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कर्नाटक में बढ़ा सुपारी की खेती का रकबा, लेकिन उत्पादकता में 37% की गिरावट

Kavita2
6 Aug 2026 12:38 PM IST
कर्नाटक में बढ़ा सुपारी की खेती का रकबा, लेकिन उत्पादकता में 37% की गिरावट
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नई दिल्ली/बेंगलुरु: कर्नाटक में सुपारी की खेती का क्षेत्रफल पिछले पांच वर्षों में तेजी से बढ़ा है, लेकिन इसके साथ ही उत्पादन क्षमता में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। लोकसभा में केंद्र सरकार की ओर से पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, राज्य में सुपारी की खेती का रकबा करीब 32 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि औसत उत्पादकता लगभग 37 प्रतिशत कम हो गई है।

शिवमोग्गा के सांसद बी.वाई. राघवेंद्र द्वारा पूछे गए सवाल के लिखित जवाब में कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने यह जानकारी दी। आंकड़ों के मुताबिक, कर्नाटक में वर्ष 2021-22 में जहां 6,03,121 हेक्टेयर क्षेत्र में सुपारी की खेती की गई थी, वहीं 2025-26 के दूसरे अग्रिम अनुमान तक यह क्षेत्र बढ़कर 7,98,677 हेक्टेयर हो गया है।

इस तरह पांच वर्षों के भीतर सुपारी की खेती के क्षेत्रफल में लगभग 1.95 लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी हुई है। प्रतिशत के हिसाब से देखें तो यह वृद्धि करीब 32 प्रतिशत है। इससे पता चलता है कि किसानों के बीच सुपारी की खेती को लेकर रुचि बढ़ी है और अधिक किसान इस फसल की ओर आकर्षित हुए हैं।

हालांकि, खेती का क्षेत्र बढ़ने के बावजूद उत्पादन क्षमता में गिरावट चिंता का विषय बन गई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2021-22 में सुपारी की औसत उत्पादकता 2.24 टन प्रति हेक्टेयर थी, जो 2025-26 तक घटकर 1.42 टन प्रति हेक्टेयर रह गई। यानी प्रति हेक्टेयर उत्पादन में करीब 37 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, उत्पादकता में गिरावट के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इनमें मौसम में बदलाव, अनियमित बारिश, जल संकट, मिट्टी की गुणवत्ता में बदलाव, रोगों का बढ़ता प्रकोप और खेती के तरीकों में बदलाव जैसे कारण शामिल हैं। सुपारी एक लंबी अवधि वाली फसल है और इसके पौधों को उचित देखभाल, पर्याप्त पानी और संतुलित पोषण की आवश्यकता होती है।

कर्नाटक देश में सुपारी उत्पादन के प्रमुख राज्यों में शामिल है। राज्य के शिवमोग्गा, दक्षिण कन्नड़, उत्तर कन्नड़, चिक्कमगलुरु और अन्य क्षेत्रों में बड़ी संख्या में किसान सुपारी की खेती पर निर्भर हैं। यह फसल कई किसानों की आय का प्रमुख स्रोत मानी जाती है।

हाल के वर्षों में सुपारी की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद किसानों ने इसकी खेती का विस्तार किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि बाजार में मांग और पारंपरिक अनुभव के कारण किसान इस फसल को प्राथमिकता दे रहे हैं। हालांकि, कम होती उत्पादकता से किसानों की लागत बढ़ सकती है और आय पर असर पड़ सकता है।

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल खेती का क्षेत्र बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ाना भी जरूरी है। इसके लिए बेहतर किस्म के पौधों का उपयोग, वैज्ञानिक खेती तकनीक, रोग नियंत्रण और जल प्रबंधन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

सरकार की ओर से किसानों को आधुनिक कृषि तकनीक अपनाने, फसल प्रबंधन सुधारने और वैज्ञानिक सलाह उपलब्ध कराने पर जोर दिया जा रहा है। कृषि विभाग और शोध संस्थानों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है, ताकि किसानों को सुपारी की खेती में आने वाली समस्याओं के समाधान मिल सकें।

जलवायु परिवर्तन भी सुपारी किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। तापमान में बदलाव और बारिश के पैटर्न में असमानता का असर इस फसल पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में जलवायु अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपनाना जरूरी होगा।

कर्नाटक में सुपारी की खेती का बढ़ता रकबा यह दिखाता है कि किसानों का भरोसा इस फसल पर बना हुआ है, लेकिन उत्पादकता में गिरावट भविष्य के लिए चिंता का संकेत है। यदि समय रहते वैज्ञानिक उपाय नहीं किए गए, तो बढ़ते क्षेत्रफल के बावजूद किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाएगा।

कुल मिलाकर, कर्नाटक में सुपारी की खेती एक ओर विस्तार के दौर से गुजर रही है, वहीं दूसरी ओर कम होती उत्पादकता कृषि क्षेत्र के सामने नई चुनौती पेश कर रही है। अब जरूरत है कि खेती के विस्तार के साथ-साथ उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए प्रभावी रणनीति तैयार की जाए, ताकि किसानों की आय और फसल की स्थिरता दोनों सुनिश्चित हो सकें।

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