। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि सूखे की स्थिति निर्धारित करने के लिए कौन-से मानदंड अपनाए गए और अलग-अलग क्षेत्रों का आकलन किस आधार पर किया गया।
विधानसभा अध्यक्ष ने बताया कि उन्होंने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर पूछा है कि क्या उत्तरी और दक्षिणी कर्नाटक के बीच भेदभाव किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि राज्य के किसी भी हिस्से को राजनीतिक या प्रशासनिक कारणों से विकास और राहत योजनाओं से वंचित नहीं रखा जाना चाहिए। सूखे से प्रभावित किसानों को समय पर सहायता मिलना जरूरी है।
जीएस पाटिल ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष होने का अर्थ यह नहीं है कि वह क्षेत्र के साथ होने वाले अन्याय पर चुप रहें। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब भी उनके क्षेत्र या लोगों के साथ अन्याय होगा वह उसका विरोध करेंगे। उन्होंने कहा कि यदि कोई गलती दिखाई देती है तो वह उसका विरोध करने वाले पहले व्यक्ति होंगे।
उन्होंने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष के रूप में उनकी जिम्मेदारी बिना किसी भेदभाव के काम करने की है। संवैधानिक पद पर रहते हुए उन्हें सदन के सभी सदस्यों और सभी क्षेत्रों के प्रति निष्पक्ष रहना होता है। इसके बावजूद जनहित से जुड़े मुद्दों को उठाना भी उनकी जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि निष्पक्षता का मतलब समस्याओं पर मौन रहना नहीं हो सकता।
पाटिल के इस बयान से राज्य की कांग्रेस सरकार के भीतर सूखा सर्वेक्षण को लेकर असहमति खुलकर सामने आ गई है। विधानसभा अध्यक्ष द्वारा सरकार के फैसले पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया जाना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनके बयान ने उत्तरी कर्नाटक के तालुकों को सूखा प्रभावित सूची में शामिल करने की मांग को और मजबूती प्रदान की है।
उत्तरी कर्नाटक के कई क्षेत्र खेती और वर्षा पर अत्यधिक निर्भर हैं। पर्याप्त बारिश नहीं होने पर यहां किसानों को फसल नुकसान, पशुओं के लिए चारे की कमी और पेयजल संकट जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यदि किसी क्षेत्र को आधिकारिक रूप से सूखा प्रभावित घोषित किया जाता है तो वहां राहत और सहायता से संबंधित सरकारी कदम उठाए जाने का रास्ता साफ होता है।
किसी तालुक को सूखा प्रभावित सूची में शामिल नहीं किए जाने से स्थानीय किसानों को राहत योजनाओं का लाभ मिलने में कठिनाई हो सकती है। यही वजह है कि सूखा सर्वेक्षण और उसके आधार पर तैयार सूची को लेकर किसानों और जनप्रतिनिधियों की चिंता बढ़ जाती है। पाटिल ने इसी मुद्दे को उठाते हुए सरकार से निष्पक्ष समीक्षा की मांग की है।
सूखा प्रभावित क्षेत्र घोषित करने से पहले वर्षा की स्थिति, फसल नुकसान, मिट्टी में नमी, जलाशयों और भूजल की उपलब्धता जैसे विभिन्न मानकों का परीक्षण किया जाता है। पाटिल के सवालों के बाद अब यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि उत्तरी कर्नाटक के बाहर रखे गए तालुक इन मानकों पर किस स्थिति में थे और सर्वेक्षण टीमों ने अपनी रिपोर्ट में क्या निष्कर्ष दर्ज किए।
विधानसभा अध्यक्ष ने सरकार के निर्णय पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि क्षेत्रीय असमानता की भावना पैदा करने वाले फैसलों से बचना चाहिए। उत्तरी कर्नाटक में पहले से ही विकास और संसाधनों के वितरण को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं। सूखा प्रभावित सूची से कई तालुकों को बाहर रखे जाने से यह बहस दोबारा तेज हो गई है।
उनका कहना है कि सरकार को दोनों क्षेत्रों को अलग-अलग नजरिए से देखने के बजाय पूरे राज्य के लिए समान नीति अपनानी चाहिए। जहां वास्तविक रूप से सूखे की स्थिति है वहां राहत उपाय शुरू किए जाने चाहिए। सर्वेक्षण में किसी तरह की कमी या गलती हुई है तो उसे संशोधित करके पात्र तालुकों को सूची में शामिल किया जाना चाहिए।
इस मामले में मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र के जवाब का इंतजार किया जा रहा है। मुख्यमंत्री कार्यालय या संबंधित विभाग की ओर से स्थिति स्पष्ट किए जाने के बाद पता चलेगा कि सरकार सूची की समीक्षा करेगी या वर्तमान निर्णय को बरकरार रखेगी। यदि दोबारा सर्वेक्षण होता है तो उत्तरी कर्नाटक के बाहर रखे गए तालुकों की स्थिति का नए सिरे से आकलन किया जा सकता है।
जीएस पाटिल का बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने अपने संवैधानिक पद और जनप्रतिनिधि की भूमिका के बीच संतुलन की बात कही है। उन्होंने साफ किया कि विधानसभा अध्यक्ष के रूप में वह निष्पक्ष रहेंगे लेकिन अन्याय दिखाई देने पर अपनी आवाज भी उठाएंगे। उनके मुताबिक जनहित के सवाल पर चुप रहना उचित नहीं है।
अब इस मुद्दे पर उत्तरी कर्नाटक के अन्य जनप्रतिनिधियों और किसान संगठनों की प्रतिक्रिया भी सामने आ सकती है। यदि प्रभावित तालुकों को सूची में शामिल करने की मांग तेज होती है तो राज्य सरकार पर सर्वेक्षण रिपोर्ट की समीक्षा का दबाव बढ़ेगा। फिलहाल विधानसभा अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग कर सूखा सर्वेक्षण की निष्पक्षता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।





