कर्नाटक

11 राज्य, 6900 किलोमीटर और 25 साल पुरानी कार, तीन दोस्तों का गजब कारनामा

Kavita2
4 Nov 2026 12:11 PM IST
11 राज्य, 6900 किलोमीटर और 25 साल पुरानी कार, तीन दोस्तों का गजब कारनामा
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मंगलुरु। अगर इरादे मजबूत हों और खुद पर भरोसा हो, तो मुश्किल से मुश्किल मंजिल को भी हासिल किया जा सकता है। कर्नाटक के मंगलुरु के तीन दोस्तों ने इसे सच साबित कर दिखाया है। जिस लद्दाख की खतरनाक पहाड़ी सड़कों पर सफर करने के लिए लोग आधुनिक और महंगी एसयूवी गाड़ियों का सहारा लेते हैं, वहां इन तीन दोस्तों ने 25 साल पुरानी मारुति 800 कार से पहुंचकर सभी को हैरान कर दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने करीब 6,900 किलोमीटर की लंबी यात्रा पूरी करते हुए पर्यावरण संरक्षण का महत्वपूर्ण संदेश भी दिया।

मंगलुरु के रहने वाले हरीश भट, कृष्ण प्रसाद भट और राकेश बोलार ने 19 अक्टूबर 2026 को अपनी रोमांचक यात्रा की शुरुआत की थी। तीनों दोस्तों ने वर्ष 2001 मॉडल की मारुति 800 कार को इस साहसिक अभियान के लिए चुना। उनका उद्देश्य सिर्फ लद्दाख की ऊंची पहाड़ियों तक पहुंचना नहीं था, बल्कि लोगों को जंगलों, वन्यजीवों और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए जागरूक करना भी था।

तीनों दोस्त 'वन बचाओ' का संदेश लेकर मंगलुरु से रवाना हुए। लगभग 15 दिनों की यात्रा के दौरान उन्होंने 11 राज्यों से गुजरते हुए करीब 6,900 किलोमीटर की दूरी तय की। आखिरकार 2 नवंबर को तीनों सुरक्षित मंगलुरु लौट आए।

इस यात्रा की सबसे खास बात उनकी कार थी। आमतौर पर हिमालय की ऊंची और दुर्गम सड़कों पर सफर करने के लिए अधिक शक्तिशाली इंजन और आधुनिक सुरक्षा सुविधाओं वाली गाड़ियों को प्राथमिकता दी जाती है। लेकिन इन तीनों ने पुरानी मारुति 800 पर भरोसा जताया।

उनकी कार में न तो एयर कंडीशनर था और न ही जीपीएस जैसी आधुनिक नेविगेशन सुविधा। इसके बावजूद उन्होंने कठिन पहाड़ी रास्तों पर आगे बढ़ने का फैसला किया। कार की सीमित इंजन क्षमता और चुनौतीपूर्ण मौसम ने सफर को और मुश्किल बना दिया।

यात्रा के अनुभव साझा करते हुए राकेश बोलार ने बताया कि वर्ष 2001 मॉडल की मारुति 800 से लद्दाख तक पहुंचना अपने आप में बड़ी चुनौती थी। उन्होंने कहा कि कार में आधुनिक सुविधाओं की कमी थी और पहाड़ी रास्तों पर वाहन की सीमित शक्ति के कारण सावधानी बरतनी पड़ती थी।

राकेश के मुताबिक, यात्रा के दौरान उन्हें माइनस 14 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान का सामना करना पड़ा। इतनी भीषण ठंड में वाहन चलाना आसान नहीं था। खासकर ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मौसम और सड़क की स्थिति लगातार चुनौती पैदा कर रही थी।

तीनों दोस्तों ने अक्टूबर के आखिर में इस यात्रा को अंजाम दिया, जब लद्दाख के कई इलाकों में ठंड काफी बढ़ने लगती है। ऊंचे पर्वतीय रास्तों पर बर्फ जमने और तापमान गिरने से वाहन चलाना जोखिम भरा हो सकता है।

यात्रा के दौरान उन्हें 'ब्लैक आइस' जैसी खतरनाक परिस्थिति का भी सामना करना पड़ा। ब्लैक आइस सड़क पर जमी बर्फ की बेहद पतली और कई बार लगभग अदृश्य परत होती है। इसके कारण सड़क अत्यधिक फिसलन भरी हो जाती है और वाहन के नियंत्रण से बाहर होने का खतरा बढ़ जाता है।

ऐसे रास्तों पर वाहन की गति और नियंत्रण बनाए रखना बेहद जरूरी होता है। तीनों दोस्तों ने सावधानी और धैर्य के साथ इन मुश्किल परिस्थितियों का सामना किया।

