
रांची। 1855 के संताल हूल में इस्तेमाल हुई सखुआ (साल) की टहनी केवल एक प्राकृतिक प्रतीक नहीं थी, बल्कि यह एक संगठित और प्रभावी संचार प्रणाली का हिस्सा थी, जिसने अंग्रेजी शासन के खिलाफ हुए संताल विद्रोह को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई। इस पारंपरिक प्रणाली के जरिए गांव-गांव तक संदेश पहुंचाए जाते थे और लोगों को आंदोलन के लिए संगठित किया जाता था।
इतिहासकारों के अनुसार, सखुआ की टहनी को एक गांव से दूसरे गांव भेजकर सामूहिक बैठक या युद्ध के लिए आह्वान किया जाता था। यह प्रणाली पूरी तरह सांकेतिक थी, जिसमें बिना लिखित संदेश के सूचना का आदान-प्रदान होता था। टहनी की संख्या और स्थिति से यह भी संकेत मिलता था कि बैठक कितने दिनों बाद होगी। इस व्यवस्था में ‘संवदिया’ यानी संदेशवाहक की भूमिका महत्वपूर्ण होती थी, जो टहनी को एक गांव से दूसरे गांव तक पहुंचाता था। 1855-56 के संताल हूल के दौरान सिदो-कान्हू के नेतृत्व में इस प्रणाली का व्यापक उपयोग किया गया। सखुआ की टहनी को ‘युद्ध के निमंत्रण’ और ‘एकजुटता के प्रतीक’ के रूप में देखा गया। जैसे ही किसी गांव को यह टहनी मिलती थी, वहां के लोग आंदोलन में शामिल होने के लिए तैयार हो जाते थे। 30 जून 1855 को भोगनाडीह में हजारों संतालों का एकत्र होना इसी प्रणाली की सफलता का प्रमाण माना जाता है।
इतिहासकार एल.एस.एस. ओ’मैली और डॉ. काली किंकर दत्ता सहित कई विद्वानों ने अपने शोध में इस संचार प्रणाली का उल्लेख किया है। उनके अनुसार यह केवल सूचना नहीं बल्कि एक “युद्ध का आह्वान” था, जिसे देखकर लोग हथियार लेकर एकत्र हो जाते थे। विशेषज्ञों का मानना है कि उस समय यह प्रणाली इतनी प्रभावी थी कि ब्रिटिश प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं लग पाई। जंगलों और गांवों में लकड़ी की टहनी के माध्यम से संदेश तेजी से फैलता गया और पूरा संताल परगना कुछ ही समय में विद्रोह के लिए संगठित हो गया।
सखुआ की टहनी केवल संचार का साधन नहीं थी, बल्कि यह सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीक भी थी। संताल समाज में सखुआ वृक्ष को पवित्र माना जाता है और इससे जुड़े संकेतों को दैवीय आदेश के रूप में स्वीकार किया जाता था। यही कारण था कि इस संचार प्रणाली को लोग पूरी श्रद्धा और अनुशासन के साथ अपनाते थे। आज भी यह प्रणाली जनजातीय इतिहास में संगठन और एकता के प्रतीक के रूप में देखी जाती है। यह उदाहरण बताता है कि आधुनिक तकनीक से पहले भी समाज ने अपने स्तर पर प्रभावी संचार और संगठन के अनोखे तरीके विकसित कर लिए थे।





