
बेंगलुरु/कर्नाटक: कावेरी जल विनियमन समिति (CWRC) की ओर से तमिलनाडु के लिए रोजाना 3,500 क्यूसेक पानी छोड़ने के निर्देश के बाद कर्नाटक में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। राज्य के कई हिस्सों में संगठनों और किसानों ने इस फैसले के खिलाफ आवाज उठाई है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि राज्य के प्रमुख जलाशयों में पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं है, ऐसे में तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ना किसानों के हितों के खिलाफ है।
इसी बीच राज्य के प्रमुख जलाशयों में पानी की मौजूदा स्थिति को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। जलाशयों में पानी की आवक, भंडारण क्षमता और जल स्तर पर प्रशासन लगातार नजर बनाए हुए है।
काबिनी जलाशय 87 प्रतिशत भरा
कर्नाटक के एच. डी. कोटे तालुक में कपिला नदी पर बने काबिनी जलाशय में पानी का स्तर तेजी से बढ़ रहा है। वर्तमान में जलाशय करीब 87 प्रतिशत भर चुका है और जल्द ही इसके पूरी क्षमता तक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, काबिनी जलाशय में पानी की भारी आवक हो रही है। लगातार बारिश और नदी में बढ़े प्रवाह के कारण जलाशय का जलस्तर ऊपर जा रहा है।
अधिकारियों के मुताबिक, फिलहाल जलाशय से नदी में सीमित मात्रा में पानी छोड़ा जा रहा है। हालांकि, अगर जलाशय पूरी क्षमता तक भर जाता है तो अतिरिक्त पानी छोड़ना आवश्यक हो सकता है।
कावेरी जल छोड़ने पर बढ़ा विवाद
CWRC के आदेश के बाद कर्नाटक में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर विरोध शुरू हो गया है। कई संगठनों ने आरोप लगाया है कि राज्य के किसानों की जरूरतों को नजरअंदाज करते हुए तमिलनाडु को पानी देने का फैसला लिया गया है।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि कृष्णराज सागर (KRS) जैसे महत्वपूर्ण जलाशय में पर्याप्त पानी नहीं है, इसलिए पहले राज्य की जरूरतों को पूरा किया जाना चाहिए।
इसी मुद्दे को लेकर राज्य के कुछ हिस्सों में बंद का आह्वान भी किया गया है। प्रदर्शनकारियों ने सरकार से मांग की है कि वह जल उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए ही पानी छोड़ने का फैसला करे।
अल्मट्टी जलाशय भी भरने की कगार पर
कावेरी बेसिन के अलावा राज्य के अन्य प्रमुख जलाशयों की स्थिति पर भी नजर रखी जा रही है। अल्मट्टी जलाशय के भी जल्द भरने की संभावना जताई जा रही है।
जलाशयों में बढ़ते जल स्तर को देखते हुए अधिकारियों के सामने जल प्रबंधन एक महत्वपूर्ण चुनौती बन गया है। एक ओर जहां भारी बारिश के कारण कई जलाशय भर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पानी के वितरण को लेकर राज्यों के बीच विवाद जारी है।
जल प्रबंधन बना बड़ी चुनौती
कर्नाटक में इस समय जल प्रबंधन को लेकर दोहरी स्थिति बनी हुई है। कुछ जलाशयों में पानी की आवक अच्छी है, जबकि कुछ क्षेत्रों में जल उपलब्धता को लेकर चिंता बनी हुई है।
अधिकारियों का कहना है कि जलाशयों की स्थिति, बारिश की मात्रा और किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ही पानी छोड़ने के फैसले लिए जाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराज्यीय नदियों से जुड़े मामलों में केवल वर्तमान जल स्तर ही नहीं, बल्कि आने वाले महीनों की जरूरतों और मौसम की स्थिति को भी ध्यान में रखना जरूरी होता है।
किसानों की नजर सरकार के फैसले पर
कावेरी जल विवाद का सबसे ज्यादा असर किसानों पर पड़ता है। कर्नाटक और तमिलनाडु दोनों राज्यों के किसान सिंचाई के लिए कावेरी नदी पर निर्भर हैं।
कर्नाटक के किसान संगठनों का कहना है कि अगर जलाशयों में पानी की स्थिति कमजोर रहती है तो फसलों पर असर पड़ सकता है। वहीं, तमिलनाडु में भी किसान अपने हिस्से के पानी की मांग करते रहे हैं।
फिलहाल राज्य सरकार और जल संसाधन विभाग जलाशयों की स्थिति की निगरानी कर रहे हैं। आने वाले दिनों में बारिश और जल आवक के आधार पर पानी छोड़ने और जल प्रबंधन से जुड़े फैसले लिए जाएंगे।
काबिनी जैसे जलाशयों में बढ़ता जल स्तर राहत की खबर जरूर है, लेकिन कावेरी जल बंटवारे को लेकर राजनीतिक और सामाजिक तनाव अभी भी जारी है।