यात्रा के दौरान एक बड़ी उपलब्धि उस समय हासिल हुई, जब तीनों अपनी पुरानी मारुति 800 से लद्दाख के प्रसिद्ध खारदुंग ला दर्रे तक पहुंच गए। यह दर्रा अपनी ऊंचाई और कठिन पर्वतीय रास्तों के कारण दुनियाभर के पर्यटकों तथा साहसिक यात्रियों के बीच प्रसिद्ध है।

हरीश भट ने बताया कि उन्होंने इस यात्रा के लिए कार में कोई विशेष बदलाव नहीं कराया था। हालांकि, रास्ते में संभावित तकनीकी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए कुछ अतिरिक्त पुर्जे साथ रखे गए थे।

ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ऑक्सीजन की कमी की आशंका को देखते हुए तीनों ने एहतियात के तौर पर एक ऑक्सीजन सिलेंडर भी साथ रखा था। यह तैयारी इसलिए महत्वपूर्ण थी, क्योंकि अधिक ऊंचाई पर पहुंचने से कुछ लोगों को सांस लेने में परेशानी और ऊंचाई से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं।

यात्रा की चुनौतियों के बावजूद तीनों दोस्तों का उत्साह कम नहीं हुआ। उन्होंने रास्ते में आने वाले विभिन्न स्थानों की प्राकृतिक सुंदरता का आनंद लिया और स्थानीय लोगों से मुलाकात की।

राकेश बोलार ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि सड़क मार्ग से यात्रा करने पर देश की विविधता को करीब से देखने का अवसर मिलता है। अलग-अलग राज्यों, गांवों, भाषाओं और संस्कृतियों से परिचित होने का अनुभव इस यात्रा को खास बनाता है।

उन्होंने कहा कि रास्ते में मिलने वाले लोगों का अपनापन भी इस सफर की यादगार बातों में शामिल रहा। तीनों दोस्तों को विभिन्न स्थानों पर स्थानीय समुदायों के साथ बातचीत करने का अवसर मिला।

हालांकि, उनकी इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना था। 'वन बचाओ' अभियान के जरिए उन्होंने लोगों को स्वच्छ हवा, स्वच्छ पानी, वन्यजीव संरक्षण और हरियाली बनाए रखने का महत्व समझाने का प्रयास किया।

यात्रा के दौरान तीनों ने स्थानीय लोगों से पर्यावरण संरक्षण और प्लास्टिक के उपयोग को कम करने जैसे विषयों पर बातचीत की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि प्राकृतिक संसाधनों को बचाना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है।

उनका मानना है कि जंगल केवल पेड़-पौधों का समूह नहीं हैं, बल्कि वे वन्यजीवों के आवास, जल संरक्षण और पर्यावरण संतुलन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। जंगलों के संरक्षण से आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ पर्यावरण उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।

आज जब पर्यावरण प्रदूषण, प्लास्टिक कचरा और जंगलों की कटाई जैसी समस्याएं लगातार चिंता बढ़ा रही हैं, तब इस तरह की जागरूकता यात्राएं लोगों को प्रकृति के प्रति जिम्मेदार बनने का संदेश देती हैं।

इस साहसिक सफर ने यह भी दिखाया कि किसी चुनौतीपूर्ण लक्ष्य को पूरा करने के लिए केवल महंगे संसाधन ही जरूरी नहीं होते। सही तैयारी, धैर्य, सावधानी और मजबूत संकल्प भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

हालांकि, हिमालय जैसे कठिन पर्वतीय क्षेत्रों में पुराने या सीमित क्षमता वाले वाहनों से यात्रा करना जोखिम भरा हो सकता है। इसलिए ऐसे अभियानों से प्रेरणा लेने वालों के लिए वाहन की तकनीकी स्थिति, मौसम, सड़क संबंधी जानकारी और आवश्यक सुरक्षा इंतजाम सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है।

मंगलुरु के इन तीन दोस्तों ने 2 नवंबर को अपनी यात्रा सफलतापूर्वक समाप्त की। करीब 6,900 किलोमीटर का सफर पूरा करने के बाद उनकी उपलब्धि चर्चा का विषय बन गई है।

हरीश भट, कृष्ण प्रसाद भट और राकेश बोलार की कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के कारण अपने सपनों को पूरा करने से हिचकिचाते हैं। तीनों ने अपनी 25 साल पुरानी मारुति 800 से लद्दाख पहुंचकर साबित किया कि मजबूत इच्छाशक्ति, तैयारी और साहस के साथ असाधारण लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं।

उनकी यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल लद्दाख के दुर्गम रास्तों तक पहुंचना नहीं, बल्कि हजारों किलोमीटर की इस यात्रा के माध्यम से प्रकृति को बचाने का संदेश देना भी है।

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