
शिवमोग्गा। कर्नाटक के सक्रेबैलु एलिफेंट कैंप में 32 वर्षीय नर हाथी शौर्य की बीमारी के कारण मौत हो गई। शौर्य को इसी साल फरवरी में चिकमगलूर जिले के बालेहोनूर क्षेत्र से पकड़ा गया था। उस समय उस पर स्थानीय लोगों को परेशान करने और आबादी वाले इलाकों में बार-बार आने के आरोप लगे थे। इसके बाद वन विभाग की टीम ने उसे पकड़कर सक्रेबैलु एलिफेंट कैंप भेज दिया था।
कैंप में लाए जाने के बाद शौर्य को एक सुरक्षित बाड़े में रखा गया था। यहां उसे धीरे-धीरे पालतू बनाने और मानव उपस्थिति के अनुकूल करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी। वन विभाग के कर्मचारी और महावत लगातार उसकी गतिविधियों पर नजर रख रहे थे। अधिकारियों का उद्देश्य था कि आक्रामक व्यवहार कम होने के बाद हाथी को नियंत्रित तरीके से कैंप की नियमित व्यवस्था का हिस्सा बनाया जा सके।
हालांकि पालतू बनाने की प्रक्रिया के दौरान शौर्य की तबीयत बिगड़ने लगी। उसके व्यवहार और स्वास्थ्य में बदलाव देखने के बाद कैंप के डॉक्टरों ने जांच शुरू की। सक्रेबैलु कैंप के डॉक्टर डॉ. मुरली उसकी देखभाल और इलाज कर रहे थे। उपचार के दौरान हाथी को दवाएं दी गईं और उसकी स्थिति पर लगातार निगरानी रखी गई।
बताया जा रहा है कि डॉक्टरों की कोशिशों के बावजूद शौर्य की सेहत में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। बीमारी बढ़ती गई और गुरुवार को उसकी मौत हो गई। हाथी की मौत के बाद कैंप के कर्मचारियों और वन विभाग के अधिकारियों में मायूसी का माहौल है।
शौर्य को बालेहोनूर इलाके में लंबे समय से परेशानी का कारण माना जा रहा था। स्थानीय लोगों की शिकायत थी कि हाथी आबादी और खेतों के आसपास पहुंच जाता था, जिससे डर का माहौल बनता था। वन्यजीव विभाग की टीम ने स्थिति को देखते हुए उसे पकड़ने का फैसला किया था।
फरवरी में चलाए गए अभियान के दौरान शौर्य को सुरक्षित तरीके से पकड़ा गया और बाद में सक्रेबैलु कैंप भेज दिया गया। हाथी को पकड़ने के बाद शुरुआती दिनों में विशेष निगरानी में रखा गया था। बड़े और जंगली नर हाथियों को नई जगह के अनुकूल बनाना आसान नहीं होता, इसलिए इसके लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों और महावतों की मदद ली जाती है।
सक्रेबैलु एलिफेंट कैंप हाथियों के संरक्षण, प्रशिक्षण और देखभाल के लिए जाना जाता है। यहां ऐसे हाथियों को भी रखा जाता है, जिन्हें मानव बस्तियों में लगातार संघर्ष की घटनाओं के बाद जंगल से पकड़कर लाया जाता है। कैंप में उनके स्वास्थ्य, भोजन और व्यवहार की नियमित निगरानी की जाती है।
शौर्य को भी इसी प्रक्रिया के तहत यहां रखा गया था। पालतू बनाने की शुरुआत में हाथी को सीमित क्षेत्र में रखा जाता है ताकि वह महावतों की आवाज और संकेतों को पहचान सके। धीरे-धीरे उसके व्यवहार के आधार पर प्रशिक्षण आगे बढ़ाया जाता है।
इसी दौरान शौर्य के बीमार पड़ने से पूरी प्रक्रिया रोकनी पड़ी। डॉक्टरों का फोकस उसके स्वास्थ्य को सुधारने पर था। उसके भोजन, पानी और शारीरिक गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी। बीमारी के कारण वह धीरे-धीरे कमजोर होता गया।
वन विभाग के लिए जंगली हाथियों को पकड़कर कैंप में लाने के बाद उनकी देखभाल एक बड़ी जिम्मेदारी होती है। लंबे समय तक जंगल में स्वतंत्र रूप से रहने वाले हाथियों को अचानक नियंत्रित वातावरण में रहने के लिए समय लगता है। इस दौरान तनाव, भोजन में बदलाव और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
शौर्य की मौत के बाद अब यह पता लगाने की कोशिश की जा सकती है कि उसकी बीमारी की वास्तविक वजह क्या थी। आमतौर पर ऐसी स्थिति में पशु चिकित्सकीय जांच और पोस्टमार्टम के जरिए मौत के कारणों की पुष्टि की जाती है। इससे यह भी समझने में मदद मिलती है कि बीमारी पहले से थी या कैंप में आने के बाद विकसित हुई।
हाथी की मौत के बाद उसकी देखभाल से जुड़े रिकॉर्ड भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इसमें उसे दिए गए भोजन, दवाओं, इलाज और स्वास्थ्य में आए बदलावों का विवरण शामिल होता है। ये रिकॉर्ड भविष्य में दूसरे हाथियों की देखभाल के लिए भी उपयोगी साबित हो सकते हैं।
शौर्य की उम्र 32 वर्ष बताई गई है। इस उम्र में नर हाथी पूरी तरह वयस्क होता है और सामान्य तौर पर शारीरिक रूप से काफी मजबूत रहता है। ऐसे में बीमारी के कारण उसकी मौत ने वन्यजीव विभाग और कैंप प्रबंधन को भी चिंता में डाला है।
स्थानीय स्तर पर भी हाथी की मौत की खबर चर्चा में है। बालेहोनूर के लोग उसे लंबे समय से पहचानते थे, क्योंकि वह कई बार आबादी वाले क्षेत्रों के करीब देखा गया था। उसे पकड़ने के बाद इलाके में कुछ राहत महसूस की गई थी, लेकिन अब उसकी मौत की सूचना सामने आई है।
फिलहाल सक्रेबैलु एलिफेंट कैंप में शौर्य की मौत को लेकर वन विभाग आगे की प्रक्रिया पूरी कर रहा है। डॉक्टरों की ओर से इलाज किए जाने के बावजूद उसकी जान नहीं बचाई जा सकी। फरवरी में बालेहोनूर से पकड़े गए इस हाथी का कैंप में सफर कुछ ही महीनों में समाप्त हो गया।





