कर्नाटक

कर्नाटक की विस्तारित कैबिनेट में 23 जिलों को जगह, 8 जिलों को नहीं मिला प्रतिनिधित्व

Kavita2
4 Aug 2026 12:29 PM IST
कर्नाटक की विस्तारित कैबिनेट में 23 जिलों को जगह, 8 जिलों को नहीं मिला प्रतिनिधित्व
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बेंगलुरु। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के नेतृत्व वाली कर्नाटक की विस्तारित कैबिनेट में राज्य के 31 जिलों में से 23 जिलों को प्रतिनिधित्व मिला है, जबकि आठ जिले इस बार मंत्रिमंडल से बाहर रह गए हैं। नई कैबिनेट संरचना में क्षेत्रीय संतुलन बनाने की कोशिश की गई है, हालांकि कुछ जिलों को जगह नहीं मिलने से राजनीतिक चर्चा भी शुरू हो गई है।

कैबिनेट विस्तार के बाद सामने आए आंकड़ों के अनुसार, राजधानी बेंगलुरु अर्बन जिले को सबसे अधिक प्रतिनिधित्व मिला है। जिले से छह विधायकों को मंत्री पद दिया गया है। इसके बाद कलबुर्गी जिले को तीन मंत्री पद मिले हैं। वहीं बेलगाम, कोप्पल, मांड्या और रामनगर जिलों को मंत्रिमंडल में दो-दो स्थान मिले हैं।

राज्य के अन्य जिलों को भी कैबिनेट में प्रतिनिधित्व दिया गया है। बागलकोट, हासन, बेल्लारी, बीदर, बेंगलुरु रूरल, चामराजनगर, चिकमगलूर, चित्रदुर्ग, दक्षिण कन्नड़, दावणगेरे, धारवाड़, हावेरी, मैसूर, शिवमोग्गा, तुमकुरु, उत्तर कन्नड़ और विजयपुरा जिलों से एक-एक मंत्री को शामिल किया गया है।

हालांकि, आठ जिलों को इस बार कैबिनेट में कोई स्थान नहीं मिला है। इनमें यादगीर, रायचूर, गदग, विजयनगर, कोडगु, कोलार, उडुपी और चिक्काबल्लापुर जिले शामिल हैं। इन जिलों के नेताओं को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलने को लेकर स्थानीय स्तर पर प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

राजनीतिक जानकारों के अनुसार, किसी भी राज्य मंत्रिमंडल के गठन में क्षेत्रीय समीकरण, जातीय संतुलन, राजनीतिक प्रभाव और आगामी चुनावों को ध्यान में रखा जाता है। कर्नाटक जैसे बड़े राज्य में सभी जिलों को समान प्रतिनिधित्व देना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है।

बेंगलुरु अर्बन को सबसे अधिक मंत्री पद मिलना राजधानी के राजनीतिक और प्रशासनिक महत्व को दर्शाता है। बेंगलुरु राज्य का सबसे बड़ा शहरी क्षेत्र होने के साथ-साथ आर्थिक केंद्र भी है। यहां से बड़ी संख्या में विधायक चुनाव जीतते हैं और राज्य की राजनीति में इस जिले की अहम भूमिका रहती है।

वहीं कलबुर्गी जिले को तीन मंत्री पद मिलना भी क्षेत्रीय दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उत्तरी कर्नाटक के इस क्षेत्र में राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है। मंत्रिमंडल में इस जिले की मजबूत मौजूदगी को क्षेत्रीय संतुलन की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

बेलगाम, कोप्पल, मांड्या और रामनगर जैसे जिलों को दो-दो मंत्री पद मिलने से इन क्षेत्रों का भी राजनीतिक महत्व बढ़ा है। इन जिलों का राज्य की राजनीति में अपना प्रभाव रहा है और यहां के नेताओं को कैबिनेट में जगह मिलने से स्थानीय कार्यकर्ताओं में उत्साह है।

हालांकि, जिन जिलों को प्रतिनिधित्व नहीं मिला है, वहां से सवाल भी उठ रहे हैं। स्थानीय नेताओं और समर्थकों का कहना है कि सभी क्षेत्रों को विकास और प्रशासनिक निर्णयों में भागीदारी मिलनी चाहिए। खासतौर पर पिछड़े या सीमावर्ती क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व को लेकर मांगें सामने आती रही हैं।

मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार और उनकी सरकार के सामने अब मंत्रियों के बीच जिम्मेदारियों का बंटवारा और प्रशासनिक कामकाज को गति देना बड़ी चुनौती होगी। नई कैबिनेट से उम्मीद की जा रही है कि वह राज्य के सभी क्षेत्रों के विकास पर ध्यान देगी, चाहे वहां से मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व मिला हो या नहीं।

सरकार की प्राथमिकताओं में विकास योजनाओं को आगे बढ़ाना, बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करना और क्षेत्रीय असंतुलन को कम करना शामिल है। ऐसे में जिन जिलों को कैबिनेट में स्थान नहीं मिला है, वहां के लिए सरकार की नीतियां और फैसले महत्वपूर्ण साबित होंगे।

कर्नाटक की राजनीति में जिला स्तर का प्रतिनिधित्व हमेशा अहम मुद्दा रहा है। मंत्रिमंडल में शामिल जिलों का संतुलन सरकार की राजनीतिक रणनीति को भी दर्शाता है। अब यह देखना होगा कि नई कैबिनेट राज्य के विभिन्न क्षेत्रों की अपेक्षाओं पर कितना खरा उतरती है।

फिलहाल, विस्तारित कैबिनेट की तस्वीर में बेंगलुरु अर्बन और कलबुर्गी जैसे जिलों का प्रभाव सबसे अधिक दिखाई दे रहा है, जबकि आठ जिलों का बाहर रहना आने वाले दिनों में राजनीतिक चर्चा का विषय बना रह सकता है।

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